सोमवार, 30 अप्रैल 2012

सरिता गर्ग की लघुकथा - सुबह का भूला

image

दोनों बस की सीट पर एकदम खामोश बैठे हुए थे। रमेश खुश था बहुत खुश। ऑटो मैं बैठकर चौपाटी जाकर आये थे वे लोग। भेलपुरी खायी थी बांहों मैं बाहें डालकर घुमे थे,और रेत का घरोंदा बनाया था। काफी था रमेश के लिए इतना। पर क्या उमा खुश थी ?बार बार उसकी नज़र उस बड़ी सी गाड़ी मैं बैठे जोड़े पर चली जाती थी,दोनों के हाथ मैं बड़ी बड़ी आइसक्रीम थी, शायद दोनों बाहर खाने का प्लान बना रहे थे। बाहर डिनर लेकर कितने संतुष्ट  होकर घर जायेंगे ये लोग। घर जाकर एसी खोलकर सो जायेंगे। पर यंहा ऐसी किस्मत कंहा?घर जाते ही रमेश चावल दाल बनाने की फरमाइश करेगा , फिर सारे बर्तन साफ़ करने होंगे,तब कंही जाकर कमर सीधी होगी वो भी मछरों से लड़ते हुए। मन ही नहीं करता थाउसे कंही बाहर जाने का,बस की लाइन मैं खड़े रहो फिर ऑटो ऑटो पुकारो पैसे देखकर खाना खाओ मीटर देखते हुए सारा ऑटो सांस रोके बैठे रहो। भीड़ का एक हिस्सा बनकर।

रमेश उस दिन जुलूस देखने का प्रोग्राम बना रहा था, उमा चाह रही थी वे किसी कॉफी शॉप जाए,और कॉफी पिए पर रमेश चाह रहा था की जुलूस देखने चले,कितने middle क्लास शौक थे रमेश के। बोर हो गयी थी उमा रमेश के साथ । अभिजात्य वर्ग की बात ही अलग होती है कितने उम्दा शौक होते है उनके। बड़ी सी बॉटल साथ लिए फिरते हैं कि कहीं इधर उधर का पानी पीकर बाबा को जुकाम ना हो जाए,पर रमेश तो पानी का बॉटल घर से ले चलने की जिद करता है। कितनी बार कहा है रमेश से एक आधा जींस ले ले पर नहीं वही ढीले ढाले पैंट पहनेगा। इससे तो अच्छा है कि वो घर के बाहर ही ना निकले।

रमेश समझ रहा था की उमा उसके साथ खुश नहीं। बाहर आकर भी वह अनमनी और बेचैन रहती है। ना जाने उसकी आँखे क्या ढूँढती रहती है? पता नहीं किधेर खोयी खोयी रहती है? सब तरफ क्या ढूँढ़ते रहती है? कोई चीज़ की फरमाइश नहीं करती ? इतना घमंड भी तो अच्छा नहीं. कोई कमी नहीं रखता मैं उसको, पर पता नहीं क्यों? शायद वह मेरे साथ खुश नहीं। आज से ऑफिस से घर जल्दी जाना बंद।

ऑफिस से देर से आने लगे है आजकल। आये मेरी बला से, चलिए जी बड़ा सुकून है मनपसंद चंनील लगा कर देखते रहो। जल्दी आते थे तो बाहर ले जाते थे और अपने मिडिल क्लास होने का अह्स्सास ही मारे डालता था । अभी अभी टीवी पर मुकेश अम्बानी का बंगला देखा आँखे फट गयी। क्या था जी उनके पास ?आगे बढ़ने की चाह होनी चाहिए. पता नहीं इतनी देर क्यों कर दी।

कितनी खुश है मेमसाब आज। फिर से लौकी बना दी। इन्हें कहां ख़याल है किसी और की ख़ुशी का। आदमी घर पर आता है चंद बोल प्यार से सुनने के लिए और ये है कि इन्हें अहसास ही नहीं। कल से सुधीर के साथ थोड़ा गपशप लड़ा कर आऊँगा।

कितना मुंह फुला कर खाना खा रहे थे, लगता था साड़ी दुनिया का बोझ इन्हीं पर है । वह तो अम्मा ने पढाया नहीं वर्ना हम भी कहीं नौकरी कर लेते। कल से हम भी मिसेज मुक्ता के घर ताश खेलने जाया करेंगी । उफ़ इतनी बेरुखी।

वह मज़ा आगया सुधीर क़े साथ कितना जिंदादिल इंसान है । थोड़ी पी भी ली मैंने,चलिए कोई बात नहीं मेमसाब के लिए फूल ले लेता हूँ

वह मज़ा आया किट्टी मैं। कुछ अच्छा बनादेती हूँ शक की कोई गुंजाइश ही ना रहे. मिसेज मुक्ता कल हमें वहां ले जायेंगी जहां बड़े लोग ताश खेलने आते हैं।

आज उल्टा सीधा बक दिया मैंने शायद कुछ ज्यादा हो गयी थी।

आज खाना न बना सकी। ताश की बाज़ी ही कुछ ऐसे चली,

आज खाना बहार ही खा लिया बड़ा अच्छा लगा । लौटते समय उमा क़े लिए आइसक्रीम ले ली।

ताश खेलते समय टाइम का ध्यान कहां रहता है। बड़े लोगों को तो पकपकाया खाना मिलता है, घरों मैं कुक जो है। रश्मि क़े घर गयी थी मैं इतना बड़ा घर,पता नहीं उसका हसबैंड कुछ अजीब नज़रों से मुझे घूर रहा था।

सुधीर मुझे जन्नत ले गया। कितनी मीठी बातें करती है सुधा। पैसे कमाता हूँ चलिए थोडा मजा भी लेंगे। इंस्टालमेंट पर कार ले लूं फिर सुधा को कहीं ले केर जा सकता हूँ।

रश्मि क़े हसबैंड ने ब्लैकबेरी फ़ोन दिया मुझे । मैंने रमेश से कह दिया की दोस्त ने दिया है।

आज सुधा बड़ी ख़ूबसूरत लग रही थी । कार मैं हम दोनों घूमने गए उसके बाद कदम डगमगाने लगे,

रश्मि का हसबैंड मुझे कॉफी पिलाने ले गया ,और उसके बाद मेरा हाथ पकड़कर ........मैंने उसे जोर से चांटा लगाया। मुझे अम्मा की याद आई।

सुधा को आज विष्णु के साथ देखा कलेजे पर सांप लोट गए। घर जल्दी ही आ गया।

रमेश और उमा रेत क़े घरोंदे बना रहे है चौपाटी पर दोनों खुश है।

.

,,

1 blogger-facebook:

  1. सूचनाः

    "साहित्य प्रेमी संघ" www.sahityapremisangh.com की आगामी पत्रिका हेतु आपकी इस साहित्यीक प्रविष्टि को चुना गया है।पत्रिका में आपके नाम और तस्वीर के साथ इस रचना को ससम्मान स्थान दिया जायेगा।आप चाहे तो अपना संक्षिप्त परिचय भी भेज दे।यह संदेश बस आपको सूचित करने हेतु है।हमारा कार्य है साहित्य की सुंदरतम रचनाओं को एक जगह संग्रहीत करना।यदि आपको कोई आपति हो तो हमे जरुर बताये।

    भवदीय,

    सम्पादकः
    सत्यम शिवम
    ईमेल:-contact@sahityapremisangh.com

    उत्तर देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

------------------------------------------------------------

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------