शुक्रवार, 11 मई 2012

मीनाक्षी भालेराव की कविताएँ

नारी

हे पुरुष तुम किस बात के लिए,

खुद को सर्वश्रेष्ठ समझते हो ? 

नारी के जिस्म से पैदा होकर,

नारी को ही छलते हो !

पहली बार जब आँखे खोलते हो,

माँ के आंचल से जीवन अमृत पीते हो !

जीवन उसी के दम पर पाते हो,

तब भी उसे कमजोर कहते हो !

जब थोड़े बड़े होते हो,

दादी, नानी की अंगुली पकड़ कर चलते हो !

फिर भी उसे असहाय कहते हो,

बहनें जो रात दिन भाइयों की !

सलामती की दुआ मांगती है,

तुम्हारी उन्नति के लिए,

व्रत-उपवास रखती है !

फिर भी उसे बोझ समझते हो,

पत्नी जो दिन-रात सेवा को तत्पर रहती है !

अपना अस्तित्व खोकर,

तुम्हारा वंश बढ़ाती है !

हर पल तुम्हारा मार्ग दर्शन करती है,

अपना सुख खो कर,

तुम्हारे परिवार के सुख के

पिसते-पिसते मरती है  !

फिर भी उसे अबला नारी कहते हो !

बेटी जो घर की रौनक होती है

लक्ष्मी बनकर घर भर देती है

फिर भी उस की पैदाइश पर ,

मातम मनाते हो, उठाकर

अजन्मी बच्ची को मार फेंकते हो !

है पुरुष तुम किस बात के लिये,

खुद को सर्वश्रेष्ठ समझते हो ?

 

पूजाअर्चना

लो कर लो पूजा अर्चना,

माँ के चरण-कमलों में !

पी लो चरणामृत तुम ,

ममता मय छवि का !

आदर्य दे दो तुम ,

स्नेह के बनकर पुजारी !

मन में अलख जगालो,

दर्शन कर लो साक्षात् !

करुणा मय मूरत का,

राजा हो या रंक माँ की !

महिमा हर कोई जाने जो, 

ना जाने वो मूर्ख अज्ञानी !

 

माँ तुम  

हे माँ तुम करूणा का सागर हो !

तुम धूप में छाया हो ,

तुफानों में सहारा हो,

हे माँ तुम निराशा में आशा हो !

हार में जीत हो ,

तुम बीमार की संजीवनी,

दुखियों की मुस्कान हो,

हे मां तुम जीवन का आगाज हो !

तुम बादलों की बूँदें हो ,

तुम पतझड़ में सावन हो ,

प्यास में तुम पानी हो,

हे माँ तुम मृत्यु में जीवन हो !

तुम संध्या का दीप हो,

तुम पूजा की आरती हो,

तुम मन्दिर की मूरत हो,

हे माँ तुम साक्षात् ईश्वर हो !

 

माँ की पहचान

हाँ मैंने भगवान को देखा है !

मन्दिर, मस्जिद, गुरुद्वारा में नहीं,

अपने घर आंगन में देखा है !

हाँ मैंने अपनी माँ को,

भगवान के रूप में देखा है !

मेरे रोम-रोम को वो पहचाने ,

मेरी हर धडकन को वो जाने

मैं रो दूँ तो वो रोदे !

मैं हंस दूँ तो वो मुसकाये ,

मैं कब क्या चाहूँ वो जाने

हर कोशिश कर मेरा मन बहलाए !

ईश्वर से पहले वो जाने ,

मेरे ह्रदय की चाहत को

पूरा करने को रात-दिन ,

वो अपना हर स्वप्न भूल जाये

जभी तो हर इन्सान के मुख से

रब से पहले हे माँ निकले !

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