शनिवार, 7 अप्रैल 2012

अमरीक सिंह कुंडा की लघुकथाएँ - श्रद्धा

कंडे का कंडा

श्रद्धा

वे दोनों हनीमून मनाने चले थे। इस गुरुद्वारे की बड़ी मान्यता है, यह सोच कर नवविवाहित युगल ने यहां माथा टेकना ठीक समझा। जैसे ही वे माता टेक कर प्रशाद लेने लगे तो नवविवाहिता ने देखा कि उसके गले का हार गायब था। पति को पता चला तो उन्होंने मोबाइल फोन पर किसी से बात की और 10 मिनट में पुलिस आ गई।

‘‘हमने तो लिख कर लगाया है कि कोई आभूषण या पैसा लेकर गुरुद्वारे न आओ परन्तु लोग सुनते ही नहीं।’’ पाठी कह रहा था।

‘‘बात सुनो बाबा, तुम्हें पता है यह कौन हैं?’’ डी.एस.पी. ने आंख मारते हुए कहा।

‘‘जी, सारी संगत के लिए ही हम ने लिख कर लगाया हुआ है।’’ पाठी ने थोड़ा झिझकते हुए कहा।

‘‘साले, यह मेरे बड़े साहब का लड़का है। पकड़ो इसे और डालो गाड़ी में।’’

पाठी ने साहब को एक तरफ ले जा कर कहा, ‘‘मेरी मोतियों वाली सरकार, अभी तो वह माल मेरे पास पहुंचा ही नहीं, जब आ गया तो आपकी तरफ खुद ही आ जाऊंगा।’’

15-20 मिनट बाद ही वह हार मिल गया। हार कहीं गेट पर ही गिर गया था, ऐसा पुलिस वालों का कहना था।

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