रविवार, 13 मई 2012

ई-गवर्नेंस और भोंदूराम की कहानी.

पहले एक प्रश्न –

दुनिया में कितने तरह के लोग होते हैं?

एक दो चार दस बारह अनगिनत?

गलत

दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं.

एक वो जो इंटरनेट जानते हैं, प्रयोग करते हैं और ईगवर्नेंस का प्रयोग कर सकते हैं.

दूसरे वो जो इंटरनेट और ईगवर्नेंस नाम की चिड़िया के बारे में नहीं जानते. वो नहीं जानते कि इंटरनेट और कंप्यूटर क्या है.

हमारा भोंदूराम उसी दूसरे तरह का प्राणी है. भारत की 80 प्रतिशत जनता गांवों में निवास करती है. वहाँ न ढंग की बिजली है, न कंप्यूटर और न ही इंटरनेट.

एक दिन भोंदूराम अपने खेत के खसरे की नकल बनवाने पटवारी के पास पहुँचा.

पटवारी खार खाया बैठा था. सरकार ने ईगवर्नेंस के नाम पर उससे उसका अधिकार छीन लिया था. पटवारी अब सर्वे इत्यादि तो कर सकता था, परंतु खसरा खतौनी की नकल अब सरकारी ईगवर्नेंस साइट इंटरनेट से मिलने लगी थी. उसने भोंदूराम को भगा दिया कि जाओ ईगवर्नेंस से सीधे अपने कंप्यूटर पर फीस जमा करो और निकलवा लो.

भोंदू राम के पास कंप्यूटर नहीं था. चलिए मान लीजिए कि उसने एक खरीद भी लिया. अब उसके पास एक अदद कंप्यूटर हो गया है. अब वो क्या करे? उसे कंप्यूटर चलाना नहीं आता. तो उसे कंप्यूटर चलाना सीखना होगा. पर अरे, ये क्या? उसे अंग्रेजी नहीं आती. और, वो ठेठ मालवी बोलने वाला आदमी अंग्रेजी क्या हिंदी भी ठीक से नहीं समझ सकता.

तो अब भोंदूराम को किसी ने सलाह दी कि शहर में फलां फलां इंटरनेट कैफे में या एमपी ऑनलाइन सुविधा केंद्र में खसरा खतौनी की नकल मिलती है. वहाँ से बनवा कर ले लो.

अब भोंदूराम अपने गांव से टिकट कटा कर शहर आया, इंटरनेट कैफे में एमपी ऑनलाइन सुविधा केंद्र में गया वहाँ कैफे वाले ने उससे अपने बढ़िया एसी रूम में बिठाया, और सर्विस चार्ज के 200 रुपए फीस वसूले, और 5 मिनट में खसरे की नकल सौंप दी.

अब आप कहेंगे कि वाह! क्या बात है. ईगवर्नेंस से 5 मिनट में बिना किसी भ्रष्टाचार के, पटवारी को घूस दिए जो काम हो गया. परंतु जो काम पटवारी पहले 50 रुपए लेकर खसरे खतौनी की नकल उसके दरवाजे पर जाकर दे आता था, भोंदूराम को वही काम आने जाने का खर्चा, सर्विस चार्ज और एक दिन की मजदूरी मिलाकर तीन सौ रुपए का पड़ा. यानी छः गुना ज्यादा.

तो, जब तक भोंदूराम स्वयं कंप्यूटर चलाना न सीख ले, कंप्यूटर उसकी अपनी भाषा में न आ जाए, बिजली और इंटरनेट गांव गांव में न पहुँच जाए, कोई भी ईगवर्नेंस उसके किसी काम का नहीं.

परंतु यह समय ट्रांजीशन का समय है. धीरे धीरे ही सही स्थिति में सुधार होता जा रहा है.

और इसीलिए बहुत से प्रकल्प भोंदूराम जैसे लोगों के लिए, हमारी ग्रामीण जनता के लिए लाए जा रहे हैं. आकाश नामक दुनिया के सबसे सस्ते टैब्लेट कंप्यूटरों का लांच भले ही फेल हो गया हो, मगर उसके देखा देखी बहुत से सस्ते टैबलेट कंप्यूटर बाजार में आ चुके हैं. जो टैबलेट कंप्यूटर पहले 35 हजार की रेंज में आते थे अब उनकी कीमतें पाँच हजार तक आ चुकी है. ओएलपीसी नामक ग्रामीण स्कूली बच्चों तक लैपटॉप कंप्यूटर पहुँचाने की महात्वाकांक्षी योजना में कंप्यूटर के भीतर ही बिजली पैदा कर उसे चार्ज करने के लिए छोटा सा जनरेटर लगा है जिसे हाथ से घुमाकर लैपटॉप को चार्ज किया सकता है.

इन कंप्यूटरों में भोंदूराम जैसे लोगों की भाषा में इंटरफेस – यानी हिंदी, छत्तीसगढ़ी, अवधी, भोजपुरी, तेलुगु, तमिल इत्यादि में आ रहे हैं. बड़ी बड़ी कंपनियाँ गूगल माइक्रोसॉफ़्ट इत्यादि भारतीय भाषाओं में लोकलाइज्ड कंटेंट ला रही हैं, और उनका ध्यान हिंदी पर अधिक है.

जो भी हो, यदि भोंदूराम की कहानी की नेगेटिविटी को छोड़ दें तो ईगवर्नेंस के क्षेत्र में तेजी से काम हो रहा है.

आज पैन कार्ड बनवाने के लिए आपको कहीं कोई समस्या नहीं आती. हममें से अधिकांश अब अपनी रेल और हवाई यात्रा के रिजर्वेशन के लिए रेलवे के टिकट काउंटरों पर लाइन में लगना भूल चुके हैं, और अपने स्वयं के कंप्यूटरों अथवा यात्रा एजेंटों के जरिए टिकट बनवाते हैं. आईसेक्ट और स्टेट बैंक ने मिलकर मोबाइल बैंकिंग सुविधा प्रारंभ की है जिसमें गांव गांव में मोबाइल बैंकिंग वाहन जाकर माइक्रो बैंकिंग सुविधा प्रदान करती है. इसी साल से उच्च शिक्षा में एडमीशन के लिए ऑनलाइन प्रवेश प्रक्रिया लागू की जा रही है जिससे अच्छे पाठ्यक्रमों के बारे में न सिर्फ जानकारी सबको मिलेगी वे अपने लिए अच्छा कॉलेज भी चुन सकेंगे.

और, उम्मीद करें कि कल को इस खसरा खतौनी की नकल के लिए भी भोंदूराम को कोई समस्या नहीं आएगी. उसे अपने गांव के ई-गवर्नेंस सुविधा केंद्र में ही यह सुविधा हासिल हो जाएगी.

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