सोमवार, 9 अप्रैल 2012

प्रभुदयाल श्रीवास्तव के चंद अशआर - जब तुझे सामने पाता हूं तो ये लगता है, सब के सब शेर ही बेकार लिखे हैं मैंने...

शनि के बाद में इतवार लिखे हैं मैंने

चंद अशआर लिखे हैं मैंने
गीत दो चार लिखे हैं मैंने|

देख तलवार पे ये तल्ख पैनापन
अपनी गर्दन पर तेरे वार लिखे हैं मैंने|

दहरे गर्दिशों में कुछ सुकूं तो मिले
शनि के बाद में इतवार लिखे हैं मैंने|

एक मुद्दत हुई तेरा कोई पता ही नहीं
प्यार के आज ही इजहार लिखे हैं मैंने|

जब तुझे सामने पाता हूं तो ये लगता है
सब के सब शेर ही बेकार लिखे हैं मैंने|

कलम है हाथ में और हाथ दस्तानों में हैं
बिना कागज मसि के देश पे अंबार लिखे हैं मैंने|

उनके तक्रीर तजम्मुल से तजाहुल है क्यों
ये तनकीद हमले भी कई बार लिखे हैं मैंने|

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  1. आदरणीय श्रीवास्तव जी, प्रणाम! मैं ब्लागिस्तान में नया हूँ, अतः आज आपकी पहली रचना पढ़ी, मन को भा गई; धीरे-धीरे पिछली रचनाएँ पढ़ने का प्रयास रहेगा। मुझे ग़ज़ल पढ़ने का थोड़ा शौक है, कई बार खाली समय में कुछ ग़ज़लें सुना करता हूँ और साथ में गुनगुनाया करता हूँ, लेकिन लिखने की क़ाबिलियत मुझमें नहीं है। इस कारण ग़ज़ल लेखकों के लिए मन में सम्मान का भाव है।
    ग़ज़ल का वह शेर बहुत पसंद आया जिसे की आपने पोस्ट का टाइटल बनाया है। कुछेक शब्दों का अर्थ समझ नहीं आया, क्या यह संभव है कि पोस्ट के अंत में उर्दू शब्दों का अर्थ बता दिया जाए?
    आपका आभार, इतनी शानदार रचना से हमें अवगत कराने के लिए, शुक्रिया।

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