सोमवार, 30 अप्रैल 2012

विनायक पाण्डेय की कविता - मैं चला

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  मैं चला

यूँ ही होता रहा दर से बदर मैं

हर बार एक नया ठिकाना मिल गया

गम तो बहुत दिए जिन्दगी ने लेकिन

हमेशा हंसने का कोई बहाना मिल गया


सितम ढाने वालों से कह दो

उनका सितम बड़ा हसीन था

पर अफ़सोस कि जिन्दा हैं अभी

क्योंकि जिन्दगी पे यकीन था


सैलाब बहा ले जाये किनारा पर

किनारा खत्म होता नहीं

बसते है गुलशन उजड़ के

पतझड़ सदा रहता नहीं


है मुकम्मल सारी दुनिया

दिल जो अपने साथ है

बंद कर आँखें और देख

ख्वाहिशों की रात है


दिल के कोने में

उम्मीदों की लौ जला

खुद गिरा और खुद ही संभला

और आज मैं फिर चला

--

तेरे अक्स
बीते हुए लम्हों की
गुजरी परछाईयों में
आँखों से मेरी झांको
दिल की गहराईयों में
अक्स हैं तेरे तेरे
नक्श हैं तेरे तेरे

उजली सी सुबह जैसा
रोशन वो चेहरा तेरा
भूलूं मैं कैसे भूलूं
रूह पे छाये जो मेरे
अक्स हैं तेरे तेरे
नक्श हैं तेरे तेरे

यादों की तन्हाईओं में
पल पल दिल डूबता जाये
ख्वाबों के आसमां पे
बादल बनके जो बिखरे
अक्स हैं तेरे तेरे
नक्श हैं तेरे तेरे

अक्स हैं तेरे तेरे
नक्श हैं तेरे तेरे
 

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