सोमवार, 28 मई 2012

मोतीलाल की कविताएँ - बादल की बहार, मैं लौटूंगा

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बादल की बहार

खोई हुई प्रतिध्वनि

तैरने लगे हैँ तालाब मेँ

बाढ़ मेँ बहते झाड़-झंकार

छाती की जेब मेँ समा जाते हैँ

और नीरव वेदना की वाणी

सारे समुद्र का पानी सोखकर

विस्मृति की परछाईयोँ मेँ

बादल बन उड़ जाते हैँ

कि है अभी भी

बहुत कुछ अनजाने

जिसे मेरे आकाश ने नहीँ जाने हैँ

 

अंधेरे मेँ मैंने देखा

सफेद बादल का टुकड़ा

आकाश के सूने थाल पर

आसानी से चला जाता है

जैसे कोई नाव

शांत समुद्र मेँ बही जा रही हो

आसमान सील जाता है

जैसे दरजिन चिड़िया

सीती है अपने लिए घर

और टांकोँ की जगह

तारे मुस्काते हैँ

 

बादलोँ से बने धागे

मुझे बैठा देता है

चाँद से बने टोपी पर

कि आँखोँ की पुतलियोँ के कोर मेँ

कोई स्वर अंधेरे मेँ फूट पड़े

जैसे फूटते हैँ हमारे गुलाब

सूर्य की किरणेँ पाकर

मैँ नहीँ होता

तब भी तारोँ भरा आकाश मौन रहता स्मृति और आशंका से लिपटे सपने

तब भी टंगे होते आकाश मेँ

और विशाल वेदना की पुतलियोँ मेँ

मैँ होता

उसी बादल के भीतर

खोजता हुआ अपने आँचल के पानी को ।

--

मैं लौटूंगा

मैँ लौटूंगा जरुर एक दिन
नदी के तट पर बसे अपने गाँव मेँ

हो सकता है मैँ आदमी न रहूँ
तब मेरे गाँव की नदी मुझमेँ उतर जाए और संभव है मैँ आदमी मेँ लौट आऊँ
हो सकता है कुहासे के किसी सुबह
उठती लहर के जल से मैँ तिक्त होकर सफेद बगुले सा उड़ता हुआ आ पहुँचू अपने पीपल के छाँव मेँ
और हो सकता है चुपचाप अंधकार मेँ डायन की हाथ की तरह कोई भुतहा पेड़ रोक देँ मेरे पांवोँ को जो जाना चाहते हैँ गाँव की रसमयी पगडंडी को

पर जरुरी है
मेरे लिए लौटना अपने गाँव

चमकती दुनिया के इस बाँस चढ़े शहर मेँ कम नहीँ हैँ डायनोँ की चीखेँ
कम नहीँ हैँ भूतहोँ से डूबेँ कराहेँ
एक-एक ईँट मेरे अंदर धँसकर
न जाने कहाँ खो गया है
और मानवीयता की मोटी रस्सी
मेरे मन के बेडरुम से गायब हो गयी है

मुझे दिखता है
छप्पर की छाती चूमकर उठता धुँआ
पक्षी लौटते संध्या की हवाओँ को चूमते कलमी के गंध भरे जल मेँ तैरते बत्तखेँ घाट पर जाती इठलाती वधुएँ
आम की छाँह मेँ सुस्ताते चरवाहे
खेतोँ के गद्दोँ मेँ लोटते बच्चे
और आँगन मेँ रंभाती गायेँ

मुझे लौटना ही होगा
उन हवाओँ मेँ
जहाँ मानव बसते हैँ ।

 

--

 

* मोतीलाल/राउरकेला

* 9931346271

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