शनिवार, 12 मई 2012

रणविजय सिंह का व्यंग्य – बाल्ड इज ब्यूटीफ़ुल

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(ऊपर का चित्र - ब्यूटीफुल - बाल्ड रजनीकांत)

आजकल तमाम जीव और प्रजातियां विलुप्त होने के कगार पर हैं। शेरों के संरक्षण के लिए अथक प्रयास किये जा रहे हैं, जिम कार्बेट से लेकर बांधवगढ, रणथंभौर, सरिस्का तक तमाम अभ्यारण्य बनाये गये हैं। इनमें शेर हों या न हों पर उन्हें देखने वालों की भीड़ निरन्तर बनी रहती है। संरक्षण के लिये ही सिंहों को गीर में समेट दिया गया है। इसी प्रकार अनाजों की कई प्रजातियां या तो लुप्त हो चुकी हैं या लुप्त प्राय हैं। अपने आप उगने वाले 'लमेरा' अथवा वैज्ञानिक कृषि की पहुंच के बाहर के क्षेत्रों से लाकर इनका जीन बैंक बनाया जा रहा है। भारतीय प्रजाति की गायों के संरक्षण की भी आवाज उठ रही है। गौरेयों की कम होती जनसंख्या पर चिन्ता व्यक्त करते हुए लोगों ने इनकी संख्या बढ़ाने के प्रयास शुरू कर दिये हैं।

यहां तक कि हेय दृष्टि से देखे जाने वाले किन्तु वातावरण की स्वच्छता के लिए अत्यंत आवश्यक और लुप्तप्राय हो गये गिद्धों की संख्या बढ़ाने पर भी सरकारी गैर सरकारी दोनों ही तरफ से व्यापक प्रयास किये जा रहे हैं। देशी मछलियों को भी बचाया जा रहा है। जलचर, थलचर, नभचर सब ही यही स्थिति है। पूरा विश्व इन प्रजातियों को विलुप्त होने से बचाने लिये प्रयासरत है। प्रकृति के अंधाधुंध दोहन के लिये कुख्यात पश्चिमी देश भी अब इनके संरक्षण के लिये तीसरे विश्व को निर्देशित कर रहे हैं। भारतीय गौवंश और गौरेयों के लिये हम स्वयं प्रयास कर रहे हैं। उनके संरक्षण पर मुझे कोई आपत्ति नहीं है। मैं इसका प्रबल समर्थक हूं किंतु इनके साथ साथ अन्य प्रजातियों का भी भला चाहता हूं। अन्य कई प्रजातियां भी विलुप्त होने के कगार पर हैं।

गंजों को ही लीजिये, पिछले पचास-साठ वर्षों में इनकी संख्या में तेजी से गिरावट आयी है, मैं स्वयं इस प्रजाति में आने का प्रबल दावेदार था। मेरे पिता और पितामह दोनों ही इसके सम्मानित सदस्य थे। परंपरा के अनुसार मुझे भी इसी प्रजाति का सदस्य होना चाहिये था पर ऐसा नहीं हुआ। मेरा पुत्र अवश्य इस दिशा में अग्रसर होने के बारे में आशंकित रहता है। गंजों की घटती संख्या का प्रमाण मैं अपने परिवार से जुटाता हूं। मेरे पिता की पीढ़ी में गंजेपन का प्रतिशत पचहत्तर था। वे चार थे जिसमें से तीन गंजे थे। मेरी पीढ़ी के सगे चचेरे छ: में से केवल दो भाई गंजे हुए। अर्थात गंजेपन का प्रतिशत चटकर तैंतीस हो गया। आधे से भी कम। गांव जवार के लोगों का कहना और मानना था कि मेरे परिवार पर सरस्वती और लक्ष्मी दोनों ही की कृपा है। यद्यपि इसे सुनना अच्छा लगता था फिर भी हम उसे हँसकर टाल देते थे। हमारी इस शालीनता का उत्तर, वे परिवार में गंजेपन की बहुतायत के अकाटब तर्क से देते थे। लोगों का तर्क था कि गंजापन प्रखर बुद्धि का परिणाम है। उनका यह भी मानना था कि प्रखर मेधा से लक्ष्मी प्राप्त होती है और लोग धनवान बन जाते हैं। उनकी दुनिया सीमित थी इस लिये वे मेरे परिवार से उदाहरण लेते थे।

क्षेत्रीय और राष्ट्रीय क्षितिज तक उनकी पहुंच नहीं थी अन्यथा वे मेरे परिवार को छोड़कर उस स्तर के बड़े लोगों का उदाहरण देते। मेरे गांव के लोग तो गंजेपन के पीछे पागल थे। किसी में गंजेपन के प्रारंभिक लक्षणों को देखते ही वे उसके भावी समृद्धि की घोषणा कर देते थे। अब यह अलग बात है कि मेरे गांव का एकलौता अनियतकालिक भिक्षुक, बंसी भी गंजा था। वर्ष में दो बार वह कुछ दिनों के लिए रास्ते में एक पेड़ के नीचे बैठकर भिक्षाटन करता था। धान और गेहूं की कटाई के समय पन्द्रह-2 दिन के लिये। पर मेरे परिवार के उदाहरण के सामने बंसी को कोई याद नहीं करता था। अच्छे उदाहरण के लिये उसके बुरे काम को भुला दिया जाता था।

पिछली सदी के सबसे बड़े महापुरुष गांधी जी, भारत के प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू, लौह पुरुष सरदार पटेल, नेताजी सुभाषचन्द्र बोस, राजगोपालाचारी आदि सभी मेरे पिता के पचहत्तर प्रतिशत भाइयों के वर्ग से थे। मेरे गांवजवार के लोगों की दृष्टि यदि व्यापक होती तो वे उनका भी उदाहरण देते। उनसे प्रेरणा ग्रहण करते। पर वे मेरे परिवार तक ही सीमित रह गये। हम आज इन विभूतियों के कृतज्ञ हैं। इन्होंने हमें स्वाधीनता दिलायी। राष्ट्र का एकीकरण किया। प्रजातांत्रिक व्यवस्था को सुदृढ़ किया। राष्ट्र का निर्माण किया। अन्य विशेषताओं के साथसाथ उनमें एक उल्लेखनीय विशेषता समान थी जिसका विवरण मैं पहले ही दे चुका हूं।

हमारे देश में धीरे-धीरे गंजों की संख्या कम होती जा रही है। इसका कारण गंजापन रोधक तेल और दवा में है। आयुर्वेद, होम्योपैथी, एलोपैथी, नेचुरोपैथी सब में इनके शर्तिया इलाज के नुस्खे हैं। देश का कोई ऐसा वयस्क नहीं है जिसने किसी न किसी समय इनका प्रयोग न किया हो। जीवों में अपना अनुभव अगली पीढ़ी में बांटने की परंपरा पायी जाती है। इसका निर्वाह हर पीढ़ी पूरी इमानदारी के साथ कर रही है। गंजापन रोकने के लिये दवाओं और तेलों के साथ-साथ टोने-टोटकों का भी प्रयोग किया जाता है। गंजों की संख्या में निरन्तर हास का प्रमाण ढूंढने के लिए मुझे कहीं दूर नहीं जाना है। अपने परिवार का उदाहरण ही मैं इसके लिये पर्याप्त समझता हूं। में नई अपने परिवार का चयन इस सर्वेक्षण में एक इकाई के रूप में किया है। उसके द्वारा स्थापित ट्रेण्ड ही पूरे देश में दिखायी पड़ रहा है। घरघर की यही कहानी है। बाल वालों की संख्या में निरन्तर वृद्धि हो रही है जब कि कभी अपनी प्रखर बुद्धि के लिए विख्यात गंजा प्रजाति की संख्या में निरन्तर कमी होती जा रही है।

स्वाधीनता के समय के राष्ट्रीय नेताओं के बारे में मैं पहले बता चुका हूं। प्रजाति की संख्या में आयी गिरावट का अनुमान इससे भी लगाया जा सकता है कि वर्तमान काल में सभी राष्ट्रीय राजनैतिक पार्टियों के अध्यक्ष बाल वाले हैं। राष्ट्रपति महिला हैंतो उपराष्ट्रपति सर के साथसाथ दाढी के बालों का भी प्रदर्शन करते हैं। प्रधानमंत्री जी की भी दाढ़ी को देखते हुए पगड़ी के अन्दर भरे-पूरे बाल होने का मुझे पूरा संदेह है। निष्कर्ष यह कि जनता और सरकार दोनों ही स्तरों पर देश में यहां उल्लेखित प्रजाति की संख्या में भारी गिरावट आयी है। तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश इत्यादि में यद्पि इसी प्रजाति के मुख्यमंत्री हैं पर आयु के हिसाब से वे वर्तमान राजनेताओं से एक-दो पीढ़ी पहले के हैं।

शोधों से पता चला है कि देश में गंजों की प्रजाति के निरन्तर हास का कारण गंजापन रोधक तेल, दवायें और टोनेटोटके हैं। इन्हें देखते हुए इस प्रजाति के संरक्षण के लिये मैं यहां दो सुझाव दे रहा हूं। पहला इन दवाओं और तेलों का उत्पादन तत्काल बंद कर दिया जाये। इनकी बिक्री प्रतिबंधित कर दुकानों और गोदामों में उपलब्ध माल को नष्ट कर दिया जाय। दूसरा देश में गंजेपन के प्रति आदर का भाव पैदा हो, इससे होने वाले लाभों के बारे में बताया जाय। इस वर्ग के महापुरुषों के माध्यम से इस कार्य को किया जा सकता है। मुझे विश्वास है कि उपरोक्त दोनों प्रयासों से इस प्रजाति को लुप्त होने से बचाया जा सकेगा। अपनी दवाओं, हेयर से, तेल, साबुन आदि की बिक्री के लिये बहुराष्ट्रीय कपनियां और विदेशी सरकारें हमारे देश में इस प्रजाति को समाप्त करने का षडयंत्र कर रही हैं। अत: हमारा यह दायित्व बनता है कि हम अपने प्रयास से उनकी साजिश को नाकाम कर दें।

विग और बालों के प्रतिरोपण को भी प्रतिबंधित कर देना चाहिए। अधिकतर लोग यह समझते हैं कि भरे-पूरे बाल सौन्दर्य की निशानी हैं। मैं इसका खंडन करता हूं। गंजे प्रजाति के लोग सघन बाल वालों से अधिक सुंदर होते हैं। फिल्म जगत में इसके उदाहरण मौजूद हैं। सलमान खान, संजय दत्त और अक्षय खन्ना सभी इसी प्रजाति के हैं। इस समय बालीवुड में ये ही सबसे सुन्दर माने जा रहे हैं। मैं इनके लिये यहां हैण्डसम के स्थान पर ब्यूटीफुल शब्द का प्रयोग करूंगा। निष्कर्ष निकलता है बाल्ड इज ब्यूटीफुल। सब में सुंदर दिखने की चाह होती है। इसीलिये वे इस प्रजाति में आना नहीं चाहते। इसके सुन्दरता का मानदण्ड बनते ही प्रजाति में प्रवेश हेतु वे कुछ भी करने को तैयार हो जायेंगे।

वैसे भी लोग फिल्मी कलाकारों का अनुकरण करते ही हैं। इन कलाकारों के बारे में बताने पर लोग इस प्रजाति में आने में गर्व का अनुभव करेंगे। इस आधार पर 'बाल्ड इज ब्यूटीफुल' आंदोलन चलाया जा सकता है। मैं इसका नेतृत्व करने को तैयार हूं। इस प्रजाति के बचे खुचे लोगों का साथ देने के लिये मैं आह्वान करता हूं। वे निश्चिंत होकर इसमें भाग ले सकते हैं क्योंकि आंदोलन में उनके तन-मन की कोई आवश्यकता नहीं है। मुझे उनके केवल धन की अपेक्षा है जो कि प्रचलित मान्यता के अनुसार उनके पास अवश्य ही प्रचुर मात्रा में होगा ही। वे मुझे धन दें, मैं उनके संरक्षण एवं संवर्द्धन हेतु संघर्ष करूंगा। राष्ट्रीय, बहुराष्ट्रीय दवा निर्माता कंपनियां भी इसमें धन लगायेंगी क्योंकि जब लोग गंजापन रोकने वाली दवाओं की जगह गंजा बनाने वाली दवायें मागेंगे। इनके विज्ञापन के लिये हमारे सदस्य मॉडल का काम कर पैसे कमा मुझे दे सकते हैं। उनसे प्रचुर मात्रा में धन प्राप्त हो जाने पर हो सकता है मैं भी उनकी प्रजाति में शामिल हो जाऊं।

मुख्य वाणिज्य प्रबंधक

पूर्वोत्तर रेलवे

गोरखपुर

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(साभार - लफ़्ज 1 जून 31 अगस्त 2011, अंक 35)

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