देवेन्द्र कुमार पाठक के दोहे-दोहत्थड़

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जरत-बरत है ज़िस्म-ज़ां,

जेठ ज़ुलुम बड़ जोर |

प्यासी दुपहर ख़ोजती

तृप्ति कहाँ किस छोर|1|

 

साँस-साँस ने हैँ चढ़े,

सौ-सौ पीर-पहाड़ |

साध सुहागन थी सुबह ,

हुई साँझ को राँड़ |2|

 

फटी बिँवाई पाँव-सी,

है खेतोँ की देह |

सूखे भाषण दे चले ,

जेठ माह के मेह|3|

 

रय्यत रोए रात-दिन,

रजा मौज मनाय |

बगुले मोती चुग रहे ,

बाड़ फ़सल चर जाय|4|

 

आँधी,बारिश,शीत,लू ,

प्यास,पसीना,घाम |

झेले श्रमिक न कर सके,

तय ख़ुद श्रम का दाम|5|

 

श्रम की स्याही से लिखी,

दिन-दुपहर तक़दीर |

रही श्रमिक के भाग मेँ,

तंग़ी,आँसू पीर |6|

 

बदनीयत नारे हुए ,

छद्म घोषणापत्र |

इक-दो रोटी छीन ले,

संसद का हर सत्र|7|

 

कोहरे मेँ है नज़रबंद ,

सूरज,किरन,प्रकाश |

अगुए पथविचलित हुए ,

टूटा जनविश्वास

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2 टिप्पणियाँ "देवेन्द्र कुमार पाठक के दोहे-दोहत्थड़"

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