सोमवार, 14 मई 2012

यशवन्‍त कोठारी का व्यंग्य - ये अन्‍दर की बात है

हर राजनैतिक पार्टी के अन्‍दर प्रजातन्‍त्र है और बाहर हाइ कमाण्‍ड या अध्‍यक्ष या क्षत्रपों की तानाशाही। अन्‍दर खाने की बात बाहर नहीं आये और यदि आये तो इसकी जिम्‍मेदारी कम से कम शीर्प नेतृत्‍व की नहीं हो। यह व्‍यवस्‍था हर पार्टी में लागू रहती आई है और आगे भी रहेगी।

सवाल ये है भाई साहब कि यह अन्‍दर का प्रजातन्‍त्र कैसा होता है। हर व्‍यक्‍ति जनता है कि हर पार्टी के अन्‍दर पच्‍चीसों, गुट होते हैं, हर गुट का एक नेता होता है और उस गुट में आन्‍तरिक प्रजातन्‍त्र होता है। जब विश्‍वनाथ प्रसाद सिंह ने काँग्रेस छोड़ी़ तो यही कहा गया कि कांग्रेस के अन्‍दर बहस की गुंजाईश भी है और प्‍लेट फार्म भी। जब भाजपा के क्षेत्रपाल सार्वजनिक रुप से बोलते हैं तो भी यही कहा जाता है- हमारी पार्टी विद ए डिफरेन्‍स है और यहां पर मत भेद है मनभेद नहीं।

अन्‍दरुनी प्रजातन्‍त्र का सीधा मतलब प्रजातन्‍त्र के अन्‍दर का प्रजातन्‍त्र जैसे पाजामे के अन्‍दर एक और पाजामा। राजनीति में एक दूसरे की खाट खड़ी करने लग्‍घी लगाने, धोती खोलने की परम्‍परा बहुत पुरानी है और मीडिया इन बातों को मजा ले लेकर बनाता है, लिखता है। ये अन्‍दरुनी प्रजातन्‍त्र के नाम पर किया जाता है।

वास्‍तव में हर पार्टी में कुछ तानाशाह होते हैं और वे प्रजातन्‍त्र के नाम पर अपनी अन्‍तिम इच्‍छा को थोपते हैं, कुछ छुटभैय्‌ये चिल्‍लाते है तो इसे आन्‍तरिक प्रजातन्‍त्र का नाम दे दिया जाता है। अन्‍दर खाने की बात ये है कि चुप रहने में ही भलाई है नहीं तो मनभेद होते देर नहीं लगती है। किसी अन्‍य क्षत्रप को उखाड़ फेंकने में आन्‍तरिक प्रजातन्‍त्र बहुत काम आता हे। किसी भी रिपार्ट को मीडिया में लीक कर के आन्‍तरिक लोकतन्‍त्र का भट्‌टा बैठाया जा सकता है।

कुछ परमवीर बयानबाज और पार्टी प्रवक्‍ता एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने का राष्ट्रीय कार्यक्रम भी अन्‍दर की बात है की तर्ज पर करते रहते हैं। सच पूछा जाये करोड़ों डिक्‍टेक्‍टरों का समूह है प्रजातन्‍त्र। हर वोटर के अन्‍दर की बात ये है कि वो आन्‍तरिक रुप से एक तानाशाह-प्रजातन्‍त्र को जीता है। छोटा डिक्‍टेटर बड़े तानाशाह को लोकतन्‍त्र नहीं समझा सकता। मगर कई हर प्रवक्‍ता किसी भी आन्‍तरिक गड़बड़ी, उंच नीच, वक्‍तव्‍य, माफीनामा, कठोर प्रसंग सभी पर एक ही जवाब देता है-हमारी पार्टी में आन्‍तरिक प्रजातन्‍त्र है, हमारे यहां सबको अपनी बात कहने का हक है। और कुछ ही समय बाद उस असंतुष्ट, विपक्षी, विरोधी,-- पार्टी वर्कर के बोरिया बिस्‍तर बांध कर पार्टी कार्यलय के बाहर फुटपाथ पर फेंक दिये जाते है या अगले चुनाव में टिकट काट दिया जाता है या फिर भ्रष्टाचार, पुलिस, न्‍याय व्‍यवस्‍था, आदि का जाल ऐसा उलझाया जाता है कि ताजिन्‍दगी आन्‍तरिक प्रजातन्‍त्र की दुहाई देता रहता है या निष्कासित जीवन जीने को मजबूर हो जाता है और ये अन्‍दर की बात वाला फार्मूला हर पार्टी पर लागू होता है।

पार्टी है तो लोकतन्‍त्र भी हैं हर पार्टी में एकता है और एकता में अनेकता है। पार्टी में मंच है मगर मंच पर पहुँचना आसान नहीं। पार्टी के उपवेशनों, में अध्‍यक्ष, प्रभारी महा सचिव और एक विशेपज्ञ ही अन्‍दर की बात करते हैं प्रजातन्‍त्र उनके नौकर की तरह है जो जाजम उठाता है, पानी पिलाता है, कागज फाईल उठाता है। और पार्टी का आन्‍तरिक प्रजातन्‍त्र चलता रहता है जोर से मिटिंग में बोलने वाले को बाहर का रास्‍ता दिखा दिया जाता है या जूतम-पैजार से स्‍वागत किया जाता है क्‍यों कि ये अन्‍दर की बात है। बड़ा परिवार है तो सब चलता है और सब चलता है तो सरकार, संगठन, सत्‍ता सब चलते रहते हैं। यदि अन्‍दर सब नहीं चलेगा तो अन्‍दर की बात बाहर आ जायेगी और सब गुड़ गोबर हो जायेगा।

0 0 0

यशवन्‍त कोठारी, 86, लक्ष्‍मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर जयपुर - 2, फोन - 2670596

e-mail ID - ykkothari3@gmail.com

m--09414461207

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

------------------------------------------------------------

और दिलचस्प, मनोरंजक रचनाएँ पढ़ें-

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------