शनिवार, 14 अप्रैल 2012

विजय वर्मा की कविता - एक बूंद खून

एक बूंद खून 

लिखा है पुस्तकों में ,

काली ने रक्त-बीज का 

संहार किया था;

एक-एक बूँद उसका 

खून पीया था

आवेश में आकर 

सृष्टि का विनाश 

शुरू किया था.

तब शिव ने उन्हें शांत किया था.

यहाँ तक तो आप भी जानते है,

कामो-बेश सच भी मानते है.

पर एक बात बतलाऊँ?

रक्त-बीज के वंशजों से मिलवाऊँ?

मिल चुके है आप उनसे 

कभी जेलों में,कभी थाने में.

कभी दफ्तर  में,कभी संसद में,

कभी एक जगह से दूसरी जगह तक

बस यूँ ही आने-जाने में.

कभी जनता का पैसा लूटते,

कभी मुर्दों पर भी 

राजनीति करने को जुटते.

कभी देश की सुरक्षा 

खतरों में डालते,

कभी जासूस -रूपी सांप को 

आस्तीन में पालते.

कभी धर्म के नाम पर

राजनीति करते,

कभी मजदूरों का हक़ मार

अपना घर भरते.

कभी देश के सीने पर 

गोलियां चलातें,

कभी साम्प्रदायिक आग में

बेकसूरों को जलाते.

ऐसा लगता है कि रक्त-बीज 

अपना खून बचाने में 

जुट गया होगा,

और काली से एक बूँद,

सिर्फ एक बूँद खून,

छूट गया होगा.

.

.

--
v k verma,sr.chemist,D.V.C.,BTPS

BOKARO THERMAL,BOKARO
vijayvermavijay560@gmail.com

1 blogger-facebook:

  1. वाह.....
    बेहतरीन कविता.....
    ज़रूरत है काली को फिर आने की...और इस बार शिव के रोके से भी न रुकें,,,कौन है जो रक्त बीज नहीं...किसे हक है जीने का???

    सार्थक रचना.
    अनु

    उत्तर देंहटाएं

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