शशांक मिश्र भारती की कविता - अवरोध

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अवरोध

शशांक मिश्र भारती

मैं-

निरन्‍तर परिस्‍थितियों से

लड़कर भी खड़ा हूं

अपनी-

मंजिल की तलाश में,

सोचता हूं तोड़ दूं

अपने-

पथ के सभी अवरोध

किन्‍तु-

समक्ष आ जाता है

शब्‍दों का अभाव

जो-

बन जाता है मेरे मन की व्‍यथा

लेकिन-

फिर भी प्रयत्‍नशील हूं

मैं अपने पथ पर

और-

प्रयत्‍न करता रहूंगा

सफलता प्राप्‍त होने तक,

वह-

मेरे लिए एक नया

सुखद प्रभात होगा

जब छंट जायेगी

मेरे पथ की

सभी अवरोधी चट्‌टानें

रोक रखा है

जिन्‍होंने-

मेरे मानसिक उत्‍कर्ष को।

‘‘उपरोक्‍त कविता मेरी अपनी स्‍वरचित,मौलिकव रश्‍मिरथी द्वैमासिक जुलाई-अगस्‍त 1993 पृ..27प्रकाशित है।''

सम्‍पर्कः-हिन्‍दी सदन बड़ागांव शाहजहांपुर-242401 0प्र0 9410985048

ईमेल:-shashank.misra73@rediffmail.com

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