बुधवार, 30 मई 2012

प्रभुदयाल श्रीवास्तव की बुंदेली लोक कथा - परिश्रम कौ फल

परिश्रम कौ फल
                              बचपना बाकी बचो है अब भी  अपने पास में
                             कोई शायद फिर थमा दे झुनझुना,इस आस में
                             एक लोरी फिर सुना मां या सुना किस्सा कोई
                             जिंदगी प्यासी अभी तक सीखने की प्यास में।
               जे पंक्तियाँ हमईरी लिखीं आंयें और जब जब भी अम्मा की खबर आउत सो इनईं खों पढ़कें जी हल्को कर लेत। एक शायर सुदर्शन फाकिर साहब ने का खूब कई है बचपन के बारे में के "ये दौलत भी ले लो ये शोहरत भी ले लो भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी, मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन वो कागज की किश्ती वो बारिश का पानी" फाकिर साहब की ई गज़ल खों लोग बाग जगजीत सींग की गज़ल केत हैं काये सें उनने जा गज़ल बड़े सुंदर ढंग सें गाकें खूब शोहरत बटोरी। सब कछू चलो जाये और बचपनों फिर मिल जाये तो का केने।पे ऐसो होत नईंयाँ। बचपन के बे दिना भूलत नईंयाँ जब दूसरों के बगीचा सें आम चुराउत पकड़े जातते और बागवान के हातन  पिटत हते। अंडा डावरी ,अब्बक दब्बक दांय दीन,अटकन चटकन दही चटाकन और पिट्टू की खबर आउत सों आंखन में खुसी के अंसुआ आ जात । मोखों तो लगत है के बुंदेल की भूमि पे तो देवता लो बच्चा बनकें बच्चों में मिलकें खेल जात हों और कौनौउं खों पता तक ने लग पाउत हो। ऐसई हमें अपनी अम्मा की खरर‌ आ जात ।कित्ती कहानी किस्सा सुनाउत तीं ,समय के संगे सब बिसरतजा रईं।अम्मा के संगे सबरे भैया  बेन पर रेत ते "अम्मा एक किस्सा सुनाओ " सबरे उनके पीछें पर जातते ।एक किस्सा, दूसरी किस्सा , तीसरी किस्सा चौथी किस्सा.....कबौउं खतम ने होत तीं जब तक हम ओरें सो ने न जाबें।पहले तो मुतकॆ भैया बेन रेतते चार पांच तो कम सें कम हर घर में होत ते।कहूं कहूं तो दस बारह तक। अब तो बड़ी मुश्किल सें एकाधई किस्सा याद आ पा रई।पुरानी धरोहरें आंयें सो इनखों सहेज कें धरबो जरूरीहैंसो जा किस्सा दिमाग पे ज़ोर डारकें याद कर पाये और फिर लिख रये है।
                 एक गांव में एक डुकरिया रेत ती,रोज को चार टिक्कड़ सेंक लेतती और नोन मिरचा कें संगे खा लेत ती।  एक दिना चूले में गीलीं लकड़ियां लगायें बा चूलो फूंक रईती, खूब धुआँ हो रओ तो सो ओई घर में रेबे बारी एक चुखरिया दम घुटबे सें अपने बिल में सें बायरे निकर आई और केन लगी काये डुक्को माता काय इत्तॊ धुआं कर रईं हम तो दम घुटबे सें मरई जेहें।डुक्कॊ केन लगीं हम का करें लकडियां गीलीं हैं सो आय धुआँ हो रओ। चुखरिया गई और अपने बिल में सें सूखीं लकडियां उठा ले आई"जे लिओ बौ चूले में लगा लो और रोटी बना लो। "डुक्को ने चूलो जलाओ और रोटो बना लई। अब काहे ,चुक्खो रानी ई रोटी पे कूंदें कबऊं ऊ रोटी पे कूंदें। डुक्को केन लगीं अब तुम जो काये करतीं काये कूंद‌ कूंद के हमाईं रोटीं खराब कर रईं। चुक्खो केन लगीं....
                                  "अल्ल में गई बिल्ल में गई
                                   बिल्ल में सें लकड़ी लाई
                                   लकड़ी मैंने तोय दीनी
                                   का तें मोय एक रोटी न देहे।"

डुक्को ने ऊखों एक रोटी दे दई।चुक्खो बाई रोटी लेकें आगे खों बड़ीं सो  आगे उनें एक कुम्हार मिल गओ ।ऊको  मौड़ा बड़ी जोर जोर सें रो रओ तो। चुक्खो ने कई" काये भैया काय मोड़ा खों रोआ रये। "कुम्हार केन लगो के मोड़ा खों भूंख लगी है और ईकी मताई अबे लो रोटो नईं ले आई।"
"ईमें का बड़ी बात जा ले लो रोटो और मौड़ाये खुआ दो।" कुम्हार ने रोटी लेकें मौड़ा खों खुआ दई।मौड़ा चुप हो गओ।अब चुक्खो रानी कुम्हार के मटकन पे कूंदन लगीं कबऊँ ई मटका पे कूंदें कबऊं ऊ मटका पे कूंदें। कुम्हार ने कई जो काय कर रईं काय हमायॆ मटका खराब कर रईं। चुखरिया केन लगी
                                "  अल्ल में गई बिल्ल में गई
                                  बिल्ल में सें लकड़ी लाई
                                   लकड़ी मैंने डुक्को दीनी
                                   डुक्को मोखों रोटी दीनी
                                   रोटी मैंनें तोय दीनी      
                                    तें का मोय मटका ने देहे।"

  कुम्हार ने ऊखों एक मटका दे दओ। अब काहे चुक्खो रानी मटका लेकें आगे बड़ीं। रस्ता में ऊखों एक अहीर मिल गओ।मूड़ पे हाथ धरे बैठो तो बाजू में भैंसें बधीं थीं।चुखरिया केन लगी..
  "काये दद्दा काये मूड़ पकरें बैठे का भैंसें नईं लगाउने। "
    " का बतायें तोखों मोरे लिंगां ने मटका आये ने बाल्टी आये काय में दूध लगायें।"
    "जो लेलो मटका,काये परेसान होत ईमें लगाओ दूध और बेंच आओ।" चुखरिया ने ऊखों मटका दे दओ   ।
    जब अहीर ने भैंसें लगा लईं सो चुक्खो बाई भैंसन पे कूंदन लगीं कबऊं ई भैंस पे कूदें कबऊं ऊ भैंस पे कूंदें।
    "काये अब तुम काये खों ऊधम कर‌ रईं हमाई भैंसों पे काये कूंद रईं  ।" अहीर नेऊखों रोकबो चाहो।
                                 अल्ल में गई बिल्ल में गई
                                 बिल्ल में सें लकड़ी लाई
                                लकड़ी मैंनें डुक्को दीनी
                                 डुक्को मोखों रोटी दीनी
                                  रोटी मैंने कुम्हार दीनी
                                  कुम्हार मोखों मटका दीनी
                                 मटका मैंने तोय दीनों
                                 तें का एक भैंस‌ ने देहे।

      अहीर ने ऊखों  एक भैंस दे दई ।अब चुखरी बाई आगे बढ़ीं कछू दूर चलीं सो राजमहल दिखान लगो। राजा बायरेई बैठो मिल गओ।
चुखरिया ने "काये राजा साब  बाहर कायखों बैठे भीतरे रानी कि लिंगां जाकें आराम करो।"
  "आराम कैसें करें हमाओ दूधबारो नाईं आओ हमें दूध रोटी खाने।" राजा  ने जबाब‌ दओ।
  "अरे तो कायखों घबड़ात हमाई जा भैंस लेलो और दूध लगालो और मजे सें रोटी खालो।" ऐसी केकें ऊनें भैंस राजा खों दे दई।
   राजा भीतर गये , दूध निकरवाओ और रोटी खान लगे। अब काहे चुखरिया तो चकरिया बन  गई बा रानियों पे कूंदन लगी कहूं ई रानी पे
   कूंदे कहूं ऊ रानी पे कूंदे।राजा की तो मुतकी रानी हतीं। राजा ने  कई "जो तुम का तमासो कर रईं।काये हमाई रानियन खों परेसान कर रईं?
  चुखरिया केन लगी अल्ल में गई बिल्ल में गई
                                 बिल्ल में सें लकड़ी लाई
                                लकड़ी मैंनें डुक्को दीनी
                                 डुक्को मोखों रोटी दीनी
                                  रोटी मैंने कुम्हार दीनी
                                  कुम्हार मोखों मटका दीनी
                                 मटका मैंने  अहीर दीनों
                                 अहीर मोय भैंस दीनी
                                   भैंस मैंने तोये दीनी
                                 तें का  एक रानी ने देहे।

  राजा ने ऊखों एक रानी दे दई। रानी खों लेकें बा आगे बढी सो एक ढपला बारो मिल गऒ निठल्लो बैठो हतो सो चुहिया  बोलीकाये रे निठल्लो काये बैठो, काम काये नईं करत।"
हमाई‍ तो आज काम बारी नईं  आई, काम को करत।"
  "तुमा ई बे कां हैं?"
  "बे कौन?,हमाओ तो ब्याओ  लो नईं भओ।"
"अरे तो जा रानी ले लो एईसें काम करवाओ।" ढपला वारे ने रानी ले लई और ऊसें काम करवाऊन लगो।
अब चुक्खो ई ढपला पे कूंदें ऊ ढपला पे कूंदे।
  "जो काय‌ कर ऱैईं? कायखों दोंदरा दयें,अब जाओ"
  चुक्खो केन लगीं     अल्ल में गई बिल्ल में गई
                                 बिल्ल में सें लकड़ी लाई
                                लकड़ी मैंनें डुक्को दीनी
                                 डुक्को मोखों रोटी दीनी
                                  रोटी मैंने कुम्हार दीनी
                                  कुम्हार मोखों मटका दीनी
                                 मटका मैंने  अहीर दीनों
                                 अहीर मोय भैंस दीनी
                                   भैंस मैंने  राजा दीनी
                                   राजा की रानी मैंने लीनी
                                   रानी मैंनें तोखों दीनी
                                  का मोखों ढपला ने देहे

       ऊसें ढपला लेकें बा बजाऊत भई आगे चली।रात हो गई ती सो बा चुहिया एक पेड़ पे जाकें आराम करन लगी। रातखों दोक बजे पेड़ के नेंचें दो चोर आये और चोरी के माल को बटवारो करन लगे। चुहिया ने जोर सें ढपला बजाबो चालू कर दऒ।चोर डरा गये जो का हो रऒ का भूत हैं इते कऊँ  गाज तो नईं गिरी पर रही।सबरो लूट को माल छोड़कें बे भग गये। चुक्खो बाई आराम सें पेड़ सें उतरीं सबरो सामान सोनो चांदी उठाकें अपने बिल में ले गईं और आराम सें रेन लगीं । अब उनके पास कछु कमी नईया,ठाठ से रे रईं।
     कथा को सार जो भओ के महनत करो और सबकी मदद करो  सो फल सोई मिलत जैसो ऊ तनक सी चुखरिया खो मिलो।

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