शुक्रवार, 11 मई 2012

सुरेश कुमार 'सौरभ' की रचनाएँ

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......................... (1) .........................

धरती खोदेंगे तभी पायेंगे जल यारों।

बिन मेहनत नहीं मिलेगा फल यारों।।

 

जो किसान धूप में पसीना बहाता है,

उसी की लहलहाती है फसल यारों।।

 

जब समुद्र का मंथन किया जाता है,

तभी मिलता रत्न-अमृत-गरल यारों।।

 

बीस सालों तक जब अथक प्रयास हुए,

तब बना था अजूबा ताजमहल यारों।।

 

चुन-चुनकर जब शेर इकट्ठे करोगे,

तभी बन पायेगी मुक़म्मल ग़ज़ल यारों।।

 

तुम कुछ नहीं कर सकते, क्यों सोचते हो,

ये सोच अभी से ही दो बदल यारों।।

 

हम नौजवान हैं दुनिया बदल सकते हैं,

अगर करलें अपना इरादा अटल यारों।।

 

बदनसीबी का कीचड़ है, पर मत भूलो,

कीचड़ में भी खिलता है कमल यारों।।

 

ये हाथ माथे पर क्यों हैं? हटा लो इसे,

अरे! कौन नहीं होता है असफल यारों।।

 

हमें हर हाल में चलना है ठान लें गर,

पथरीली राह बन जाये मखमल यारों।।

 

सूरज को तोड़कर हथेली पर रख लो,

रास्ते का हर पर्वत जायेगा पिघल यारों।।

 

'आराम हराम हैं' का नारा लगाते हुए,

देखो, निकल पड़ा चींटियों का दल यारों।।

 

समन्दर ज़रूर पा लेती हैं वे नदियाँ,

जो एक बार पड़ती हैं निकल यारों।।

 

आओ एक बार फिर से कोशिश करते हैं,

ज़रूर होंगे हम एक दिन सफल यारों।।

 

इक्कीसवीं सदी है कुछ भी 'सौरभ',

आसानी से नहीं मिलता आजकल यारों।।

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............................ (2) .......................

ख़ुदा ने काँटा चुभाने को जब गुलाब बनाया।

दर्द कम करने को इंसानों ने शराब बनाया।।

 

रात को नींद न आये तो पी के देखते रहो,

इसी मक़सद से सितारे और माहताब बनाया।।

 

दिलजले देखें न मनहूस हँसीनाओं को,

इसी ख़ातिर किसी ने शायद ये नक़ाब बनाया।।

 

जाम है मेरा सच्चा साथी साथ छोड़ता नहीं,

वो तो कबका टूट गया जिसको ख़्वाब बनाया।।

 

सच्चे दिलवाले तो वो लोग हुआ करते हैं,

जिनको चेहरे से उपर वाले ने ख़राब बनाया।।

 

हुस्न का 'सौरभ' हर घमंड उनका टूटेगा,

मेरे मालिक ने ये बुढ़ापा भी लाजवाब बनाया।।

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............................... (3) ..................................

प्यार के दो दीवानों से, दुनिया ने दुश्मनी कर ली।

पेड़ को काटा लोगों ने, साये ने ख़ुदक़ुशी कर ली।।

 

आशिक़ों को ज़िन्दा रहने, देंगे नहीं लोग यहाँ,

सोच कर ये ही हवाले-मौत ज़िन्दगी कर ली।।

 

क़िस्मत ने बाँटा अँधेरा, न जला कोई भी चराग़,

दिलजलों ने दिल जलाकर, चाहा जब रौशनी कर ली।।

 

मन्दिर, मस्ज़िद, चर्च, गुरूद्वारे, हम गये न जायेंगे,

है मोहब्बत मेरा रब , मैंने तो बन्दगी कर ली।।

 

गर सितम सहना है तो, 'सौरभ' मुहब्बत न करो,

जग से लड़ जाओ अगर तुमने जो आशिक़ी कर ली।।

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............................... (4) ................................

भीड़ बढ़ती गई जितनी तेरे दीवानों की।

शहर में भी कमी होती गई मैखानों की।।

 

जो तेरे दर पे गया लौटा टूटा दिल लेकर,

इतनी अच्छी की खातिरदारी मेहमानों की।।

 

लूटती सबको तू बदबाद करती सबको,

तू हीं शातिर है ये नगरी है नादानों की।।

 

तुझसे दिल जो लगाये पहले मेरी बात सुनले,

पहले ही तय कराले बात वो पैमानों की।।

 

सुन ऐ शम्मा! तू इतना जो जलाएगी,

लाशों में ढककर बुझ जाएगी परवानों की।।

 

जो बिछाकर तू फँसाती है भोले पंछी,

दे दुहाई 'सौरभ' तेरे उन दानों की।।

 

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.............................. (5) ..............................

मैंने अबतक नहीं कोई गहरी बात की है।

हाल ही में लिखने की शुरूआत की है।।

 

पहले आसमान में छा तो लेने दो ज़रा,

बिना छाये किस बादल ने बरसात की है।।

 

मेहनत, क़िस्मत, हुनर, अनुभव साथ रहे होगें,

जिसने भी इस धरती पर करामात की है।।

 

गिरूँगा, फिर सम्भलूँगा, उसके बाद चलूँगा,

दौड़ने की क्रिया किसने जन्मजात की है।।

 

बीज था, पौधा हुआ, तब फिर पेड़ बना,

पीपल ने ये आकृति नहीं अकस्मात की है।।

 

उनसे प्रेरणा लेकर आगे बढ़ना है 'सौरभ',

जिसने कृति अपनी जगत-विख्यात की है।।

 
.............................. (6) ...............................
चमकने के लिए ख़ुद को मजबूर करना है।
मुझे सूरज की तरह जग में नूर करना है।।
 
मैं निखरना चाहता हूँ खरे सोने की तरह,
तपने के लिए ख़ुद को तैयार ज़रूर करना है।।
 
मेरी कमियों को हुनर बताना छोड़ दे दोस्त,
मुझे अपनी ख़ामियों को दूर करना है।।
 
परखकर सच-सच विचार दे मेरे बारे में,
मुझे झूठी वाह-वाही पर नहीं ग़ुरूर करना है।।
 
अपनी बातों को पत्थर बना के बोल दे आज,
मुझे अपने अहंकार को चकनाचूर करना है।।
 
तू जब तक दोस्त रहेगा मेरा ऐब बताएगा नहीं,
अब तुझसे दुश्मनी करने का क़सूर करना है।।
 
सच्ची तारीफ़ तो मिल ही जाएगी 'सौरभ',
अच्छे काम का प्रयास भरपूर करना है।।
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रचनाकार :- सुरेश कुमार 'सौरभ'

कार्य :- विद्यार्थी (स्नातक)

हिन्दू स्नातकोत्तर कालेज जमानियॉ, ग़ाजीपुर

पता :- जमानियॉ कस्बा, जिला ग़ाजीपुर, उत्तर प्रदेश

ई-मेल :- sureshkumarsaurabh@gmail.com

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3 blogger-facebook:

  1. बेनामी4:07 pm

    सुरेश जी बहुत अच्छी रचनाएँ है मित्र। आपकी आयु को देखते हुए मैं यही कहूँगा कि लाजवाब!

    उत्तर देंहटाएं
  2. बेनामी4:30 pm

    धन्यवाद मित्र!
    .
    Suresh

    उत्तर देंहटाएं
  3. बेनामी4:30 pm

    धन्यवाद मित्र!
    .
    Suresh

    उत्तर देंहटाएं

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