रविवार, 13 मई 2012

सीमा सचदेव का काव्यशैली में लघु-बाल-उपन्यास चूचू और चिण्टी

नमस्कार बच्चों ,

आप पढ़ेंगे काव्य शैली में लघु-बाल-उपन्यास चूचू और चिण्टी ।

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कभी पीठ पर मारे लात

देता उस पर पानी डाल

कभी खींचता उसके गाल

उसे चिढाने में मजा आए

चिंटी को निद्रा से जगाए

चिंटी उसके पीछे भागे

तो घर वाले सारे जागें

मच जाए घर में ऐसे शोर

आया हो ज्यों कोई चोर

धमा चौंकडी और हो हल्ला

लगे पकडने पूरा मुहल्ला

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चूचू जब भी पढने जाए

चुपके से चिण्टी वहां आए

करदे रूम की बत्ती बन्द

छुप कर लेने लगे आनन्द

अंधियारे में करे शैतानी

कॉपी पर वो डाले पानी

दबे पांव बाहर को जाए

कोई भी उसको देख न पाए

कभी छुपा ले उसकी किताब

करदे बस्ता कभी खराब

गह कार्य की कॉपी छुपाए

चूचू को डांट पड जाए

कभी किसी की चीज उठाती

बैग में चूचू के रख आती

चूचू को कहते सब चोर

मच जाता कक्षा में शोर

चूचू और चिण्टी ( बाल-उपन्यास भाग-3)

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चूचू खाने का दीवाना
खा जाता चिण्टी का खाना
चोरी से वह खाना खाए
चिण्टी भूखी ही रह जाए
बातों में चिण्टी को लगाता
टिफ़न चुपके से उठाता
लेकर खाना भर दे घास

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रखदे फ़िर चिण्टी के पास
होती जब खाने की छुट्टी
चूचू खाए मजे से रोटी
देखती रह जाए उसको चिण्टी
इतने में बज जाए घण्टी
दूर से चूचू बडा चिढाता
पास कभी चिण्टी के आता
कहता खालो कुछ तो मिठाई
आज जो तुम टिफ़न में लाई
स्कूल से हो जाओगी लेट
भर लो कुछ तो अपना पेट
नहीं तो खालो मेरा खाना
clip_image023जूठा है पर न घबराना
सुनकर चिण्टी पटके पैर
अब चूचू की नहीं है खैर
पकड के खींचे उसके बाल
हो जाए कक्षा में धमाल
लातें मुक्के घूसा चलाएं
दोनों की शामत आ जाए

चूचू और चिण्टी ( बाल-उपन्यास भाग-4)
चिण्टी-चूचू खूब झगडते
हर जगह पर हल्ला करते
दोनों बच्चे बडे नादान
सब रहते उनसे परेशान
पर दोनों ही थे होशियार
लडते पर करते थे प्यार
टीचर दोनों को समझाती
नैतिकता का पाठ पढाती
मानते टीचर का हर कहना
पर न छोडे कभी झगडना
देते इक दूजे का साथ
पर न जाने क्या थी बात ?
बात-बात पर दोनों लडते
पर न इक-दूजे बिन रहते
इक दिन हुई कुछ ऐसी बात
छूट गया दोनों का साथ
*****************************

चूचू और चिण्टी ( बाल-उपन्यास भाग-5)
माता-पिता भी आ गए तग
सोचा छूटे इनका संग
तब ही दोनों समझ पाएंगे
जब न साथ ये रह पाएंगे
जब न दोनों साथ रहेंगे
कैसे इक दूजे से लडेंगे
देने को दोनों को अक्ल
भेज दिया चिण्टी को होस्टल
रह गया चूचू अब अकेला
पर न वह किसी संग खेला
बात न करता किसी से खास
चिंटी रहने लगी उदास
किसी से वह भी न बतियाती
मन ही मन बहुत पछ्ताती
चिंटु भी मन में पछताया
दोषी स्वयं को ही बस पाया
आया वह चिंटी के घर
कहने लगा चूचू रोकर
अब न कभी चिंटी से लडुंगा
जो बोलोगे वही करुंगा
पर चिंटी को वापिस बुलाओ

या मुझे होस्टल में भिजवाओ

कैसे रहेगी चिंटी अकेली
वहां न उसकी कोई सहेली
चिंटी को भी समझ में आई
चूचू के घर चिट्ठी पाई
माफ़ करो मेरी नादानी
मैं ही सबको न पहचानी
अब मुझको हुआ अहसास
अपने होते कितने खास
अब न चूचू संग लडूंगी

जो कहोगे वही करुंगी ।

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