मंगलवार, 24 अप्रैल 2012

सविता श्रीवास्तव की प्रस्तुति - बुंदेली दादरा और बुंदेली गारी

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नई दुल्हन जब ससुराल में आती है उस समय गाया जाने वाला दादरा

दादरा
बालम छोटे से बालम हल्के से
हल्के की आई बड़ी लाज बालम छोटे से ........

जो मैं गई थी पनियाँ भरन खों
बालम गये मोरे साथ रे
बालम वहीं मचले वहीं मचले
गगरी दिलादे मेरी जान‌ बालम छोटे....

जो मैं गई थी पिक्चर देखन‌
बालम गये मोरे साथ रे
बालम वहीं मचले वहीं मचले
गोदी में ले ले मेरी जान बालम छोटे.....

जो मैं गई थी एन सी सी केंप में
बालम गये मोरे साथ रे
बालम वहीं मचले वहीं मचले
पमपम दिला दे मेरी जान‌ बालम छोटे...

जो मैं गई थी बिस्तर लगाने
बालम गये मोरे साथ रे
बालम वहीं मचले वहीं मचले
लोरी सुना दे मेरी जान बालम छोटे...

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विवाह के समय बुंदेलखंड में गाई जाने वाला बुंदेली गारी

गारी
हम जानत कछु नौने से हुइयें सो
राजा हिमांचल के दमाद भलेजू|

माथे पे सेहरा उनें नईं भावे सो
लटों से गंगा बहाये भलेजू हम ....जानत

कानों में कुंडल उनें नईं भावें सो
बिच्छू ततैया लटायें भलेजू ......हम जानत

गले में हरवा उनें नईं भावें सो
सर्पों की माला लटकायें भलेजू.... हम जानत

हाथों में कंगना उनें नईं भावें सो
डम डम डमरू बजायें भलेजू .....हम जानत

अंग में जामा उनें नईं भावे सो
मृगछाला लटकायें भलेजू ........हम जानत

पावं में जूता उनें नईं भावे सो
सो पदम खड़ाऊं पहने भलेजू ....हम जानत
संग में उनके गौरा सोहें सो
नंदी पे हैं सवार भलेजू......... हम जानत

--.

सविता श्रीवास्तव  12 शिवम सुंदरम नगर छिंदवाड़ा

5 blogger-facebook:

  1. बेनामी7:34 pm

    bahut acchii lagi
    Ragani Shrivastava Khurai vaali

    उत्तर देंहटाएं
  2. आदरणीया सविता जी ने बुन्देली गीतों को प्रकाशित करने का विचार किया, इस हेतु वे साधुवाद की हक़दार हैं.... परन्तु जो प्रथम गीत 'दादरा' उन्होंने दिया है वह पारम्परिक न होकर अधुनाप्रेरित रचना मानी जानी चाहिए... बेहतर होता अगर वे इसकी जगह बुन्देली दादरा की कोई प्राचीन पारम्परिक रचना यहाँ प्रकाशित करतीं... क्योंकि ऐसी रचनाएँ बाद में उस साहित्य और संस्कृति विशेष के न जानने वाले लोगों के मन में भ्रम पैदा कर देती हैं, और वे इन रचनाओं को ही पारम्परिक मानकर व्यवहार करते हैं...जो कालान्तर में संस्कृतियों के पतन का कारण भी बन सकती हैं... हमारे इन विचारों के पीछे केवल यही मूल भाव है कि यह हम सभी का नैतिक दायित्व है कि हम जब भी कोई इस तरह के सांस्कृतिक परिदृश्यों को समाज के समक्ष प्रस्तुत करें तो उसके मूल स्वरूप में ही प्रदर्शित करें ताकि भविष्य में दस्तावेज़ बन जाने वाले इन अभिलेखों से आने वाली पीढ़ियाँ दिग्भ्रमित न हों... प्रयास हेतु पुनः साधुवाद...

    उत्तर देंहटाएं
  3. ईमेल से प्राप्त टिप्पणी
    आदरणीया सविता जी ने बुन्देली गीतों को प्रकाशित करने का विचार किया, इस हेतु वे साधुवाद की हक़दार हैं.... परन्तु जो प्रथम गीत 'दादरा' उन्होंने दिया है वह पारम्परिक न होकर अधुनाप्रेरित रचना मानी जानी चाहिए... बेहतर होता अगर वे इसकी जगह बुन्देली दादरा की कोई प्राचीन पारम्परिक रचना यहाँ प्रकाशित करतीं... क्योंकि ऐसी रचनाएँ बाद में उस साहित्य और संस्कृति विशेष के न जानने वाले लोगों के मन में भ्रम पैदा कर देती हैं, और वे इन रचनाओं को ही पारम्परिक मानकर व्यवहार करते हैं...जो कालान्तर में संस्कृतियों के पतन का कारण भी बन सकती हैं... हमारे इन विचारों के पीछे केवल यही मूल भाव है कि यह हम सभी का नैतिक दायित्व है कि हम जब भी कोई इस तरह के सांस्कृतिक परिदृश्यों को समाज के समक्ष प्रस्तुत करें तो उसके मूल स्वरूप में ही प्रदर्शित करें ताकि भविष्य में दस्तावेज़ बन जाने वाले इन अभिलेखों से आने वाली पीढ़ियाँ दिग्भ्रमित न हों... प्रयास हेतु पुनः साधुवाद...

    उत्तर देंहटाएं
  4. आपके प्रयास के लिए सादुवाद

    उत्तर देंहटाएं
  5. बेनामी1:56 pm

    bahut badhiya,,,thanks

    उत्तर देंहटाएं

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