मंगलवार, 8 मई 2012

वीरेन्‍द्र कुमार कुढ़रा का व्यंग्य - अपहरण न होने का दुख

जकल हम बहुत दुखी हैं। लानतें आ रहीं हैं खुद पर। हम इस काविल भी नहीं कि

हमारा अपहरण किया जा सके ? परेशानी की बात तो है ही। यदि परमात्‍मा ने हमारी उम्र एक पूर्ण शतक निर्धारित की है तो हम उम्र के स्‍कोर में एक चौथाई रन तो ले ही चुके हैं। लेकिन, अभी तक हमारे अपहरण की ओर किसी ने भी ध्‍यान नहीं दिया झूठी मूठी खबर तक नहीं पहुँचाई।

अपहरण होने से मिलने वाली लोकप्रियता की खुजली में कितना रस मिलता है ? यह तो हमको उस समय पता चला, जब हमारे एक मित्र का अपहरण किसी दूसरे के धोखे में कर लिया गया। और वह दो चार दिन में ही सर्वाधिक चर्चित नागरिक हो गया। एक हम हैं कि दो चार डिग्रियां लिये सरकारी दफ्‍तरों की चौखटें तोड़े डाल रहे हैं। अपहरणकर्ताओं के अपने प्रति घोर उपेक्षापूर्ण रवैये ने हमें बेचैन कर रखा है। धोखे धंधे में ही पकड़ ले जाते तो निहाल हो जाते। अपहरण होते ही हम रातों रात लोकप्रिय हो जायेंगें। अखबारों में फोटू छपेंगें सो अलग। ऐसा हमारा विश्‍वास है। छूटकर आते ही लेखक सत्‍यकथा का मसाला लेने, पत्रकार अपने अखबार के लिये इन्‍टरव्‍यू लेने, दौड़े आयेंगें।

हमारी समझ में नहीं आता। आखिर, हम में ऐसी कौन सी कमी है ? क्‍या यही कि हमारे पास दो चार डिग्रियाँ हैं, रोजगार कार्यालय में नाम लिखा है ? घर परिवार से थोड़ी बहुत गरीबी भी जुड़ी है। शहर में अच्‍छा नाम भी है। कभी कभी तो लगता है इस मनहूस जमाने की शक्‍ल ही न देखें। जहाँ हमारे अपहरण के लिये भी कोई तैयार नहीं। डूब कर मरें भी तो कैसे ? देश में नागरिकों को पानी सप्‍लाई की जर्जर हालत को जानते हुये भी चुल्‍लू भर पानी अपने स्‍वार्थ में बेकार जाने दें......यह गबारा नहीं। वैसे अपहरण न होने का दुख हमें बिल्‍कुल नहीं होता। लेकिन जब कैरियर का प्रश्‍न जुड़ा होता तो दुःख होना स्‍वाभाविक भी है।

एकाध बार धोखे में ही अपहरण हो जाता तो जिन्‍दगी पटरी पर दौड़ने लगती। रोजगार कार्यालय के चक्‍कर फिर किसको लगाने थे ? राजनीतिज्ञों एवं गुटबाजों के बीच चर्चा का विषय बन जाते। यदि अपहरणकर्ता हमको बिना फिरौती लिये ही वापिस करने पर उतारू होता तो हम स्‍वयं को अपहरण किये रहने की जबरदस्‍ती करते, फरियाद करते, गिड़गिड़ाते। पर कैरियर चौपट कदाचित्‌ न होने देते। उनके अड्‌डे देखते, काम करने के तरीके सीखते। बारे न्‍यारे करने के नुक्‍ते सीखते। लेकिन अपहरण हो तब न।

यूँ हम अपने अपहरण के लिये तमाम कोशिशें कर चुके हैं। लड़की बाले जब कभी हमारे संबंध के बारे में आते तो हम बड़ी उदारता से डयलॉग मारते - ”दान दहेज की कोई बात ही नहीं है। लड़की देखने भालने में यदि अच्‍छी न हो तो बुरी भी न हो। बस पढ़ी लिखी जरूर हो।“ हमारे उद्‌गारों से दान दहेज के आधार पर ग्राहक की तरह खरीददारी करने आये लड़की वाले चौंक जाते। हमारी उदारता को कमजोरी समझते।

और हमारी कमियाँ गिनने पर आमदा हो जाते। दूसरा घर-वर तलाशना शुरू कर देते। हमारा यह डायलॉग तो हमारा नारा बन गया। जिसे हम कई लड़की वालों के सामने दुहराते आये हैं। कई बार जब हम किसी हमउम्र की बारात में जाते तो लड़की वालों तक यह बात जरूर पहुँचा देते.....”दूल्‍हा अगर दहेज या लेने देने के चक्‍कर में मचले तो बंदा दूल्‍हे की वैकल्‍पिक व्‍यवस्‍था स्‍वरूप में प्रस्‍तुत रहेगा।“ लेकिन, फिर भी किसी बारात में हमको दूल्‍हा बनने का मौका हाथ नहीं आया। हमें अपना अपहरण करवाकर जबरन दूल्‍हा बनने का सपना सीने में दबायें रखना पड़ता, और लड़की वाले ज्‍यादा से ज्‍यादा नोट गिनाकर दूल्‍हे को ही खुश करने में लगे रहते।

लड़की वालों की इस नासमझी पर तरस खाते हुये भी हम चुप नहीं है। अब भी आशा करते हैं, शायद किसी खूबसूरत कन्‍या में समझदारी भी निकल आये। लड़की अपनी समझदारी का परिचय देते हुये हमारा अपहरण कर ले। दहेज बच जायेगा और घर भी बस जायेगा। उसके दोनों हाथ घी में और हमारा सिर कढ़ाई में। इस अपहरण में भी हमारा नाम तो होगा ही। जिन्‍दगी का एक बड़ा काम भी पूरा हो जायेगा। जब हमारी यह उदारता भी हमारा अपहरण न करवा सकी तो सोचते हैं कि अपहरण यदि किसी गेंग द्वारा ही एक बार हो जाये तो कई मंजिलें आसान। अपहरण के जरिये घर तो बनता ही है। बाहर भी सुधर जाता है। अच्‍छे खासे अपहरणकर्ता के सत्‍संग से लाखों रूपये कमाने की नई स्‍कीम जान जायेंगें। लक्ष्‍मी दायें बायें खड़ी नजर आयेगी। बेरोजगारी अपने आप दूसरा घर तलाशती नजर आयेगी। अपहरणकर्ताओं से संबंध बनते ही हमारे संबंध राजनीति के पट्‌ठों, बड़े बड़े अधिकारियों, नेताओं सेठ साहूकारों से स्‍वतः हो जायेंगें। फिर सफेद पोशों की तरह शहर के बीच रहने को मिले तो सोने में सुहागा ही कहा जायेगा।

आज के युग में अपहरण होने का मतलब है ”कॅरियर“ की शुरूआत होना। अपहरण के बाद भी यदिबैरंग लौटना पड़ता है तो दस्‍यु पीड़ितों को दी जाने पूरी सरकारी रियायतों के हकदार होंगें। हमारी भावी पीढ़ी को हमारे अपहरण के आधार पर आरक्षण और बजीफे की सुविधा मिलेगी वह अलग।

अब आप ही बताईये बाजिव है न हमारा अपहरण न होने का दुख ? अपहरण न होने से हमारा भविष्‍य अन्‍धकारमय है या नहीं। अपहरणकर्ता चाहें तो इस पते पर सम्‍पर्क करें - द्‌वारा ः संपादक.......।

- वीरेन्‍द्र कुमार कुढ़रा 3/14 रिछरा फाटक दतिया (म�प्र�) 475-661

E-mail-Vkudhra3@ gmail.com

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