शनिवार, 28 अप्रैल 2012

एक शख्सियत…......शकील जमाली : विजेंद्र शर्मा का आलेख

शकील जमाली

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मैं अपने घर में अकेला कमाने वाला हूँ

मुझे तो सांस भी आहिस्तगी से लेना है

एक शख्सियत......शकील जमाली

शाइरी की सबसे ख़ूबसूरत विधा ग़ज़ल है जिसके मायने महबूब से गुफ़्तगू करना,औरतों से बात करना है। अगर रिवायती ग़ज़ल के पन्ने पलटकर देखें तो ग़ज़ल में नज़र आता है हुस्न की तारीफ़ , ज़ुल्फें,साकी ,सागर ,वफ़ा, बे-वफाई,मौसम , घटायें और शराब। अगर दूसरे लफ़्ज़ों में कहूँ कि पहले सच में ग़ज़ल कच्चे गोश्त का एक इश्तेहार सा नज़र आती थी। सत्तर के दशक के बाद ग़ज़ल ने अपना मिज़ाज बदला और ग़ज़ल महबूबा की ज़ुल्फों से निकल कर रोज़मर्रा के मसाइल ,टूटते - बिखरते रिश्तों ,सियासत पे तन्ज़ यहाँ तक कि रोटी कि गोलाई में आ गई। ग़ज़ल के इसी बदले हुए चेहरे का एक नाम शकील जमाली भी है।

1980 में मुंबई के एक उर्दू रिसाले में एक शे'र छपा :----

ये सरकशी कहाँ है हमारे खमीर में

लगता है अस्पताल में बच्चे बदल गये

ये शेर पढ़कर इस सदी के बहुत बड़े शाइर डॉ. बशीर बद्र ने कहा कि यह शे'र ग़ज़ल में इज़ाफ़ा है। वाकई जिस तरह ये शे'र ग़ज़ल में इज़ाफ़ा है ठीक उसी तरह इसे कहने वाले शाइर शकील जमाली अदब में इज़ाफ़ा है। जदीद शाइरी में ग़ज़ल को हुस्न- ओ -शबाब के क़ैद ख़ाने से जिन सुख़नवरों ने आज़ाद करवाने की उम्दा और कामयाब कोशिश की उनमें से एक अहम् नाम है शकील जमाली ,रिवायत से हटकर शे'र कहने का अंदाज़ उनके इस मतले और शे'र से साफ़ ज़ाहिर है :---

ज़ुल्फें, लब, रूख़सार उठाये फिरते हैं

सब कल का अख़बार उठाये फिरते हैं

आँगन में टकसाल लगा ली लोगों ने

हम जैसे किरदार उठाये फिरते हैं

जिनके हाथ में गुड़िया -गुड्डे होने थे

पैमाना परकार उठाए फिरते हैं

शकील जमाली का क़लाम अवाम तक पहले पहुंचता है उनका नाम बाद में यूँ तो हर शाइर का शे'र कहने का अंदाज़ मुख्तलिफ़ होता है मगर कई बार लहजा और तेवर शाइर के नाम पे भी भारी पड़ जाते हैं। ऐसा शकील जमाली के साथ हुआ है। लहजों की भीड़ में अपने फ़िक्रों-फन और कहन के तेवर से शकील जमाली का लहजा भीड़ में भी बा-आसानी पहचाना जा सकता है। शकील जमाली के लहजे में लफ़्ज़ों के जानदार तीर भी होते हैं और तन्ज़ के ख़ूबसूरत नश्तर भी जो सुनने वाले के सीने में जब लगते है तो कोई ज़ख्म तो नहीं देते हाँ एक मीठा सा दर्द ज़रूर छोड़ जाते हैं :---

सब के होते हुए लगता है के घर खाली है

ये तकल्लुफ़ है के जज़बात की पामाली है

आसमानों से उतरने का इरादा हो तो सुन

शाख़ पर एक परिंदे की जगह खाली है

जिसकी आँखों में शरारत थी,वो महबूबा थी

ये जो मजबूर सी औरत है ये घरवाली है

(पामाली =पतन )

शकील जमाली का जन्म 01 अगस्त 1958 को बिजनौर जनपद के चांदपुर क़स्बे में जनाब हशमत उल्लाह "आशिक़ " साहब के यहाँ हुआ। शकील साहब के वालिद भी शाइर थे और रिवायती शाइरी के बहुत बड़े हिमायती भी ,शाइरी शकील जमाली की रगों में थी पर अपने वालिद के रिवायती लहजे से वे बचपन से ही इतेफ़ाक नहीं रखते थे। शकील जमाली ने अपनी शुरूआती पढाई चांदपुर से की और राजनीति शास्त्र में एम्. ऐ भी चांदपुर से ही किया। उसके बाद वे पी-एच. डी करने जामिया, दिल्ली गये मगर अपनी माँ के इन्तेकाल के बाद उन्हें पी-एच. डी बीच में ही छोड़नी पड़ी। यूँ तो बचपन से ही शकील जमाली अदब की दुनिया से वाकिफ़ हो गये थे पर बीस बरस की उम्र में उन्होंने बा-क़ायदा शे'र कहने शुरू किये। अदब की काँटों भरी राह पर इमानदारी से बिना किसी बैसाखी के चलने का पहला सबक शकील जमाली को अपने अब्बू से मिला जिन्होंने कहा कि बेटे शे'र कहने के बाद इस्लाह के लिए किताबें पढ़ना ना कि किसी से पूछना क्यूंकि हर आदमी अधूरा है ,किताबें ही है जो मुकम्मल है। ऐसा सबक जो इन्सान अपने अदब से रब्त के शुरूआती दिनों में ही सीख ले, तो फिर आप उसके तेवर भी समझ सकते है। शाइरी से जुड़ी दो शख्सियात ने शकील जमाली को बहुत मुतास्सिर (प्रभावित ) किया एक डॉ. बशीर बद्र और दूसरी परवीन शाकिर हालांकि शकील जमाली के क़लाम में इनकी कोई छाप नज़र नहीं आती इसकी वजह ये है कि शे'र कहने का अंदाज़ उनका अपना है और ज़ुबान भी उनकी अपनी है।

उल्टे सीधे सपने पाले बैठे हैं

सब पानी में काँटा डाले बैठे हैं

एक बीमार वसीयत करने वाला है

रिश्ते-नाते जीभ निकाले बैठे हैं

बस्ती का मामूल पे आना मुश्किल है

चौराहे पर वर्दी वाले बैठे हैं

अभी जाने कितना हंसना रोना है

अभी तो हमसे पहले वाले बैठे हैं

(मामूल =यथास्थिती )

शकील जमाली अपने क़लाम को सबसे पहले ख़ुद तनक़ीद (समीक्षा /आलोचना ) के पैमाने पे नापते , परखते हैं फिर एक हफ़्ते बाद अपने मिसरों को दोबारा जांच की भट्टी पे चढ़ा देते हैं और नतीजे में कुंदन की तरह निखरा और तपा हुआ शे'र उन्हें मिलता है। अपने शे'र के साथ मशक करने का ये उनका अपना अंदाज़ है। शकील जमाली स्वयं पे मुग्ध नहीं होते अपने हुनर को वो ऐसा चश्मा लगा के देखते है जिसमे उनको ऐब नज़र आये और फिर उसपे वो और मशक कर सकें ,उनकी यही मशक्कत पैदा करती है शकील जमाली की मुहर लगे ये अशआर :----

पेट की आग बुझाने का सबब कर रहे हैं

इस ज़माने के कई मीर मतब कर रहे हैं

कोई हमदर्द भरे शहर में बाक़ी हो तो हो

इस कड़े वक़्त में गुमराह तो सब कर रहे हैं

कहीं ख़तरे में पड़ जाए बुज़ुर्गी अपनी

लोग इस खौफ़ से छोटों का अदब कर रहे हैं

(मतब=दवा बेचना )

******

रिश्तों की दलदल से कैसे निकलेंगे

हर साज़िश के पीछे अपने निकलेंगे

चाँद सितारे गोद में आकर बैठ गये

सोचा ये था, पहली बस से निकलेंगे

अपने खून से इतनी तो उम्मीदें हैं

अपने बच्चे भीड़ से आगे निकलेंगे

शकील जमाली समाज में फैली बुराइयों को आँख मूंदकर और बहरे बनके सहन नहीं कर सकते ,बेशर्मी की डोर तहज़ीब की पतंग को आसानी से काटती चली जा रही है ऐसे में शकील जमाली की क़लम ख़ामोश नहीं रह सकती या यूँ कहूँ कि शकील जमाली ने अपनी क़लम के ज़रिये निज़ाम (वयवस्था ) के खिलाफ़ विरोध भी जताया है और अपने जज़बात का इज़हार भी किया है। शकील जमाली ने उस सियासतदाँ का एहतराम किया है जो दरवाज़े पे आने वाले शख्स का नाम नहीं बल्कि उसका काम पूछता है। समाज के तमाम मोज़ूआत को शकील जमाली ने शाइरी बनाया है :---

उठाकर सर कभी चलने की हिम्मत ही नहीं होती

सियासी आदमी में रीढ़ की हड्डी नहीं होती

यहाँ मेहनत की रोटी भी बड़ी मुश्किल से पचती है

वो सारा मुल्क खा जाएँ तो बदहज़मी नहीं होती

भरोसा ख़त्म हो जाने पे कुछ बाक़ी नहीं रहता

ये वो काग़ज़ है जिसकी कार्बन कापी नहीं होती

*****

यहाँ इन्साफ ने आँखों पे पट्टी बाँध रखी है

शराफ़त जेल में सडती है ,गुंडा छूट जाता है

अगर कुछ देर को हम लोग लड़ना भूल जाते हैं

हमारी राजनीति को पसीना छूट जाता है

*************

टूटने की जसारत में टूट जाते हैं

कुछ आइने तो हिफ़ाज़त में टूट जाते हैं

किसी ग़रीब को इंसाफ़ मिल नहीं सकता

गवाह जा के अदालत में टूट जाते हैं

(जसारत = कोशिश)

शकील जमाली की ग़ज़लों का पहला संग्रह "धूप तेज़ है" 1999 में आया जिसने ग़ज़लों का वो गुलदस्ता अदब को दिया जिसमें फूलों की ख़ुश्बू के साथ- साथ तन्ज़ के वो कांटे भी है जिसकी चुभन ठन्डे पड़ गये खून की रवानी को बढ़ा देती है। वीनस म्यूजिक कम्पनी ने शकील जमाली के लिखे गीत और उनकी ग़ज़लों के कई एल्बम निकाले जिसमें मुख्य है :--दिल का हाल सुने दिलवाला,दिल के टुकड़े हज़ार हुए और ताज़ा हवा लेते हैं ये सब अल्ताफ राजा ने गाए हैं।

इस नकली अदब के दौर में अपनी पहचान बनाए रखना बहुत मुश्किल है ,पहली बात तो बुलंदी को छू पाना ही बहुत कम लोगों के नसीब में होता है अगर छू लो तो फिर उसपे टिके रहना, अपने मेयार को बनाए रखना भी बड़ा दुश्वार तरीन काम है जो कि शकील जमाली कर रहे हैं। बिना किसी अदबी सरपरस्ती के सिर्फ़ अपने मुतआले (अध्ययन) और सलाहियत के दम पे शकील जमाली ने अदब की ज़मीन पर अपना खूबसूरत शामियाना बड़ी मज़बूती से लगा रखा है। ये भी तय है कि मंच पर लतीफे और तरन्नुम में ग़ज़ल पढ़ने वाले मुशायारेबाज़ों की आंधी इस शामियाने को हिला भी नहीं सकती। मशहूर शाइर मुनव्वर राना ने कहा था की शकील जमाली बहुत खुशनसीब शाइर है क्यूंकि उनकी ग़ज़ल से क़ारी (पाठक) पूरे रिसाले (पत्रिका) की क़ीमत वसूल कर लेता है। शकील जमाली समाज में घटित होने वाली हर घटना और ज़िन्दगी के हर पहलू से शे'र निकालते है कुछ अशआर तो उनका हवाला भी बन गये हैं :----

अदावतों को भी शाइस्तगी से लेना है

अब इंतकाम बड़ी आजज़ी से लेना है

मैं अपने घर में अकेला कमाने वाला हूँ

मुझे तो सांस भी आहिस्तगी से लेना है

ये काम सख्त बहुत है मगर ख़ुदा की कसम

हलाल रिज़्क ,इसी नौकरी से लेना है

(अदावत =दुश्मनी ,शाइस्तगी =शालीनता ,आजज़ी =विनम्रता ,रिज़्क=अनाज़ )

शकील जमाली की शाइरी बड़ी बेबाकी से सच बयान करने के साथ - साथ सलाह मशविरे भी करती है अगर ये कहूँ तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी कि शकील जमाली का क़लाम नसीहतों का मानीखेज़ आइना है जिसमें हर शख्स अपनी असली तस्वीर देख सकता है और फिर उसे वहम नाम का मर्ज़ भी परेशान नहीं करता।

बहादुर है तो ऐसा मत किया कर

कभी पीछे से हमला मत किया कर

बिखर जाएगा शख्सीयत का जादू

बहुत कालर को ऊँचा मत किया कर

रहा सहा कोई रिश्ता भी टूट जाता है

शिकायतों से कोई फ़ायदा नहीं होता

रिआयतों की दिल-आवेज़ तख्तियों पे जा

दुकानदार किसी का सगा नहीं होता

मेरे नज़रिए से शकील जमाली का क़लाम अपना हाल और मुस्तकबिल ( वर्तमान और भविष्य ) देखने के लिए किसी नज़ूमी (ज्योतिषी ) को अपनी हथेली नहीं दिखाता है क्यूंकि उनका क़लाम अपने हाथों के हुनर पे एतबार करता है ना कि हाथ की लकीरों पर। शकील जमाली को जब - जब पढ़ा या सुना तो यूँ लगा कि ये शख्स अदब की वो शख्सीयत हो गया है जो शाइरी को चूरन की तरह नहीं बेचता है बल्कि अपनी शर्तों पे सुनने के लिए सामईन को मजबूर करता है। यही शाइरी का वक़ार है और शाइर का भी। अलग - अलग मनाज़िर (दृश्य ) को शकील जमाली ने किस तरह ग़ज़ल बनाया है मुलाहिजा हो :---

सफ़र से लौट जाना चाहता है

परिंदा आशियाना चाहता है

कोई स्कूल की घंटी बजा दे

ये बच्चा मुस्कुराना चाहता है

हमारा हक़ दबा रखा है जिसने

सुना है हज को जाना चाहता है

छोटी बहर में बड़ी बात कहने का फ़न भी शकील जमाली अपनी क़लम की सियाही में रखते हैं, छोटी बहर में उनके ये अशआर इस बात की पुष्टि करते हैं :---

फ़क़त हमवार करने के लिए है

दवा बीमार करने के लिए है

ये झगडा ,ये धमाका , ये ख़ामोशी

ख़बर तैयार करने के लिए है

**

बोलता है तो पता लगता है

ज़ख्म उसका भी नया लगता है

कितने ज़ालिम हैं ये दुनिया वाले

घर से निकलो तो पता लगता है

दो क़दम पर है अदालत लेकिन

सोच लोवक़्त बड़ा लगता है

नई ग़ज़ल वाक़ई नसीब वाली है जिसे शकील जमाली जैसे शाइर मिले हैं। शकील जमाली नाम की शख्सीयत को समझने के बाद मैं इतना दावा तो कर सकता हूँ कि उनके अशआर अगर कोई मुर्दा ज़मीर सुन ले तो वो चाहे कितनी भी नींद की गोली खा ले उसे तब तक नींद नहीं आ सकती जब तक उसका सोया ज़मीर जाग न जाए। शकील जमाली की मौजूदगी अदब की रूह को सुकून देती है और आज की शाइरी को शकील जमाली की बहुत ज़रूरत है। शकील जमाली के इन्ही मिसरों के साथ इजाज़त लेता हूँ अगले हफ्ते मिलते हैं एक और शख्सीयत के साथ ...

रात दिन सिर्फ़ इंतज़ार किया

वक़्त को मसअला बनाया नहीं

वक़्त का एहतराम करते रहो

वक़्त सुल्तान है,रिआया नहीं

--

विजेंद्र शर्मा

vijendra.vijen@gmail.com

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