सोमवार, 30 अप्रैल 2012

विश्वजीत सपन की ग़ज़ल - सुन हमारी कहानी ज़माना उफ़क़ पे खूँ लगा जा रहा था

एक ग़ज़ल
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आज दिल जो जला जा रहा था
आग उसमें उठा जा रहा था


जिसने देखा तमाशा अजल का,
ख़ाक में वो मिला जा रहा था


फूल सब जल चुके थे ख़िज़ाँ में
फ़लक़ में लौ उठा जा रहा था


जिस्म में अब हरारत हमारी
ज़िन्दगी को दिखा जा रहा था


सुन हमारी कहानी ज़माना
उफ़क़ पे खूँ लगा जा रहा था


ग़ैर की जिन्दगी में ‘सपन’ तो
बन मसीहा घुटा जा रहा था

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  1. आदरणीय सपन साहब ने प्रयास किया, इस हेतु उन्हें साधुवाद... बेहतर हो कि सपन साहब ग़ज़ल के शिल्प विन्यास को और भी अच्छे से पढ़ें और आत्मसात करें, तो ग़ज़ल कहने में पैनापन आएगा... साथ ही व्याकरण दोष तो बहुत अधिक है... केवल रदीफ़-क़ाफ़िया बांधने के लिये किसी सम्बोधन का लिंग परिवर्तन तो क्षम्य नहीं माना जाएगा, यथा - "आग उसमें उठा जा रहा था" आग उठती है... "फ़लक़ में लौ उठा जा रहा था" लौ उठती है..."ज़िन्दगी को दिखा जा रहा था" अब इसे क्या कहें... ख़यालों में भी काफ़ी बिखराव हमें लगा, यथा -"सुन हमारी कहानी ज़माना, उफ़क़ पे खूँ लगा जा रहा था..." हमारा मानना है कि ग़ज़ल कहने से पहिले हमें उस्ताद शायरों को ख़ूब पढ़ना भी चाहिए और उसके मूलभूत तत्वों की बेहतर जानकारी भी कर लेनी चाहिए... अन्यथा ग़ज़ल जैसी उम्दा, सुन्दर और अत्यंत गहरे दर्शन से भरी ये सार्थक साहित्य विधा अपनी गरिमा के अनुकूल नहीं रह पायेगी... क्षमायाचना सहित हम अपने विचार यहाँ रख रहे हैं, हमारा उद्देश्य रचनाकार को निराश करना नहीं, वरन बेहतर के लिये अभिप्रेरित करना है....

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    1. क्या बात है... हमें यही आशा थी कि कोई हमें कमियां बताये... बहुत बहुत आभार...

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    2. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  2. लेकिन एक दो बातें कहना चाहूँगा... अश'आर में 'तखय्युल' और 'तग़ज्जुल' को भी देखना होता है... शरीर में कोई हरकत ही ज़िन्दगी कि निशानदेही हो सकती है... उफ़क़ पे ... भी इसी तरह तख़य्युल का मुजाहरा है... वैसे एक जाने-माने शायर कि एक ग़ज़ल देखें...
    जब भी आती है तेरी याद तेरे जाने के बाद
    सोज़े-ग़म दिल को जलाती है तेरे जाने के बाद...
    अगर केवल ग़लतियाँ ही दिखानी हो तो ये देखिये अग़लात देखें...
    सुख़न-ए-मीर तक़ी मीर कहते हैं…
    इन तुयूरों से हूँ मैं भी अगर आती है सबा
    बाग़ के चारों तरफ़ आग लगा देते हैं …
    यहाँ 'तुयूर' ख़ुद ही 'तायर' का बहुवचन है… इसलिए 'तुयूरों' कहना व्याकरण दोष है।

    सौदा कहते हैं …… तू तो इस मानी से क्या शाद हुआ होवेगा, पूछिए अहल-ए-दिलों से के क्या करते हैं …… 'व्याकरण की नज़र से 'अहल-ए-दिल' होगा 'अहल-ए-दिलों' नहीं होगा…।
    अग़लात 'ग़लत-उल-आम' हैं या नहीं बहुत टेढ़ा सवाल है। फिर भी बहुत शुक्रिया आपको जो आपने इतना समय दिया मेरी रचना को पढ़ा और उस पर टिप्पणी दी और सुझाव भी दिए…। आपका तह-ए-दिल से शुक्रगुज़ार हूँ…

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  3. आदरणीय सपन साहब....
    आपने सौदा और मीर जैसे शायरों के उदाहरण दिए... हमारा कहना ये है कि मीर, सौदा, ग़ालिब, मोमिन के क़द तक आने के लिये हमें किस लियाक़त की ज़रूरत होगी ये हमें बहुत गम्भीरता से सोचना चाहिए... केवल बड़े बड़े नामों के साथ ज़बानी लफ़्फ़ाज़ी से कमियों का वज़न कम नहीं हो जाता आदरणीय... क्या ही बेहतर हो कि आप अपनी ग़ज़लों पर उर्दू अदब की किसी क़ाबिल और दाना शख़्सियत से इस्लाह फ़रमाने की गुज़ारिश करें, जिससे इस ग़ज़ल जैसी कमनीय और नाज़ुक दोशीज़ा की आबरू बरक़रार रहे... और हमें भी और कुछ अच्छी-अच्छी बातों पर अपने ख़याल रखने का मौक़ा मिलता रहे... आमीन..

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    1. Vishwajeetsapan12:34 pm

      बहुत शुक्रिया ... आपके शब्दों को सुनकर मेरा दिल बाग-बाग हो गया ... मेरा कहना भी लफ़्फ़ाज़ी हो गया तो कुछ बचा ही नहीं .... ख़ुदा आपको हर फ़न दे यही आरज़ू है....
      मेरा तो इतना ही कहना है ....
      आदमी हो गया बेज़ुबाँ है देखो
      आग से वो आज़ुर्दगाँ है देखो
      ---------
      ऐ सपन देखो किसी सैलाब को तुम
      रुख़ नदी का मोड़ देना चाहता हूँ

      हटाएं

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