शुक्रवार, 11 मई 2012

अमरीक सिंह कंडा की लघुकथा - शर्म-बेशर्म

शर्म-बेशर्म

कहते हैं शर्म तथा बेशर्म दो बहनें थीं। शर्म बड़ी थी और बेशर्म छोटी। माता-पिता ने शर्म का विवाह कर दिया। बेशर्म ने माता-पिता से कहा, ‘‘पहले मेरा विवाह करना था। मैं अब शर्म के घर वाले के साथ ही विवाह करवाऊंगी। मैं कसम खाती हूं कि शर्म को मार कर ही सांस लूंगी।’’ घर वालों ने काफी समझाया परन्तु बेशर्म बहुत बेशर्म थी। उसने शर्म के घर वाले पर डोरे डालने शुरू कर दिए और एक दिन बेशर्म शर्म के घर वाले के साथ भाग गई।  फिर एक दिन शर्म तथा बेशर्म दोनों रास्ते में मिलीं। शर्म ने कहा, ‘‘बेशर्म, अब तो मर जा। मेरा पीछा छोड़, दफा हो जा और कितना तंग करेगी मुझे तू।’’ बेशर्म ने कहा, ‘‘अब मैंने नहीं मरना बल्कि तुझे मारना है। मरने से पहले देख मैंने सब को बेशर्म बना दिया है।’’ शर्म ने गर्दन उठा कर देखा तो सब तरफ बेशर्म ही बेशर्म थे। शर्म का सिर शर्म से झुक गया और बेशर्म ने झुके हुए सिर को धड़ से अलग कर दिया।

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