बुधवार, 4 अप्रैल 2012

मोतीलाल की कविता - उजाला

Image000 (Custom)

एक समय
ऐसा भी आता है
जब स्मृतियाँ
चमड़ा बन जाती है
और सूखने लगती है
करूणा की जमीन
बदल जाते हैँ
कैलेण्डरोँ की तारीखेँ

लगता है
हम खड़े नहीँ रह पायेँगे
अपने ही जमीन पर

हर मूल्य
ढह जाएंगेँ
और बदल जाएंगेँ
गुफाओँ मेँ
कोई ठीक नहीँ
हमारे आँगन से
अंतरिक्ष तक
उग आए
ढेर सारे नागफनी

तब
कुछ भी नहीँ बच सकेगेँ
न हमारी प्राथनाएँ
न गीता के वचन
न ही ये सेटलाईट
न ये कम्प्यूटर

भीतर का सैलाब
जब जाग उठेगा
और हम कैद हो जाएगेँ
महाशून्य के भीतर
तब मिट्टी के लोदोँ से
हम नहीँ बना सकेगेँ
कोई सुन्दर सी आकृति
ताकि दीप जलाया जा सके

अंतरिक्ष से
जमीन तक
घूमने लगते हैँ कालरथ
उन विचारोँ को ढोये
जो हमारे ठंडे तलुओँ को
गर्मा देते है
और हो जाती है
भाषा की धार खूब तेज
साफ होने लगते है
दर्पण की धूल
मिटने लगती है तब
हमारी सारी असंगतियाँ

इस समय
यही इच्छा
चौखट से लांघ जाती है
फूलोँ के बगीचोँ मेँ
और दुःखोँ के जहरोँ को
उगल देते हैँ
समुद्र की गहराई मेँ
यह जानते हुए कि
शिव इसे पी जाएगेँ
और बच जाएगेँ
हमारे धूप के सारे टूकड़े ।

* मोतीलाल/राउरकेला 

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------