मंगलवार, 8 मई 2012

अनुराग तिवारी की कविता - मन अनुरागी

मन अनुरागी

मन अनुरागी, तन संसारी,

मेरा है गिरधारी।

अभी बहुत हैं पूरी करनी,

मुझको ज़िम्‍मेदारी।

तुमने ही संसार बनाया,

औ' रिश्‍तों का ताना-बाना।

व्‍यथित-भ्रमित मन-बुदि्‌ध, न सूझे

आखिर मुझे कहाँ है जाना।

इस जग की है राह कठिन प्रभु,

राग-द्वेष के मोह-पाश में,

हो जाती है भूल-चूक औ'

अनचाहे अपकर्म बहुत से।

पाप हरो प्रभु, तुम ही मुझको

सच्‍ची राह दिखाओ।

बन कर रथी मेरे अन्‍तर के

मुझको भव पार कराओ।

मन हो निर्मल, दीप जले प्रभु

इसमें तेरी भक्‍ति का।

दो वर, विकल बुदि्‌ध को मेरी

तव चरणों की आसक्‍ति का।

--

-सी ए. अनुराग तिवारी

5-बी, कस्‍तूरबा नगर,

सिगरा, वाराणसी- 221010

मो. ः 9415694329

1 blogger-facebook:

  1. Respected Ravi Ji,

    My aforesaid poem is also published in another blog. Link is : http://gautamnarendramohan.blogspot.in/2012/05/blog-post_09.html
    There, the author has published the poem without mentioning my name or Rachanakar in such a manner that gives an impression that it is written by him. What should we do. Please guide.

    CA. Anurag Tiwari

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