मंगलवार, 24 अप्रैल 2012

यशवन्‍त कोठारी का आलेख - पैदल-यात्री का क्‍या होगा ?

 

 

आज कल पैदल चलना कितना मुश्‍किल हो गया है। ये बात हर शख्‍स को मालूम है। गाडि़यों पर चढ़ा शहर हर पद यात्री से यही पूछता है- तैरा क्‍या होगा रे पैदल यात्री। तू मेरे हाथों क्‍यों स्‍वर्ग या नरक जाना चाहता है ? आज जब सर्वत्र मनुष्य ने मनुष्य पर अतिक्रमण कर रखा है तब पैदल चलने वालों की जगहों पर अतिक्रमणों की भरमार है। सरकार सुनो क्‍या पदयात्री के लिए कोई जगह बची है। बड़े बुजुर्ग, महिलाएँ, बच्‍चे सब के सब दुखी है उपर से ट्रैफिक पुलिस की पुलिसगिरी। सड़क पार करने के पहले और सफलतापूर्वक पार कर लेने के बाद ईश्‍वर को धन्‍यवाद देना जरुरी हो जाता है। स्‍कूली बच्‍चे अैर उनकी मम्‍मियों की मुसीबत सबसे ज्‍यादा है।

गली, मोहल्‍लों में भी पैदल चलना दुश्वार है। फिर चोर-उच्‍चके, सड़क छाप मजनूं और मोबाईल, या बाइक वाली नई पीढ़ी। कैसे चले बेचारा पैदल यात्री। फुटपाथ और जेबरा क्रासिंग तो केवल फाइलों में रह गये है। सड़क पर दुर्घटना के बाद भी कोई सम्‍भालने वाला नहीं मिलता कौन पड़े इस झंझट में का भाव है सबके चेहरे पर। संवेदनहीनता और संवाद शून्‍यता का अद्‌भुत नजारा देखने को मिलता है। कभी कोई टीवी कैमरे वाला इस सम्‍पूर्ण पैदल चलने वाले की तब तक फोटो खींचता रहता है जब तक वो मर नहीं जाता। सड़क पर पैदल चलना एक बड़ी करतब बाजी है।

विदेशों में पद-यात्री को देखकर सम्‍मान में ट्रेफिक रुक जाता है, यहाँ पर पदयात्री के गिर जाने पर इतने वाहन गुजर जाते है कि पैदल चलने वालों के मन में हमेशा के लिए डर बैठ जाता है। कभी भीड़ भरे चौराहे पर खड़े होकर पैदल यात्री की समस्‍याओं पर गौर करे श्रीमान्‌ ! क्‍या ट्रेफिक में एक लाइट केवल पद- यात्रा के लिए बनाई जा सकती है या क्‍या एक ट्रेफिक पुलिस वाला केवल इसी काम के लिए लगाया जा सकता है। स्‍कूलों की छुट्‌टी के बाद तो बच्‍चों की भीड़ को सड़क पार कराना किसी एवरेस्‍ट को फतह करने के बराबर है। दुर्घटनाओं के आंकड़े गवाह है कि ज्‍यादातर सड़क दुर्घटना में पद-यात्री ही मारा जाता है और दुर्घटना-बीमा कम्‍पनी पद-यात्री की गलती बता देती है।

पैदल चलने वालों के बारे में भी सरकार, पुलिस, स्‍वयं सेवी संस्‍थाओं और व्‍यापार मण्‍डलों को सोचना चाहिये। बरामदे न सही सड़क का एक हिस्‍सा तो पदयात्री के लिये सुरक्षित रहे क्‍या ख्‍याल है आपका। लेकिन पूरे कुएँ में ही भांग पड़ी हुई है। सरकार हो या व्‍यापारिक प्रतिष्ठान अतिक्रमण उनका जन्‍म सिद्ध अधिकार है। और समरथ को नहीं दोष गुंसाई। पैदल चले। सेहत अच्‍छी रहेगी। मगर कहाँ चले पैदल। फुटपाथ, सड़क, बरामदे, चौराहे, गलियां सब के सब भरे पड़े हैं। अटे पड़े हैं वाहनों से, अतिक्रमणों से, बेचारा पैदल यात्री यदि सही सलामत घर पहुँच जाये तो भगवान का शुक्र मानता है। शादी ब्‍याह, जुलूसों, धार्मिक यात्राओं के दौर में तो ऐसा जाम हो जाता है कि पैदल-यात्री सोचता है घर से ही क्‍यूं निकला। फिर प्रदूषण, धूल, धुआं-धक्‍कड़ और पी․ पी․-सीटी- कहाँ से गुजरे पदयात्री। पद यात्रा करके कुछ लोग कहाँ से कहाँ पहुँच गये पर बेचारा पैदल यात्री कहीं नहीं पहुँचता क्‍यों कि यहाँ हर कोई जल्‍दी में है मगर कोई भी कहीं भी नहीं पहुँचता। वैसे वाहन चालक ये मान कर चलता है कि सड़क मेरे बाप की है और पैदल चलने वाले कीड़े, मकोड़े, ऐसी स्‍थिति में बेचारे पैदल यात्री का क्‍या होगा ? 0 0 0

यशवन्‍त कोठारी, 86, लक्ष्‍मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर, जयपुर - 2, फोन - 2670596

ykkothari3@gmail.com

मो․․09414461207

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  1. पैदल यात्री के लिए फुटपाथ तक नहीं बचे हैं श्रीमान | चौड़ी होती हुयी सड़कें पहले फुटपाथ गटकती हैं और फिर किनारे के पेड़ों को हजम करती हैं| फुटपाथ होते थे तो दिन में पैदल यात्री के चलने के और रात को बेघर आदमी के सोने के काम आते थे|शहर को सुन्दर दिखाना हैपैदल और बेघर आदमी उसके स्तर को नीचा करते हैं | फुटपाथ ख़त्म कर एक झटकें में सारे शहर का जीवन स्तर उंचा दिखाया जा रहा है |

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  2. AMARNATH 'MADHUR' ने आपकी पोस्ट " यशवन्‍त कोठारी का आलेख - पैदल-यात्री का क्‍या होगा... " पर एक टिप्पणी छोड़ी है:

    पैदल यात्री के लिए फुटपाथ तक नहीं बचे हैं श्रीमान | चौड़ी होती हुयी सड़कें पहले फुटपाथ गटकती हैं और फिर किनारे के पेड़ों को हजम करती हैं| फुटपाथ होते थे तो दिन में पैदल यात्री के चलने के और रात को बेघर आदमी के सोने के काम आते थे|शहर को सुन्दर दिखाना हैपैदल और बेघर आदमी उसके स्तर को नीचा करते हैं | फुटपाथ ख़त्म कर एक झटकें में सारे शहर का जीवन स्तर उंचा दिखाया जा रहा है |

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