शेर सिंह की कविता - हमारी धरोहर

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हमारी धरोहर
•    शेर सिंह
खुली रह जाती हैं आंखें
आश्‍चर्य
से और, तन जाती है गर्दन
गर्व के अहसास से
अतीत के धरोहर
अनेकों विशालकाय
सहस्रों लघु मंदिरों
देव स्‍थानों को देख
उत्‍कल की भूमि, और
मंदिरों के नगर
भुवनेश्‍वर में ।

सांझ -  सकारे
शंख, देव अर्चनाओं की
सुमधुर ध्‍वनि
बांध देती हैं भावों के बंधन से
समस्‍त परिवेश को
हृदय की गहराइयों तक ।

जिस भी रास्‍ते पर
चलें, कहीं भी मुड़ें
मोड़ समाप्‍त होंगे
उदयगिरी में, खंडागिरी में
और, धौलगिरी में
या फिर
केदारगोरी में आ कर ही । 

   
       एक ओर शिव
मां गंगा को
अपनी जटाओं में धारे
दूसरी तरफ
श्री राम
पवन पुत्र को निहारते हुए
तीसरी दिशा में
माधव - जगन्‍नाथ
बहन सुभद्रा और
भाई बलभद्र के संग
पुर इत्‍मीनान से
जन- जन को
लुभाते हैं, हर्षाते हैं ।

बुद्ध भी हैं यहीं पर बौद्ध अशोक भी
और, वीरों के
रक्‍त को समेटे
चिर गाथा सुनाती
उत्‍कल की छाती पर
क्षीण गाति से
प्रवाहित नदी
दया भी ।

  0 शेर सिंह
के.के. - 100
कविनगर, गाजियाबाद 201 001.

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1 टिप्पणी "शेर सिंह की कविता - हमारी धरोहर"

  1. सार्थकता लिए हुए सटीक लेखन

    कल 25/04/2012 को आपकी इस पोस्‍ट को नयी पुरानी हलचल पर लिंक किया जा रहा हैं.

    आपके सुझावों का स्वागत है .धन्यवाद!


    ... मैं तबसे सोच रही हूँ ...

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