शुक्रवार, 11 मई 2012

गोवर्धन यादव का आलेख - थाईलैंड में समुद्र मंथन

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थाईलैंड में समुद्र मंथन समुद्र मंथन की कहानी मुझे बचपन में माँ ने कह सुनायी थी. उनके कहने का ढंग बडा रोचक होता था. जो भी वे बतलाती जाती, उसका काल्पनिक चित्र आँखों के सामने सजीव हो उठता था. उस कहानी में एक समुद्र था जिसका ओर-छोर दिखाई नहीं देता था, मथानी के रुप में मन्दरांचल पर्वत को उपयोग में लाया गया था और उस पर्वत से वासुकी नाग को नेति कि तरह लपेटकर खींचा गया था. मंथन से चौदह रत्न निकले थे जिसे देव और दानवों के मध्य बांट दिया गया था. बाद में किसी फ़िल्म में इसे रुपायित होते हुए देखने को मिला था. अपनी उम्र के सढसठवें पडाव पर मुझे तृतीय अंतरराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन में एक प्रतिनिधि के रुप में भाग लेने का सौभाग्य प्राप्त हुआ .अपनी यात्रा के अन्तिम पडाव पर वहाँ से लौटते हुए थाईलैंड के हवाई अड्डे पर जिसका नाम संस्कृत में “सुवर्ण भूमि” रखा गया है, पर करीब बावन फ़ीट लंबी, तथा पंद्रह फ़ीट ऊँची प्रतिमा जो समुद्र मंथन को लेकर बनाई गई है, देखने को मिली. उसे देखते हुए मुझे आश्चर्य इस बात पर हो रहा था कि समुद्र मंथन की कहानी जो भारतीय मनीषा को लेकर लिखी गई थी, विदेशी धरती पर देखने को मिल रही है.

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इतिहास को खंगालने पर ज्ञात हुआ कि कभी भारत की सीमाएं ईरान, अफ़गान, सिंगापुर, मलेशिया, थाईलैंड जिसे श्यामभूमि के नाम से जाना जाता था, तक फ़ैली हुई थी. फ़िर व्यापार अथवा नौकरी करने के लिए जो भारतीय यहाँ पहुँचे, उन्होंने अपनी सांस्कृतिक पहचान को स्थायी रुप देने के लिए इस प्रतिमा की स्थापना करवाई. उस आदमकद प्रतिमा को देखते हुए मुझे उस कविता की चार लाइनें यादे हो आयी जिसमें समुद्र मंथन से प्राप्त हुए उन चौदह रत्नों कि व्याख्या की गई है, इस प्रकार है. श्री, मणि, रंभा, वारुणि/अमीय, शंख, गजराज/धनवन्तरि धन , धेनु, शशि/चक्र, हलाहल, बाज” समुद्र मंथन में सबसे पहले “हलाहल”(जहर) निकला, जिसे न तो देव ग्रहण करना चाहते थे और न ही दानव. असमंजस की स्थिति देख, देवों के देव महादेव ने उसे स्वीकार करते हुए अपने कंठ में धारण कर लिया. जहर के गले में उतरते ही उनका कंठ नीला पड गया. इस तरह इनका एक नाम “नीलकंठ” पडा. दूसरे क्रम में”कामधेनु” गाय निकली, जिसे ऋषियों ने ले लिया. तीसरे क्रम में “उच्चैश्रैवा” नामक घोडा निकला, जिसे दानवों के राजा बलि ने रख लिया. चौथे क्रम पर “ ऎरावत” हाथी निकला, जिसेइंद्र ने अपने काननवन में भेज दिया. पांचवें क्रम में “कौस्तुभमणि” मणि निकला, जिसे भगवान विष्णु ने ग्रहण कर लिया. फ़िर छटे क्रम पर कल्पवृक्ष´निकला, जिसे इंद्र ने अपने उद्यान मे रौंप दिया.

इसके बाद“रंभा” नामक अप्सरा निकली, जिसे भी इंद्र ने अपने दरबार में भेज दिया. इसके बाद “लक्ष्मी” का प्रकाट्य हुआ.जिसे भगवान विष्णु ने अपनी भार्या बना लिया. इसके बाद” वारुणि”( शराब )निकली, जिसे दानवों ने अपने कब्जे में कर लिया.इसके बाद “चन्द्रमा”जिसे देवों के देव महदेव ने अपनी जटा में धारण कर लिया. फ़िर” पारिजात” नामक एक वृक्ष निकला जिसे पुनः इंद्र ने अपने काननवन में लगा दिया. इसके बाद “शंख” निकला जिसे विष्णु ने अपने अधिकार में ले लिया.इसके बाद “ धन्वन्तरि” नामक वैद्ध निकले, जो देवों के चिकित्सक बने. सबसे अंत मे” अमृत” निकला.

अमृत के निकलते ही देव और दानवों मे संग्राम छिड गया क्योंकि दोनों ही पक्ष इसे पीकर अमर हो जाना चाहते थे. जब मामला शांत होता दिखायी नहीं दिखायी दिया तो भगवान विष्णु ने “मोहिनी” का रुप धारण कर, प्राप्त अमृत को एक बडे पात्र में भर कर देव और दानवों से कहा कि वे पंक्तिबद्ध होकर बैठ जाएं, सभी को बारी-बारी से अमृतपान करवाया जाएगा. भगवान विष्णु जानते थे कि अगर अमृत दानवों को पिला दिया गया तो वे अमर हो जाएंगे और देवों को परेशान करते रहेगे. अतः चालाकी से उन्होने उस पात्र को दो हिस्सों में बांट दिया. एक में अमृत और दूसरे में मदिरा भर दी गई. जब देवों को अमृत पिलाते तो अमृत भरा हिस्सा देवों की तरफ़ कर देते. जब दानवों की बारी आती तो उसे पलट देते थे. दानव जानते थे कि विष्णु देवताओं का पक्ष लेकर उनके साथ छलावा करते रहे हैं. अतः एक दानव ने देवता का रुप धारण कर उस पंक्ति मे जा बैठा जहां देवगण बैठे हुए थे. विष्णु ने उसे देव समझकर जैसे ही अमृत के पात्र को उडेला, पास बैठे सूर्य और चन्द्रमा ने श्री विष्णु से शिकायत कर दी. पता लगते ही. विष्णु ने अपने चक्र से उसकी गर्दन उडा दी. तब तक तो काफ़ी देर हो चुकी थी. अमृत की कुछ बूंदे गले से नीचे उतर चुकी थी. गर्दन कटने के बाद भी वह दानव अमृत के प्रभाव से मर नहीं सका. दो टुकडॊं में बंटॆ दानव का एक हिस्सा राहू और दूसरा केतु कहलाया. हिन्दु मान्यता के अनुसार राहू और केतु बारी-बारी से सूर्य और चन्द्रमा को ग्रसते है, इसी के कारण सूर्यग्रहण और चन्द्रग्रहण होता है, को बल मिलता है.

पौराणिक मान्यता के अनुसार ऋषि दुर्वासा के श्राप से सभी देगगण अपने राजा इंद्र सहित बलहीन हो गए थे. उस समय दानवों का राजा बलि हुआ करता था. शुक्राचार्य दानवों के गुरु थे. वे जब-तब राजा बलि को इंद्र के खिलाफ़ बरगलाते थे और वे देवों पर आक्रामण कर उनकी संपत्ति पर अपना अधिकार जमा लेते थे. घर से बेघर हुए देवताऒं ने अपने राजा इंद्र को अपनी व्यथा-कथा कह सुनायी, पर वह तो स्वयं निस्तेज था, मदद नहीं कर पाया. इस तरह सभी देवताओं ने ब्रह्मा को अपना दुखडा कह सुनाया. ब्रह्मा ने उन्हें श्री विष्णु के पास भिजवाया. विष्णु ने सारी बतें सुन चुकने के बाद समुद्र मंथन की योजना बनाई. वे जानते थे कि दानवों को बलहीन करने के लिए शक्ति चाहिए और वह समुद्रमंथन के जरिए ही हासिल की जा सकती है. उन्हीं की योजना के अनुसार उन्होंने वासुकि नाग को नेति, मन्दराचल पर्वत को मथानी और स्वयं कच्छप बनकर मथानी का आधार बनने का आश्वासन दिया. इस तरह समुद्र मंथन का अभियान चलाया गया और वहाँ से प्राप्त शक्तियों को अपने अधिकार में लेते हुए उन्होने दानवों को फ़िर एक बार पाताल की ओर लौटने पर मजबूर कर दिया था.

. थाईलैंड में बुद्ध धर्म अपने शिखर पर है. सभी बौद्ध मंदिरों में आपको बगवान बुद्ध की सोने से पालिश की गई भव्य प्रतिमाएं देखने को मिलती है. इसके साथ ही वहाँ हिन्दु धर्म का भी अच्छा खासा प्रभाव देखने को मिलता है. वहाँ एक से बढकर एक हिन्दु देवी-देवताओं के मंदिर हैं, धर्म के नाम पर यहाँ झगडा-फ़साद कभी नहीं होता और न ही कोई किसी पर जबरदस्ती अपना प्रभाव ही डालता है. हिन्दु-बौद्ध और मुस्लिम सभी पक्ष के लोग यहाँ बडे ही सौहार्दता के साथ अपना जीवन बसर करते हैं.

गोवर्धन यादव
103,कावेरी नगर,छिन्दवाडा (म.प्र.) 480001
07162-246651,9424356400

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