बुधवार, 18 अप्रैल 2012

देवेन्द्र कुमार पाठक की कविताई 'दोहे बैसाख के'

गर्म मिज़ाज़ हुई हवा, लगते ही बैसाख |

सूरज दिखलाने लगा, लाल भभूका आँख |1|

 

हवा हो गई बेहया, भूली सब मरजाद |

खरी दुपहरी डोलती, ठाँव कुठाँव अबाध |2|

 

अंबर जले अलाव-सा, तपेँ तवा-से खेत|

सूखे नदियोँ के नयन, घाम निचोड़े रेत |3|

 

जले भूख की आग मेँ, गहना,गोरू,खेत |

मरघट जैसे गाँव मेँ, हम-तुम ज़िन्दा प्रेत|4|

 

प्यास-पसीना,घाम-लू , आँधी-अंधड़,धूल|

डगर-डगर,डग-डग उगे, मानो भू पर शूल|5

 

अधरोष्ठोँ के पृष्ठ पर, आलेखित है प्यास|

आँखोँ की मरुभूमि पर, दहक रहा संत्रास|6|

 

टीका-ब्याह,दहेज का , है बैसाख दलाल|

बलि की गौ है बेटियाँ, बलिवेदी ससुराल|7|

 

बैसाखी दिन की थकन, मन-अंतस बेचैन |

हड़क गई आई न फिर, नीँद समूची रैन|8|

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