शनिवार, 14 अप्रैल 2012

एस. के. पाण्डेय की लघुकथा - भ्रम

भ्रम

क राजा था जो बहुत ही आस्तिक था। उसके राज्य में एक घोर नास्तिक रहता था। वह कहता था कि ईश्वर नहीं है। वह अपने इस मत के प्रचार-प्रसार में लगा रहता था। धीरे-धीरे यह बात राजा तक पहुँची। राजा ने उसे दरबार में पेश करने की आज्ञा दी।

वह राजदरबार में लाया गया। राजा ने पूछा कि तुम कहते हो कि ईश्वर नहीं है। नास्तिक बोला जी महाराज। राजा बोला कि क्या तुम्हें नहीं लगता कि यह संसार बनाने और चलाने वाला कोई है। जैसे मैंने खुद इस राज्य को बनाया है। मैंने ही इसकी स्थापना की थी। और अब मैं अपने राज्य को चलाता हूँ। अधिकारी नियुक्त कर रखें हैं। इसी से राज्य के सारे कार्य नियत समय पर और सुचारू रूप से होते रहते हैं। कोई भी राज्य हो अथवा प्रतिष्ठान हो तो वह बिना किसी के देखरेख के थोड़े चलता है। उसे चलाने वाला कोई न कोई होता है।

हम सब देख रहे हैं कि प्रकृति के सारे काम नियत समय पर और सुचारू रूप से चल रहे हैं। जाड़ा, गर्मी, और बरसात एक के एक बाद एक नियत समय पर बारी-बारी से आते हैं। दिन के बाद रात होती है। सूरज रोज उगता है और अस्त होता है। चाँद और तारे रोज रात्रि की शोभा बढ़ाते हैं। हर जीवधारी की मृत्यु होती है। आदि। यह व्यवस्था चलाने वाला कोई तो है।

नास्तिक बोला जी महाराज। संसार बनाने वाला और चलाने वाला कोई है। यह सत्य प्रतीत होता है। लेकिन संसार बनाने वाले को किसने बनाया यह समझ में नहीं आता। महाराज, मेरा यही प्रश्न है कि संसार को यदि भगवान ने बनाया है तो भगवान को किसने बनाया। मुझे इसका उत्तर आज तक नहीं मिला।

राजा ने मंत्री की ओर देखा। राजा का मंत्री सुजान बोला महाराज मैं इस प्रश्न का समुचित उत्तर दे सकता हूँ। लेकिन उसके लिए हमें छे महीनें का समय चाहिए। नास्तिक को छे महीने बाद पुनः दरबार में उपस्थिति होने का आदेश देकर भेज दिया गया। इधर मंत्री अपने घर आया। मंत्री को बिचार में डूबा हुआ देख उसकी पत्नी ने कारण पूछा। मंत्री ने सारी बात यथावत बता दी। पत्नी ने भगवान के ऊपर छोड़ देने की बात कहकर सांत्वना दिया।

सुबह होने पर मंत्री की पत्नी की सहेली उनके यहाँ आई। उसने अपने पति के स्वस्थ हो जाने की बात बताई। मंत्री ने पूछा वे तो कई वर्ष से बीमार थे। स्वस्थ हो गए यह बहुत खुशी की बात है। लेकिन मैं यह जानना चाहता हूँ कि वे स्वस्थ कैसे हुए। उसने बताया कि मेरे ननद के गाँव में एक व्यक्ति को यही समस्या थी। वह जिस दवा से ठीक हुआ था, वही हमारे ननदोई पिछले महीने देकर गए थे।

मंत्री, पत्नी की सहेली के ननदोई से मिलने चल दिया। मिलकर मंत्री ने पूछा आपको यह दवा कहाँ से मिली ? उसने अपने गाँव के उस व्यक्ति के पास मंत्री को ले गया जिसने वह दवा उसे दी थी। मंत्री ने उससे पूछा कि यह दवा आपको कहाँ से मिली ? उसने जिसको बताया मंत्री उससे मिलने चल दिया। इस तरह राज्य में एक जगह से दूसरे जगह घूमते हुए उसे पाँच महीने बीत गए। लेकिन मंत्री ने आशा नहीं छोड़ी।

अंत में मंत्री एक बूढ़े किसान के पास पहुँचा और बोला कि बाबाजी आपको यह दवा किसने बताई। वह बोला किसी ने नहीं। मंत्री बोला मेरा मतलब है कि आपको यह दवा कहाँ से मिली ? वह बोला मुझे किसी ने नहीं दी। मंत्री का चेहरा खुशी से चमक उठा। और बोला पिछले पाँच महीने और पच्चीस दिन से मैं आपको ही खोज रहा हूँ। मंत्री उस बूढ़े को लेकर राजधानी की ओर चल पड़ा। बाकी के लोग जो एक दूसरे को दवा बताई थी अथवा दी थी, उन्हें लेकर सैनिक पहले ही राजधानी पहुँच चुके थे।

छे महीने का समय पूरा हो गया। नास्तिक फिर से उपस्थिति हुआ। दवा के सारे उपयोगकर्ताओं को लाइन से खड़ा कर दिया गया। मंत्री ने बूढ़े को लाइन के बिल्कुल अंत में खड़ा कर दिया। फिर एक-एक आदमी से पूछना शुरू किया कि यह चमत्कारिक दवा आपको कहाँ से मिली। पहले ने दूसरे को बताया, दूसरे ने तीसरे को........। बूढ़े तक पहुँचते ही यह सिलसिला टूट गया। बूढ़े से राजा ने पूछा कि आपको यह दवा कहाँ से मिली ? बूढ़ा बोला अन्नदाता मुझे न किसी ने इसके बारे में बताया और न ही किसी न मुझे दिया। मैं ही इसका निर्माता हूँ। जन्मदाता हूँ।

एक दिन मैं एक जंगल से गुजर रहा था। शेर की गर्जना सुनकर लगा कि शेर मेरी ही ओर बढ़ा चला आ रहा है। मैं यथा शक्ति भागने लगा। भागते समय मेरा पैर किसी पत्थर से टकरा गया और मैं गिर कर अचेत हो गया। मैं कई घंटे वहाँ पड़ा रहा। मेरे पैर में पीड़ा होती रहती थी। होश आने पर मुझे लगा कि मेरी पुरानी पीड़ा काफी हद तक शांत है। इसे मैं पैर से दबी हुई वनस्पति का चमत्कार समझ कर उसे मैं दवा के रूप में इस्तेमाल करने लगा। जिससे वर्षों पुरानी मेरी वह बाधा मिट गई। और बाद में मैं उन वनस्पतियों का रस और लोगों को देने लगा।

नास्तिक राजा के पैरों पर गिर पड़ा। उसे अपने भ्रम पर लज्जा आ रही थी। बोला महाराज मुझे मेरे प्रश्न का उत्तर मिल गया। वस्तुतः यह प्रश्न नहीं, बल्कि मेरा भ्रम था। आज मंत्री जी द्वारा जुटाई और बनाई गई यह मानव श्रृंखला जैसे इस बूढ़े व्यक्ति पर समाप्त हो गई। ठीक इसी तरह हर श्रृंखला का अंत तो होता ही है। सांसारिक निर्माण की श्रृंखला का अंत ईश्वर है।

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डॉ. एस. के. पाण्डेय,

समशापुर (उ.प्र.)।

URL1: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/

ब्लॉग: http://www.sriramprabhukripa.blogspot.com/

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