सोमवार, 30 अप्रैल 2012

धनंजय कुमार उपाध्याय “कर्णप्रिय” का व्यंग्य - मां की ममता लाजवाब

माँ की ममता लाजबाब (व्यंग्य) अपने सभी भाई-बहनों में मेरी नाक थोड़ी ज्यादा ही मोटी है. हंसने पर नाक के फुफकारने की सी फूल जाती है. मगर माँ की ममता इसे मानने को तैयार ही नहीं होती, वह मेरी नाक को अत्यंत ही सुन्दर और नुकीली बताती है. इसलिए मुझे कभी –कभी शीशे पर भी संदेह हो जाता है. चेहरे में सब भाग तो काबिले तारीफ है सिवा नाक के. माँ मुझे परिवार में सर्वाधिक सुंदर और बुद्धिमान बताती है मगर मुझे अपने आप पर विश्वास ही नहीं होता है. क्योंकि मुझे अपनी इन दोनों ही चीजों पर बचपन से शक रहा है.

कभी-कभी मैं अपने इस शक को दूर रख कर सोचता हूं तो निःसंदेह मुझे भी अपने-आप पर गर्व होता है. दिमाग फिरंगी है मेरा और हमेशा से ही उलूल-जुलूल बातों पर विश्वास करता आया है,सिर्फ बेतुकी बातों पर ही चिंतन से चिंता तक करता आया है तथा अक्सर ही मुझे बाबूभाई कटारा से तुलना करने को प्रेरित करता है, अमेरिका से कनाडा तक मुझे एक ऐसी परिवहन व्यवस्था से सैर करा देता है जो अकल्पनीय है.

बस !अगर मैं अपनी सुंदरता के शक को दूर रख कर सोचता हूँ तब. इन सभी विचारों को कार्य रूप में परिणत करने के लिए मेरे परिवार की आर्थिक बदहाली आड़े आती है तथा मेरे पिता या भाई के सांसद या विधायक नहीं होने का दर्द अक्सर कराह उठता है. काश ! मेरे पिता या भाई भी अगर लोकतांत्रिक जनसेवक होते तो ऐसी बात नहीं होती, मेरे भी ख्वाब अधूरे नहीं होते, मैं भी अपनी माँ की यादृच्छिक कल्पना को साकार करता, अपने को सुन्दर होने का अलौकिक प्रमाण पेश करता, भले ही मुझे फांसी होती या आजीवन कारावास की सजा होती.

अगर मेरे परिवार के कुछ सदस्य ऐसे होते जो मेरे द्वारा किये गए कुकर्मों को सद्कर्म बनाकर संसद भवन या विधानसभा के शून्यकाल या विशेष बैठक में उठाते. फिर यह प्रक्रिया लंबी हो जाती या राष्ट्रपति के पास क्षमायाचना को लंबित रहती और फिर मेरी अवस्था इस व्यवस्था को तलाक देकर रुखसत हो जाती और मैं अपने मातृ-प्रेम को जीवंत कर अमर हो जाता अपने राष्ट्र के न्यायि़क इतिहास में. शायद इसी बात की कल्पना करके प्रकृति ने हमारे इस आदर्श परिवार में सांसद या विधायक पैदा नहीं किया और इस उन्मुक्त प्रेम प्रक्रिया से मेरी माँ को होने वाले खुशनुमा दर्द को पैदा होने से पहले ही भू-गर्भित कर दिया.

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------