शनिवार, 21 अप्रैल 2012

स्वप्नीला अग्घी की कविताएँ

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1...

आये थे इक पल को आँसू / चक्षुओं  की कैद से बाहर ।

मगर आये न तुम /आहट की त्राण से बाहर ।

कहूँ किससे , कि तुम क्या हो ?

मेरा सपना /मेरा जीवन / क्या हो मेरे तुम?

मीत हो या गैर का स्पंदन ।

दिशाएँ मौन हैं /क्यूँ मौन हो तुम भी ।

इक बार आकर जो कहो तुम /

हाँ ,मैं हूँ ज्योत्स्ना तुम्हारी ।

चिर प्रतीक्षित ये पल /गर आ जाएँ अभी /

ढहा दूंगी मैं /मृषा के ये लाक्षागृह सभी ।

लाक्षागृह सभी ।

 

2...            

मैं महसूस करती हूँ जो /मुझे अपनी सी लगती है ।

वो है /बस मेरी माँ ।

गोद में उसकी रखकर सिर/ जब सो जाती हूँ।

वह सहलाती है बालों को धीरे -धीरे /लौटा देती है मेरा आत्मविश्वास/

जो खो जाता है बार -बार /आगे निकलने की दौड़ में ।

जब  छूटने लगती  हूँ /साथियों से पीछे/

क्रिकेट ,टेनिस और किताबों की रेस में /

छाया बन मेरे साथ चल देती है मेरी माँ ।

हर पग पर  उत्साह बढ़ाती है माँ /

चलते -चलते गिरती  हूँ /तब भी हाथ बढ़ा उठाती है माँ ।

जीत के जश्न में तो सभी /होते हैं शामिल।

बस ,मुझे खुश देख /चुपके -चुपके से  आँसू बहाती /

ईश्वर को धन्यवाद करती है /तो बस मेरी माँ ।

कभी जो छलक जाएँ /मेरी आँखों से आँसू /

हथेलियों  में दबा /उन्हें मोती बना /

मेरे चेहरे पर मुस्कान  सजा देती है /तो बस मेरी माँ ।

सच तो ये है/ कि तुम जो भी चाहो /जैसा भी चाहो /जो भी करो /

जीवन के सबसे कठिन क्षणों में भी /प्यार करती है तुम्हें /

तो सिर्फ माँ ।सिर्फ.................................................. माँ ।

3...

आँखों में दर्द छुपा /होंठों से मुस्काते हैं लोग ।

प्रहेलिका सा जीते जीवन /अन्जानी राहों पर चलते हैं लोग ।

ज़मीनी सच्चाई से लड़ते /लहूलुहान हो जाते हैं लोग ।

फिर जीवन आदर्शों को ताक पर रख / इंसानियत का गला/ दबा  देते हैं लोग ।

छल कपट को व्यापार बना/ आस्तीन के साँप बन जाते हैं लोग ।

दिशाहीन ,मृतप्रायः से /उद्देश्यहीन  भटकते /

जाने कैसे जीवनपीयूष  को खोज रहे हैं लोग ।

4....

आशा की किरणें करती हैं ।

पुरजोर सिफारिश हमसे | 

जीवन उजला होगा इक दिन ।

नारी का अपने ही तप से ।

शिक्षा की नवजोत जली है ।

प्रांगण रोशन होगा  अब से ।

बीज पड़ा है संघर्षों का ।

फूल खिलेगा हक़ से ।

5...

मैंने आशा की किरणों से /हथेलियों पर सूरज बनाया /

धज्जी -धज्जी होकर /उसने भी अन्धकार फैलाया /

सांसों के पंखों पर होकर सवार /जो छूने गयी मैं चाँद को /

टूट -टूट कर पंखों ने भी /ग़मों का बादल छितराया/

सोचा था बदलेगा मौसम /बूंद -बूंद कर प्यास बुझेगी /

लेकिन ये कैसी हवा चली ?

होंठों पर मुस्कान खिली /आँसू जब तुमने पोंछ लिए /

हाथ बढ़ाया /साथ निभाने को कदम उठाया /

हर जख्म पर मरहम लगाकर /दुःख मेरा बाँट लिया सारा /

तपते सहारा के आँगन में /अब छोड़ कहाँ तुम जाते हो ?

प्यार दिया /वादे किये/कुछ क्षण सम्मोहित कर बहलाया /

पत्तों पर शबनम के मोती /चाँद से चेहरे पर सजते /

वो  जाने कैसा पल था ?शबनम ने था जब सहलाया /

जाने कौन-सा रास्ता है /जाने मैं किस ओर  चली /

सागर है आगे या पर्वत /

इस घोर अन्धेरे में मुझको /कुछ भी नजर नहीं आता /

है कौन जो रास्ता दिखलाये /है कौन जो मेरा गम झेले /

तकदीर ने ऐसा झुलसाया /

मुड़ - मुड़कर जो देखा /साया भी अपना साथ नहीं पाया ।

6...

.कल का सोचना फिजूल है /कौन जाने इस पल का क्या उसूल है ?

यूँ रोओ ना ,अश्क बहाओ ना ।जाने  वक्त को क्या मंजूर है ?

रात की सियाही में /डूबते हुए सितारे के /रहमोकरम  पर /

हथेली पर ,आशा का सूरज उगाओ ना |

निराशा की बदली का तिमिर /हर पाए ना पाए /

ख्वाबों का दिया तो बुझाओ ना ।

हर इक अफ़साने को अपना बना लो /जाने क्या इन पलों का जुनून  है ?

हर  क्षण आशा का दीप जलाते रहो /जो बीत गया उसे बिसराते चलो ।

आज के दिन ,आज की कहो -सुनो /कल की सोच -सोच कर /

खूबसूरत  लम्हों को गँवाओ ना ।

आज ,अभी ,अब की  सोचो /यही तो जीवन का समूल है ।

कल का सोचना फिजूल है /कल का सोचना फिजूल है |

7...

माँ ,तुम  जानती नहीं /बेटी के मन की पीड़ा/

तुम सोचती थीं /मेरा जन्म न हो /

तुम चाहती थीं /तुम पुत्रवती हो ।

बेटे का उपहार मिले /उस बेटे को, पिता का प्यार  मिले ।

उच्च शिक्षा ,सम्पूर्ण पोषण /सामाजिक रुतबे का अधिकार मिले ।

वंश बढे इहलोक से परलोक का द्वार खुले ।

पर बेटी का क्या है ?

परायी अमानत है वो /दुलराया तो सिर चढ़ जायेगी ।

उच्च शिक्षित हुई /तो अच्छा वर न पायेगी /

पर माँ,भावुकता ही उसकी दौलत है /तेरा आँचल ही उसकी जन्नत है ।

अहसास की नर्मी तेरी बाहों की गर्मी /

आँखों में ,आँसुओं की नमी /पढ़ सकती है ।

तेरी ही भाँति,तेरी परछाई होना /अस्तित्व  का श्रापित होना /

पिता का कठोर अनुशासन /छोटे भाई का तिरस्कार /

माँ ,तेरी कोख में पलना ,बढ़ना /मेरी नियति सही ।

पर तेरी नियति को बदलना चाहती हूँ मैं ।

संसार की अंजोर राहों पर चलना चाहती हूँ मैं ।

तेरा..... सूरज ,तेरा..... चंदा न सही /

तेरे जीवन में -जुगनू बन ,चमकना चाहती हूँ मैं ।

8...

कंपकपाते जाड़े की /भोर की अलसाई सुबह में /

एक प्याला चाय का /हाथों में थाम /

चुस्कियों में /जीवन के रस को निचोड़ /

आत्मसात्  कर /मन के बंधनों को /

समाज की बेड़ियों से ढिलियाते हुए /सृजन की पतवार थाम /

सरगम को दे कर आलाप /भैरवी के सुरों को छेड़ /

मैं ब्रह्म के नाद में लीन/आत्मा को परमात्मा के संसर्ग में प्रस्तुत कर /

कहीं विराट शून्य में क्षितिज  के पार से आती अरुणिम आभा से /तृप्त होती /

विचारों के मंथन से /जीवन को परिभाषित करती /सोचने लगी

चलते -फिरते  स्थूल स्तंभों में /श्वासों की रागिनी ।

अहा....................................................यही है जीवन ।

हाँ ,यही है जीवन ।

छन्न.......................................................।

यकसां ,ये क्या हुआ ?

विचार बिंदु का शीशा / छन से टूट पड़ा /

ध्वनि का ये कौन-सा रूप /मेरे कानों में आन  पड़ा /

सहायक नादों की निर्बलता का सा आभास हुआ /

उफ्... ...............................................।

दो नन्हीं कलियाँ /चीथड़ों से आवृत /करूणा से पुकारतीं /

उनकी खाली हथेलियाँ /लगें ज्यों काठ की वंशी /

कान्हा के अधरों के प्रकम्पन की बाट निहारतीं ।

ओह .........................................................क्या ये भी जीवन है ?

स्वप्नीला अग्घी ,रोहतक ।

2 blogger-facebook:

  1. वाह आनंद आ गया
    बहुत सुंदर चि‍त्र है पोस्‍ट के प्रारम्‍भ में

    उत्तर देंहटाएं

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