बुधवार, 11 अप्रैल 2012

रश्मि का आलेख - नारी की असली पहचान का कायल है समाज ...?

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ये बात तब एक प्रश्नचिन्ह के साथ सामने आती है जब एक औरत अपने बच्चों को स्कूल से अपनी कार में लाते वक़्त ट्रैफिक सिग्नल के पास आगे पीछे खड़ी गाड़ियों में फंस जाती है और वहाँ से निकलने की कोशिश करती है तभी एक दो और गाड़ियों में सवार सभ्य पुरुष बजाए उस महिला की मदद करने के, आँखें दिखाते अपनी बड़ी गाड़ी से निकलते हुए बोलते हैं कि ''मैडम जब गाड़ी चलानी नहीं आती तो चलाते ही क्यों हो? आ जाती हैं न जाने कहाँ कहाँ से ....रास्ता रोक के खड़ी हैं कब से ? हमें पहले ही इतनी देर हो गई है ,ये मैडम हैं कि और देर करवा रही हैं..!

इतने में आवाज़ सुनकर महिला ट्रैफिक पुलिस आती है और वहां से भीड़ को हटाने और उन् 'सभ्य 'कहलाने वाले पुरुष को शांति से नियम मानने का आदेश देती हैं और उस कार वाली महिला को अपनी गाड़ी निकलने का निर्देश देती है लेकिन यह सुनते ही वही व्यक्ति आग बबूला हो जाता है ..बिना जाने समझे की किसकी गाड़ी आगे है किसकी पीछे या ट्रैफिक महिला पुलिस के निर्देश को माने बिना बोलता जाता है ....वाह भई वाह !अरे मैडम जी ये औरत न तो गाड़ी चला रही है न हमें आगे जाने दे रही है....और आप हो की उसको ही पहले जाने को बोल रही हो..ऐसा नहीं चलेगा....!हम लेट हो रहे हैं !और व्यर्थ ही गुस्से से उस महिला कार चालक से बदतमीज़ी पर उतर आया ...ओ मैडम !..नहीं आती न तो न चला ..घर में बैठ ...हट गाड़ी हटा ...!

और उस व्यक्ति ने न तो उस महिला कार चालक का ,न ही ट्रैफिक महिला पुलिस का सिर्फ उनका ''औरत '' होने की वजह से कुछ भी लिहाज़ किया !

तो प्रश्न उठता है कि क्या आज भी नारी कितनी भी आगे बढ जाए उसको वही सम्मान मिल पा रहा है ?क्या केवल पुरुष ही सही काम करते हैं?क्या उनको ही सिर्फ गाडी चलानी आती है और उनसे कोई गलती या दुर्घटना नहीं होती ?जहाँ जरा सी भी नारी से चूक हुई नहीं कि पुरुष वर्ग आँखे तरेर कर हाथ घुमा कर औरत को खरी खोटी सुनाने से बाज़ नहीं आता !

क्या उस भीड़ में से कोई और पुरुष आगे आकर उस महिला की मदद करने और उस बदतमीज़ पुरुष को चुप करवाने नहीं आ सकता था? नहीं...!क्यों कि सब को ही देर हो रही थी !या फिर वो शायद उस व्यक्ति की अनजाने में ही हाँ में हाँ मिलाने की कवायद में थे ! ऐसा क्यों होता है कि पुरुष वर्ग महिला वर्ग को आगे बढता देख नहीं पाता? महिलाओं को आगे लाने और उनका साथ देने की दलीलें खोखली साबित क्यों हो जाती हैं ?

देश को आगे बढ़ाने में समाज का योगदान होता है और वही समाज केवल पुरुष प्रधान तो नहीं है ?उस में नारी का भी तो बराबर का योगदान है !फिर हमारा समाज शहरों कस्बों ,जिलों के मिश्रण से बना है पर अफ़सोस कि समाज के इन्ही महत्वपूर्ण हिस्सों के लोगों में औरत की स्थिति आज भी वही है जहाँ छोटी से छोटी बातों के लिए भी औरत को ज़लील करने से पुरुष पीछे नहीं हटता! नारी के अधिकारों की अवहेलना की जाती है !

कुछ भी अच्छा करना हो या नया करना हो तो शुरुआत अपने घर से ही की जाती है ताकि उस शुरुआत से बड़े परिवर्तन को आकार दिया जा सके !फिर अगर अपने घर की नारी हो या दूसरे घर की, नारी का अपमान करके क्या एक अच्छे समाज का निर्माण हो सकता है? नारी का मानसिक शोषण करना छोड़ कर उसके सहयोग से ही उसके अस्तित्व को स्वीकार कर के ही एक स्वस्थ समाज की संरचना हो सकती है !

ऊपर वर्णित घटना मात्र एक छोटा सा उदाहरण है नारी के मानसिक शोषण का !जो नारी एक अच्छी पत्नी,माँ,बहन,के साथ साथ देश की बागडोर सँभालने और चांद की ऊँचाइयों को भी छूने की क्षमता रखती है क्या वो उस पुरुष को मुंह तोड़ जवाब नहीं दे सकती थी? दे सकती थी ! पर चुप थी तो अपनी बगल में बैठे बच्चों को देख कर जो उस असभ्य व्यक्ति की आवाज़ सुनकर सहम गए थे और वो औरत अपने बच्चों को प्यार से सहला रही थी या फिर वो खामोश थी तो अपने अन्दर निहित संस्कारों की वजह से क्यों कि वो उस असभ्य पुरुष से दो चार होकर खुद को असभ्य कहलाने से बच कर अपने बच्चों के साथ सुरक्षित अपनी मंजिल की ओर बढ़ना चाहती थी !ये भी तो एक नारी के महान होने का सबूत है जहाँ वो अपने व्यवहार ,अपनी ममता का लोहा मनवाने से पीछे नहीं हटती !

rashmi tarika

tarikarashmi@yahoo.in

11 blogger-facebook:

  1. उत्‍कृष्‍ट लेखन ..

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  2. बिल्कुल सही कहा...धन्यवाद.

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  3. एक सार्थक पोस्ट....वह महिला ही नही, एसे असभ्य लोगों के सामने तो सभ्य पुरुष भी चुप रह जाते हैं कि कौन असभ्य के मुंह लगे....उन महिला का संयम तो उचित ही था....
    --- परन्तु प्रश्न अन्य लोगों का है जो कुछ नहीं कहते...परन्तु जब पुलिस-कान्स्टेबल उपस्थित है तो उसने उचिर कार्यवाही क्यों नहीं की....
    ---मूल प्रश्न वही है कि हम सभी...स्वयं नागरिक अधिकारॊ( महिला हो या पुरुष) का उचित प्रयोग कर हस्तक्षेप करना कब सीखेंगे, कब तक हमें क्या..सोच्ते रहेंगे..
    --- और कारण यह भी है कि सभी बडी जल्दी मेम हैं...कौन पचडे में पडे...परन्तु हम सभी को अन्तर्मंथन तो करना ही चाहिये...

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  4. mahilaon ko aatnirbhar banta dekhna abhi bhi kuchh purushon ke liye ashyaneey hai..isliye ve is kuntha ko nikalne ke liye kisi bhi had tak ja sakte hain.

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  5. ji shukria aap sab ka @ rohit,ojaswi,dr.shayam gupta n parin amrita ji....

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  6. बहुत सुंदर और विचारोतेजक लेख ....हार्दिक बधाई |

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  7. उत्‍कृष्‍ट लेखन पर हार्दिक बधाई |

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  8. बेनामी4:38 pm

    ap ek asabhya vyakti ki vajah se pure purush varg ko aisa nahi kah sakti.....kyunki ap bhool rahi hai...apki rashtrapati mahila hai....aur vo shayad purush varg ki hi den hai....

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