रविवार, 6 मई 2012

गोवर्धन यादव की दो लघुकथाएं - असंतोष तथा अनमोल तोहफा

असंतोष

एक वृद्ध पिता ने अपने दो बेटों के बीच सारी संपत्ति बांट देने की सोचा, पर उसमें दिक्कत यह थी कि दो मकानों में एक एक थोड़ा बडा और दूसरा थोड़ा छोटा था. खेत करीब बीस एकड था, लेकिन जमीन असमान थी. कोई एक-सवा एकड का रकबे वाला था तो दूसरा उससे थोड़ा बहुत कम. इसी तरह उसके पास कुछ जानवर भी थे. कुछ हट्टे-कट्टे थे,तो कुछ दुबले पतले. कुछ जानवर दूध देने वाले थे,तो कुछ, कुछ दिन बाद दूध देने वाले थे. उसने अपने दोनों बेटों को पास बुलाया और कहा कि उसके पास बीस एकड़ जमीन है. एक टुकड़े बड़े के हिस्से में तो दूसरा दूसरे के हिस्से में रहेगा. इसी तरह दो मकान है, अपनी मर्जी से उसे बांट लो. इस तरह जानवर भी बांट लो. इस तरह उसने अपनी सारी जायजाद देते हुए कहा कि जितनी सेवा तुम जानवरों की करोगे, उतना ही वे दूध देंगे. इसी तरह जितनी मेहनत और लगन से जमीन जोतोगे,वे उतनी फ़सल देंगे. दोनों ने अपने-अपने हिसाब से खेतों को जोता. जब फ़सल पक कर तैयार हुई, तो बड़े को खूब पैदावार मिली,जबकि छोटे को कम प्राप्त हुई. इसी तरह जानवरों के मामले में बड़ा ही कामयाब रहा.

यह सब अपनी आँखों से छोटे भाई ने देखा तो जल-भुंज गया. उसे पक्का विश्वास हो गया था कि पिता ने सारी चीजों के बंटवारे में उसके साथ न्याय नहीं किया है. उसने जमकर विरोध किया. फ़लस्वरुप जो चीजें बड़े के पास थी,अब वह उसे दे दी गई थी. ऐसा करते हुए छोटा बहुत खुश हो रहा था. आने वाले साल में बड़े के खेतों ने खूब अन्न उपजाया और छोटे के यहाँ फ़िर कम फ़सल हुई. उसने फ़िर फ़साद मचाया. इस तरह उसने अपनी मर्जी से फ़िर बटंवारा करवाया, लेकिन ढाक के तीन पात वाली स्थिति इस बार भी रही. अबकी एक नया टन्टा उठ खडा हुआ था. उसने पिता पर आरोप लगाते हुए कहा कि बड़ा मकान बड़े को दे दिया है,वह मुझे मिलना चाहिए. दो सगे भाईय़ों के बीच कहीं दुश्मनी न पनपने लगे,इस लिहाज से उसने बडे बेटे से कहा कि वह छोटे में अपना गुजारा कर ले. उसने अपने पिता की आज्ञा मानते हुए सहर्ष प्रस्ताव पर हामी भर दी. छोटा बडा मकान पाकर बेहद ही खुश हो रहा था.

चूंकि बड़े का परिवार बड़ा था. सो उसने उसे तोड़कर नया बनवाने की सोचा. जब वह मकान की प्लिंथ खुदवा रहा था, तो खुदाई मे जमीन में गड़ा एक हंडा निकला, जिसमे कुछ सोने के तथा कुछ चांदी के जेवरात थे. बड़े ने उन वस्तुओं को बेचकर एक आलीशान मकान बनवा लिया.

छोटा भाई अब गंभीरता से सोच रहा था कि यदि वह छोटा मकान अपने पास ही रहने देता तो वह भी लखपति बन सकता था.

 

अनमोल तोहफ़ा.

आशा को अपनी ससुराल आए चार माह बीत चुके है. जब से वह यहाँ आयी है, पल भर भी दम मारने की फुर्सत उसे नहीं मिल पायी है. घर से चलते समय उसने अपने सूटकेस में डायरी, पेन-पेन्सिल,क्राइलिक/-पोस्टर कलर,कहानी और कविता की डायरी और कुछ कोरे कागजों को सहेजकर रख लिया था कि फुर्सत के क्षणीं में वह कभी पेन्टिंग तो कभी कोई गीत-कहानी अथवा कविता रचेगी.

काफ़ी दिनों बाद ऐसा मौका उसके हाथ लग आया था. सासुजी भागवत सुनने गई हुई थी,और श्रीमानजी दौरे पर. उसने आलमारी के एक कोने में पड़े अपने सूटकेस को निकाला. बारी-बारी से सब चीजों का मुआयना किया. किताबें निकालते समय उसका हाथ एक कलात्मक डिब्बे से जा टकराया. उसने उसे आहिस्ता से निकालकर खोला. डिब्बे में पड़ा गुलाब का फ़ूल अब तक सूख चुका था. उसे हाथ में उठाते ही वह अपने अतीत की भूलभुलैया में खोती चली गई थी. बात उन दिनों की है,जब वह दुल्हन बनी बैठी थी और उसे इन्तजार था अपने दादाजी का ,कि वे ऐसे मौके पर आएं और उसे आशीर्वाद देकर कृतार्थ करे, लेकिन वे नहीं आए तो नहीं आए. इस समय वे वृद्धाश्रम में रह रहे थे. किसी बात को लेकर बाप-बेटे में खटक गई थी और खुद्दार दादाजी ने घर छोड़ दिया था. काफ़ी छोटी थी तब वह. दादाजी उसे खूब प्यार देते थे और रोज रात को परियों की,तो कभी किसी राजकुमार की कहानी सुनाया करते थे. कहानियां सुनते-सुनते वह उन्हीं के पास सो भी जाया करती थी. दादाजी ने कथा-कहानियों के माध्यम से उसमे अदम्य साहस और नैतिक गुणों से परिपूर्ण कर दिया था. वह समय भी नजदीक आ पहुँचा, जब वह डोली में बैठकर ससुराल रवाना होने को थी. तभी उसे अपने दादाजी आते दिखायी दिए. उसका मन मयूर नाच उठा था. शरीर में रोमांच हो आया था और उसकी आंखों से अश्रुधारा बह निकली थी. दादाजी को पास पाकर वह उनसे लिपट गयी थी और देर तक अपने आंसू बहाते रही थी. दादा और पोती के इस मिलन को देखकर आसपास खडे लोग भी अपने आपको रोक नहीं पाए थे और उनकी भी आखें भर आयी थीं.

वे उसकी पीठ पर हथेली से थपकियां देते हुए उसे सांत्वना दे रहे थे .तभी उन्होंने अपने जेब से एक महकता हुआ गुलाब का फ़ूल निकाला और उसकी ओर बढाते हुए कहा था:-“ बिटिया, इस गुलाब के फ़ूल के अलावा तेरे दादाजी के पास देने को और कुछ भी नहीं है. इसे सभांल कर रखना. इस गुलाब के फ़ूल की तरह ,तू हमेशा अपने सदगुणों की खुशबू से, अपने आसपास के माहौल को महकाते रहना. इस फ़ूल के साथ कुछ कांटे भी है, ये तुझे हमेशा याद दिलाते रहेंगे कि विपरीत परिस्थिति में भी तुझे हरदम मुस्कुराते रहना है. जैसे काटों के बीच यह गुलाब मुस्कुरा रहा है.”.. इतना कहकर उन्होंने उसके सिर पर हथेली रखते हुए आशीर्वाद दिया और वापिस हो लिए थे. वह उन्हें जाता हुआ देखती रही थी,जब तक कि वे उसकी आंखों से ओझल नहीं हो गए थे. अपने अतीत की भूलभुलैया से वापिस लौटते हुए उसने उस गुलाब के फ़ूल को अपने माथे से लगाया और उसे सहेजते हुए पुनः डिब्बे में रख दिया था.

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गोवर्धन यादव
103,कावेरी नगर,छिन्दवाडा (म.प्र.) 480001
07162-246651,9424356400

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