रविवार, 6 मई 2012

विनायक पाण्डेय की कविता - कुछ सवाल

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राख के ढेर से उठाया था इस चिंगारी को
और ये मुझसे ही शिकायत करती है
मेरे एहसानों का एहसास ही नहीं इसे
ये कैसी मेरी जिन्दगी है

कितनी तन्हा है ये खुद भी जानती है
मेरे सिवा न कोई इसका और
जब भी हँसती है खुद पे साफ झलकता है
ये कैसी मेरी हर ख़ुशी है

कतरा भर उम्मीद लड़ती है अंधेरो से
पर जलाने को और आंसू बाकी नहीं
बुझने को मजबूर है पर बुझती भी नहीं
ये कैसी मेरी रौशनी है

ये फासले नापे है कई बार यूँ तो
पर आज रास्ता कुछ लम्बा लगा
लफ्ज वही हैं पर सुर बदले से है
ये कैसी मेरी मौसिकी है

3 blogger-facebook:

  1. बेनामी6:11 am

    bahut khoob likha hai pandey ustaad.



    sachan

    उत्तर देंहटाएं
  2. सुन्दर भावपूर्ण प्रस्तुति...बहुत बहुत बधाई...

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत बढ़िया......अच्छा लगा|

    उत्तर देंहटाएं

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