गंगाप्रसाद शर्मा 'गुणशेखर' की बाल कविता - अनोखे लाल

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सबको प्रिय अनोखे लाल
ले लो लौकी ,आलू ,गोभी
हरी मिर्च,बैंगन हैं जो भी
सबको सस्ते में दे  दूँगा
जो भी दोगे मैं रख लूँगा .


देता छाँट-छाँट के माल
सबको प्रिय अनोखे लाल.


 मैं हूँ अजब अनोखे लाल
मेरा सबसे न्यारा माल
ले लो बहन जी ,माई  ले लो
बाबू  जी तुम भी कुछ ले लो.

देता छाँट-छाँट के माल
सबको प्रिय अनोखे लाल.


मेरे प्यारे लल्ला आओ
घर से अपना बल्ला लाओ
आज हो जाऊँ  चाहे लेट
मैं भी खेलूँगा किरकेट .


खीँच अनोखे ठेला लाया
बीच सड़क पर उसे लगाया
फिर मारे कुछ चौके-छक्के
कैच लिए कुछ उचक-उचक के.
देता छाँट-छाँट के माल
सबको प्रिय अनोखे लाल.


आलू,गोभी सब बेभाव
किसी को सेरों किसी को पाव
सबसे प्यारी बोली बोले 
सब कुछ  सदा बराबर तोले
देता छाँट-छाँट के माल
सबको प्रिय अनोखे लाल.

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1 टिप्पणी "गंगाप्रसाद शर्मा 'गुणशेखर' की बाल कविता - अनोखे लाल"

  1. बाल स्वभाव को ध्यान में रखते हुए आपने बहुत गेय बाल कविता रची है... काफी मजेदार है. गीति का रस अंत तक बरकरार रहता है.

    बहुत बहुत आभार ... आपने एक श्रेष्ठ कविता बाल-साहित्य को दी.

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