मंगलवार, 8 मई 2012

देवेन्द्र पाठक 'महरूम' की दो ग़ज़लेँ

(1)

कितनी कड़वी हैँ सच्चाइयाँ |

गिर रहीँ नीचे ऊँचाइयाँ ||

 

मौसमोँ के चलन बद हुए ;

हुईँ ग़ुमराह पुरवाइया ||

 

कंठस्वर कोयलोँ के बिके ;

हुईँ नीलाम अमराइयाँ ||

 

दिन ढले घर मेँ अहसास के ;

स्यापा करती हैँ तनहाइयाँ||

 

होश आएगा 'महरूम' जब ;

हाथ आएँगी रुसवाइयाँ |

 

~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~

(2)

गूँगी - बहरी तेरी ख़ुदाई |

अंधी- पंगु मेरी प्रभुताई|

 

इन्साँ बने नहीँ बन बैठे ;

हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई

 

क़द मेँ क़मतर है जनमत से

सत्ता सियासत की ऊँचाई ||

 

संसद मेँ ठलुए बकचातुर ;

ओहदोँ पर काबिज़ हैँ कसाई

 

नामवरी का क्या मुगालता ;

हूँ अदना सा आदमी भाई ||

 

मजहब,जाति-ज़मातोँ ने की ;

है गहरी नफ़रत की खाई ||

 

हक़ की बात कही जो 'महरूम ' ;

लो पानी मेँ आग लगाई ||

= = = = = = = = =

3 blogger-facebook:

  1. सच्चाइयों के पास हैं, महरूम की गज़लें.
    ग़ज़लों में भी कुछ ख़ास हैं, महरूम के गज़लें.
    खरी-खरी कहने के अपनी प्रकृति के अनुकूल ,आपकी दोनों गज़लें बहुत अच्छी हैं.साधुवाद.

    उत्तर देंहटाएं
  2. सच्चाइयों के पास हैं, महरूम की गज़लें.
    ग़ज़लों में भी कुछ ख़ास हैं, महरूम के गज़लें.
    खरी-खरी कहने के अपनी प्रकृति के अनुकूल ,आपकी दोनों गज़लें बहुत अच्छी हैं.साधुवाद.

    उत्तर देंहटाएं
  3. Dharmendra Tripathi6:26 pm

    Thahre huye pani mein halchal machati huyi rachnaye.

    उत्तर देंहटाएं

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