एस. के. पाण्डेय के दोहे

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दोहे-(६)

पाथर माने देवता बिनु माने बेकार  ।
यसकेपी संसार है बिनु माने बेसार  ।।

मातु-पिता गुर देवता जो मानो संमान ।
यसकेपी दुतकारिये नहि मानो पहिचान ।।

जननी सम परदार है माने की ही बात ।
यसकेपी माने बिना देख पशू सकुचात ।।

परधन माटी जानिये कही गई थी बात ।
यसकेपी नहि मानते बढ़ी डकैती जात ।।

परहित सम नहि पुन्य कछु परपीड़ा सम पाप ।
यसकेपी बढ़ने लगे बिनु माने संताप ।।

माने से यह लोक में रही निराली रीत ।
मनुज हुआ मानव तभी अब तो सब बिपरीत ।।

साचे योगी देखते सुख सूना संसार ।
यसकेपी भोगी मते जग ही सुख को सार ।।

केवल मनका भेद है बात एक ही साच ।
यसकेपी सब नाचते तरह-तरह के नाच ।।

जबकी सपना रूप जग ग्रन्थ कहे समुझाय ।
यसकेपी पाखंड बहु तदपि रहे जग छाय ।।

दंभ कपट छल धूरता लोग लिए अपनाय ।
यसकेपी बिरले बचे सही राह जो जाय ।।

संत ग्रन्थ गुरजन रहे ठेंगा लोग देखाय ।
यसकेपी याते मची चहूँ ओर अब हाय ।।

गंधारी ज्यों आँख पे पाटी लियो लगाय ।
यसकेपी नहि चाहते देखा किम दिखलाय ।।

बात एक ही बहुमते अर्थ होइ विपरीत i
यसकेपी निज-निज मते लोग कलपते रीत ।।

जाको जो रुचिकर लगे तामे करते प्रीति ।
यसकेपी यह ही बनी इस कलयुग की नीति ।।

सही गलत क्या कुछ नहीं मनवा बेपरवाह ।
यसकेपी सब चल दिए भली-बुरी जो राह ।।

मनुज देह धरि रहि रहे ते सब मानव नाहिं ।
यसकेपी जो मानते मानव वही कहाहिं ।।

यसकेपी नहि मानते ग्रन्थ मते दो रूप ।
जीवत शव सम या दनुज आज भरे जग कूप ।।

शव सम भे बिनु भावना इनसे कैसी आस  ।
यसकेपी इनसे भये इनके लोग निराश   ।।

दनुज रूप सुख पावते पर पीड़ा अधिकाय ।
यसकेपी जो भी करें थोर वही कहलाय ।।

बिनु माने अनरथ बड़े रोज जगत में होय ।
यसकेपी नय मानिए मानवता कह रोय ।।
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डॉ. एस. के. पाण्डेय,
समशापुर (उ.प्र.) ।


ब्लॉग: श्रीराम प्रभु कृपा: मानो या न मानो

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