रविवार, 27 मई 2012

गिरिजा कुलश्रेष्ठ की बाल कहानी - सूराख वाला गुब्बारा

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सूराख वाला गुब्बारा

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बात बहुत पुरानी है। तब धरती और सूरज बच्चे ही थे। वे साथ-साथ खेलते थे। साथ-साथ खाते थे। और दूसरे बच्चों की तरह झगड़ते भी थे। सूरज जितना तेज-तर्रार था धरती उतनी ही शान्त और खुशमिजाज थी। सूरज अक्सर उसका टिफिन खा जाता था और पानी की बोतल खाली कर देता था।

"जरूरत होगी तब मैं एक बोतल की चार बोतलें दूँगा।"---सूरज यह कह कर हँसते हुए धरती को समझा देता था।

सूरज और धरती की एक नानी थी --नीहारिका। एक बार नानी ने धरती को उसके जन्मदिन पर उपहार में एक सुन्दर गुब्बारा दिया।वह एक अनोखा गुब्बारा था। एकदम फुटबाल सा गोल था। और रोहू मछली के पेट की तरह चमाचम चमकता था।

"वाह ,इतना सुन्दर गुब्बारा....!" धरती खुशी से फूली न समाई।

"यह चाँदी सा चमकता है इसलिये मैं इसे चाँद कहूँगी।"

"जरूर कहना" --नानी मुस्कराई---"लेकिन ध्यान रहे कि इसमें हवा भरी रहे। क्योंकि इसके चमकने के लिये जरूरी है कि यह फूला रहे। इसमें जितनी हवा भरी होगी यह उतना ही चमकेगा। हवा न रहने पर यह बिलकुल नहीं चमकेगा।"

"अच्छा नानी माँ।"- कहती हुई धरती सूरज को अपना गुब्बारा दिखाने गई।

"इतना खूबसूरत उपहार नानी ने मुझे तो कभी नही दिया "----सूरज ने कुछ उदास होकर कहा तो धरती ने गुब्बारा सूरज को थमाते हुए कहा---"इसे तुम अपना ही समझो। और चाहो तब तक खेलो।"

"अच्छा !"--सूरज ने लपक कर गुब्बारा अपने हाथ में ले लिया।

"लेकिन ध्यान रहे कि इसमें हवा भरी रहे ,वरना इसके चमकने की उम्मीद करना बेकार होगा।"--धरती ने नानी वाले अन्दाज में कहा।

"ठीक है ,ठीक है"--सूरज लापरवाही से बोला और गुब्बारे को लहराता हुआ दूर चला गया।

कई दिनों तक जब सूरज ने धरती का चाँद गुब्बारा नहीं लौटाया तो धरती खुद सूरज के पास गई और गुब्बारे की याद दिलाई।

"अर्.रे ...बाप रे "---सूरज ने माथा पीटा। दरअसल जबसे उसे इमली की टहनियों में अटकी एक सतरंगी पतंग मिल गई थी,वह गुब्बारे को तो भूल ही गया था। धरती की बात सुनकर वह एकदम  हडबडा कर गुब्बारे को ढूँढने चल पड़ा। उसने आकाश देखा पाताल देखा।नदिया देखी ,ताल देखा। पर चाँद गुबेबारे का कोई अता-पता नहीं।

अचानक धरती की नजर बेरी की झाडियों में जुगनू की तरह टिमटिमाती कोई चीज देखी।वह धरती का प्यारा चाँद गुब्बारा ही था। हवा निकल जाने के कारण उसका यह हाल हो गया था।

"देखो , तुमने मेरे गुब्बारे का क्या कर दिया !"---धरती बुरी तरह रोने लगी तो सूरज घबराया।

"ना..ना तुम रोओ मत। मैं अभी हवा भर कर तुम्हारे गुब्बारे को पहले जैसा ही गोल और चमकीला बना दूँगा।"

यह कह कर सूरज गुब्बारे में हवा भरने लगा। जैसे-जैसे गुब्बारा फूलता जाए वैसे-वैसे  ही चमकता भी जाए। अन्त में जब पूरा फूल गया तो फुटबाल जैसा गोल हो गया और चमचमाने भी लगा। चाँदी से भी ज्यादा उजला।

"देखा !!"---सूरज ने गर्व के साथ धरती को देखा। धरती मुस्कराई और लपक कर सूरज के हाथ से अपना गुब्बारा ले लिया।

पर यह क्या ..। गुब्बारा तो फिर सिकुडने लगा। धरती रुआँसी सी हुई गुब्बारे को लेकर सूरज के पास गई--- "देखो , यह तो फिर से सिकुडने लगा।"  

"अरे, अभी तो हवा भरी थी। तुमने निकाल भी दी। खैर मैं फिर हवा भर देता हूँ "--सूरज ने कहा।

और फिर उसने गुब्बारे को फुला दिया। लेकिन कुछ ही समय बाद वह चाँद गुब्बारा छोटा होने लगा। छोटा और तिरछा। धरती फिर रुआँसी होकर सूरज के पास आई और सूरज ने फिर धीरे-धीरे हवा भर कर उसे गोल बना दिया।

तब से लगातार यही सिलसिला चला आ रहा है। मजे की बात यह कि धरती व सूरज दोनों को ही नहीं पता कि झाडियों में अटके रहने के दौरान गुब्बारे में एक सूराख हो गया है।

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गिरिजा कुलश्रेष्ठ
मोहल्ला - कोटा वाला, खारे कुएँ के पास,
ग्वालियर, मध्य प्रदेश (भारत)

3 blogger-facebook:

  1. बहुत प्यारी कहानी है गिरिजा जी.....
    एकदम नयी नवेली...................

    सादर
    अनु

    उत्तर देंहटाएं
  2. beautiful - lovely story :)

    kya kalpana hai - vaah :)

    उत्तर देंहटाएं

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