सोमवार, 21 मई 2012

शशांक मिश्र भारती की तीन कविताएं

 

हृदय की ऊँचाई

मेरे-
विचारों से विमुख हो
तुमने अपना लिया था उसे
शीर्ष पर स्‍थान देकर,
मुझे-
पददलित किया
लेकिन-
मैं तब भी शान्‍त रहा
और-
आज भी शान्‍त हूं,
फिर भी व्यथित हो रहे हो
मेरी ओर-
आशापूर्ण दृष्‍टि से देख रहे हो,
तुम तो-
गेहूं के लिए
मुझे त्‍याग चुके थे
स्‍वार्थ पे बढ़
सेवा से भाग चुके थे,
फिर क्‍यों आए
मुझ गुलाब के पास
उसे-
उसका यथोचित स्‍थान देने
उदर से हृदय को उच्‍चता पर
स्‍थापित करने।

 

 

जयहिन्‍द

देश की सीमा पे
खड़ी एक झाड़ी के पास
घायल पड़ा जवान
जिसकी मृत्‍यु निकट है,
सोचता है-
अपनी मातृभूमि की ओर देखकर
क्‍या बिछौना हरी घास
शरीर में धंसी हुई कई गोलियां
किन्‍तु-
मेरा सौभाग्‍य है
जो निभा सका हूं अपना जीवन लगाकर कर्ज तेरा
कामना है-
तेरी प्रगति का दीप जलता रहे,
लेकर के अन्‍तिम सांसें
उठाकर के सिर
देखकर अपनी मातृभूमि की ओर
कहता है जयहिन्‍द।

शान्‍ति के पल

आज हुआ है नूतन सवेरा
मिट गया फैला सभी अंधेरा
नूतन ज्ञान के नेत्र खुले हैं
कांटों से विलग हो फूल मिले हैं,
भागी है तन से आकुलता
आलस देख मन की व्‍याकुलता
निरख रहे रोम-रोम सब
चाहें शीघ्र प्रगति का हो रब,
सभी ओर खुशहाली छाए
प्‍यासी धरा वृक्षों से घिर जाए,
गांव-शहर सुखी सब हों
सारे देश में शान्‍ति के पल हों,
चहुं ओर न फैली हो हिंसा
दया की भीख न मांगे अहिंसा,
घृणा-द्वेष का कहीं नाम न हो
बिन भाईचारे कोई काम न हो,
यही है सुन्‍दर इच्‍छा हमारी
हम सबकी खुशियां जिसमें सारी।

 

सम्‍पर्कः-हिन्‍दी सदन बड़ागांव शाहजहांपुर-242401 उ0प्र0 09410985048
shashank.misra73@rediffmail.com

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