'देवेन्द्र कुमार पाठक' का एक ग्रीष्म-गीत - तीन पात ढाक के

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तीन पात ढाक के

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अंधड़ हम तपते बैसाख के.

वर्षोँ की इस लंबी जाग का,

सारे ऋण-योग, गुणा-भाग का;

हासिल, बस तीन पात ढाक के !

दिन-दुपहर,सुबह-शाम गति,गति,गति !

पहिए-से पाँवोँ की मात्र यह नियति !

ढूह लगे सपनोँ की राख के .

स्वेद की सियाही से लिक्खी तक़दीर ,

हाथ आई भूख-प्यास, अंतहीन पीर ;

फूल झरे आँखोँ की शाख के !

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3 टिप्पणियाँ "'देवेन्द्र कुमार पाठक' का एक ग्रीष्म-गीत - तीन पात ढाक के"

  1. हिन्दुस्तान की अस्सी फ़ीसदी आबादी के हिस्से खुद के सपनों की राख ही आई है अब तक.व्यस्था ने हमेशा ही ऐसे प्रपंच रोपे हैं कि जनतंत्र में जन का जीवन बेहाल है, जीना मुहाल है और तंत्र डंसने ,कसने में निरंतर संलग्न है.अच्छे गीत के लिए बधाई.

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  2. Dharmendra Tripathi7:12 pm

    antheen dard ko bayan karta hua geet.

    उत्तर देंहटाएं

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