शनिवार, 12 मई 2012

यशवन्‍त कोठारी का व्यंग्य - टेण्डर पुराण

कवि महोदय सुबह सुबह ही घर पर आ गये और बोल पड़े- यार एक बात बताओ ये टेण्‍डर क्‍या बीमारी है ? हर सरकार किसी न किसी टेण्‍डर-प्रक्रिया में फंस जाती है और टेण्‍डर के कीचड़ से बाहर नहीं निकल पाती। मैं क्‍या जवाब देता। सब जानते हैं सरकार में निविदा जारी करने के साथ ही भ्रप्‍टाचार की प्रक्रिया शुरु हो जाती है। टेण्‍डर फार्म ही उस कम्‍पनी को दिया जाता है जिसका टेण्‍डर पास करना होता है। बाकी को टेण्‍डर फार्म देने वाला बाबू टरका देता है।

टेण्‍डर आने के बाद लेखा शाखा का बाबू टेण्‍डर की शर्तों और विवरणों का ऐसा शानदार पोस्‍ट मार्टम करता है कि बड़े से बड़ा अफसर उस फाइल को हाथ लगाने से डरता है। कभी किताबों के टेण्‍डर बुलाने पर नेहरु जी ने कहा था- किताबें क्‍या जूते है जो टेण्‍डर से खरीद होगी। मगर आज समय बदल चुका है हर काम टेण्‍डर से होने लग गया है। यहाँ तक कि मानव संसाधनों के लिए भी टेण्‍डर जारी होते हैं और सबसे सस्‍ती दरों पर संविदा के आधार पर सरकार में मानव संसाधनों को नियोजित किया जाता है चतुर्थ और तृतीय श्रेणी के मानव संसाधनों के इस नियोजन के टेण्‍डर अक्‍सर दृष्टिपथ से गुजरते रहते हैं।

टेण्‍डर भी कई प्रकार के होते हैं। स्‍थानीय टेण्‍डर, राष्ट्रीय टेण्‍डर, अन्‍तरराष्ट्रीय टेण्‍डर, ग्‍लोबल टेण्‍डर, टेकनिकल टेण्‍डर, फाइनेन्‍सियल टेण्‍डर और ई- टेण्‍डर। सभी टेण्‍डरों की मंशा केवल ये होती है कि सरकार को सस्‍ता, टिकाउ, सुन्‍दर और स्‍थायी सामान प्राप्‍त हो। मगर होता इसका ठीक उलटा है। टेण्‍डर की शर्तों का उल्‍लंघन एक सामान्‍य प्रक्रिया है और सरकारी बाबू, लेखाशाखा और अफसर मिलकर घपले करते रहते हैं। सामान क्रय करने के लिए सरकारी अधिकारी लेखा नियमों का सहारा लेता है और लेखाकार इन कायदों को उपर-नीचे करने का काम करता है।

सेना में खरीद हो या परमाणु संयत्र में काम हो, सड़क बनानी हो या हवाई जहाज खरीदना हो या रेल की पटरी बिछानी हो सब काम टेण्‍डर से, निर्धारित प्रक्रिया से यानी भ्रप्‍टाचार का खुला खेल फर्रुखाबादी। लोक निर्माण विभाग हो या पुलिस विभाग टेण्‍डर बिन सब सून। और टेण्‍डर फार्म से शुरु होने वाला यह कार्यक्रम माल की सप्‍लाई के बाद चेक प्राप्‍त करने के बाद तक चलता रहता है। एक बड़े व्‍यापारी जो टेण्‍डर कार्यक्रम के विशेषज्ञ हैं, ने मुझे बताया भईया हम तो टेण्‍डर में बीस-पच्‍चीस प्रतिशत राशि सरकारी खर्च की जोड़ कर ही टेण्‍डर बनाते हैं, मैंने कहा क्‍या कभी किसी दफ्‌तर में ईमानदारी से काम नहीं होता वे बोले सामान्‍यतया ऐसा नहीं होता, यदि कभी ऐसा हो जाता है तो सरकारी खर्च की चेरिटी कर देते हैं या पार्टी फण्‍ड में डाल देते हैं। किसी मन्‍दिर, मसजिद, गिरिजाघर में दान देते हैं लेकिन ये राशि हर टेण्‍डर में रखते जरुर हैं। वे सफल व्‍यवसायी हैं सब जानते हैं।

बोफोर्स हो या ट्रक खरीदने का काम सरकारी खर्च का टेण्‍डर में जुड़ना जरुरी है। छोटे-मोटे सौदों का काम हो या बड़े अरबों के ठेके टेण्‍डर सब का एक ही उसूल है। यहाँ तक कि एकल टेण्‍डर से होने वाली छोटी खरीद में भी गड़बड़ की पूरी गुंजाईश रहती है। स्‍टोर-बाबू-लेखाबाबू से लगा कर विभागाध्‍यक्ष या निदेशक, या संयुक्‍त सचिव या सचिव या मंत्री या केबिनेट या मुख्‍य मंत्री या प्रधान मंत्री सब की चिडिया बैठने के बाद ही टेण्‍डर का अन्‍तिम संस्‍कार होता है। फर्म का मालिक माल सप्‍लाई करके चेक लेकर विदेश चला जाता है और सरकार उसे ढूंढती रहती है। पारदर्शिता के नाम पर ई-टेण्‍डर और वित्‍तीय व तकनीकी टेण्‍डर अलग अलग किये जाते हैं। जितने हस्‍ताक्षर उतने हिस्‍से। जिसे नहीं मिलता है वो ही अड़गां लगा देता है। सरकार या विपक्ष कोई कुछ नहीं कर सकता।

टेण्‍डर-पुराण का कोई अन्‍त नहीं है। हर दफ्‌तर में टेण्‍डर एक आवश्‍यक प्रक्रिया है और कागज का पेट भरना जरुरी है सर। बाकी सब नीचे वाले देख लेते हैं। कभी भार कोई मामला ज्‍यादा उछलता है तो किसी छोटे बाबू की बलि ले ली जाती है। यह निलम्‍बित बाबू थोड़े समय बाद ही किसी बेहतर स्‍थान को सुशोभित करके नया टेण्‍डर नोटिस जारी करने में व्‍यस्‍त हो जाता है। विपक्षी दल चाहता है कि सरकार चलाने का टेण्‍डर उसके नाम खुल जाये मगर जनता माने तब न।

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यशवन्‍त कोठारी, 86, लक्ष्‍मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर, जयपुर - 2, फोन - 2670596

ykkothari3@gmail.com

09414461207

2 blogger-facebook:

  1. बेनामी11:57 am

    कोठारी जी, नमस्कार
    आपने टेंडर पुराण के संबंध में जो संक्षिप्त जानकारी प्रदान की वह यथार्थ सत्य है और आधुनिक लोकतन्त्र की सरकारी सर्वविदित परिपाटी है। किंतु चिंता इस बात की है क्या इसका कोई निराकरण है ? निराकरण के लिए प्रबुद्ध वर्ग द्वारा गहन चिंतन की आवश्यकता है। वह चिंतन भी यदि लेखनी से बांधा जाए तो शायद भ्रष्टाचार पर कुछ अंकुश लगाया जा सके। धन्यवाद, फिर मिलेंगे। डॉ. ओमकार नाथ शुक्ल

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  2. यथार्थ निरिक्षण!!

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