मंगलवार, 29 मई 2012

मंजरी शुक्ल की कहानी - रिहाई

manjari shukla (Custom) (2)

डॉ. मंजरी शुक्ल

उ.प्र.

बहुत बचपना था उसमें मानो ओस की बूंद शरमाकर मिटटी की सोंधी खुशबू लेने के लिए गीली धरती पर चुपके से मोती बन गिरी और आसमान में उमड़ते हुए बादल उसे देखकर पकड़ने के लिए घुमड़ता हुआ चला आये। पर इन सब बातों से बेखबर वो अपनी इक छोटी सी दुनिया में मस्त रहती जहाँ पर एक दियासलाई और उसकी एकमात्र पुरानी लालटेन वक्त के अँधेरे को दूर करने के अथक प्रयास में लगे रहते पर कभी कामयाब न हो पाते। ज्योति हाँ, यहाँ नाम तो था उसका जीवन की अंधियारों में भटकने के लिए नाम के अनुरूप और कुछ न था उसके पास।

जब पहली बार उसे देखा तो वह शायद अपनी माँ के साथ स्कूल जा रही थी , पर कहते है उसकी माँ की एक चट्टान से गिरकर मौत हो गई थीं। माँ के मरने के बाद मानो उसके सारे सपने और आकंशायें भी मरने चली गई और इस भरी दुनिया में वह अकेली रह गई। बहुत दिनों से सब देख रहे थे कि वह दिन भर उन के गोले बनाती रहती। उजली सुबह के साथ जब वह गुलाबी उन का गोला अपनी नाजुक पतली उँगलियों में लपेटती तो सामने से गुजरने वाले व्यस्त राहगीर भी एक बार रुक कर उन जादुई हाथों को मन ही मन जरूर सलाम करते और कम से कम एक स्वेटर खरीदने का अपने आप से वादा करते। पर उसे तो जैसे इस दुनिया से कोई सरोकार ही नहीं था। वह तो बस अपने आप में खोई रहती। कभी पेड़ से निकलकर जब कोई नन्ही गिलहरी उसके धागे से लिपट जाती तो बच्चों सी निश्छल मुस्कान लिए वह सावधानी से उन हटा लेती और उसे दूर तक जाते देखती।

पर दिन बीतने के साथ ही लोगों की आँखों में कौतूहल साफ नजर आने लगा। अब उन के गोले का आकार तो घटता जा रहा था पर उसके पेट का उभरा हुआ गोला साफ़ नजर आ रहा था। तमाम बातें होने लगी केवल बातें ही बातें। जैसे जुबान मुहँ में न होकर सारे शरीर ,आत्मा और ब्रह्माण्ड में लग गई हों। केवल तालू से चिपकी जबान तो एक ही की थी जो अपनी हिरनी जैसी आँखों से चुपचाप ताका करती और खामोश सर्द रात जैसी अँधेरे में गुम हो जाती। पर उसकी इस ख़ामोशी को देखकर कोई चुप न हुआ उनका बस चलता तो परिंदों से यह संदेशा दूर सदूर के देशों और प्रान्तों में भिजवा देते कि किस तरह एक कुंवारी लड़की माँ बनने जा रही हैं।

सारे पाप नगण्य हो चले थे। चोरी ,हत्या जालसाज़ी और मारपीट को चरित्र का संवैधानिक हक़ मान लिया गया था जिसे कोई भी वक्त जरूरत पड़ने पर इस्तेमाल कर सकता था। पर यह तो ऐसा अक्षम्य अपराध था जिसके लिए अगर मंदिरों में आठों प्रहर प्राथनाएं की जाती तो भी उसका एक अंश भी कम न होता। आखिर जब सब्र का प्याला टूट गया तो सब उसके घर जा पहुंचे। वह टूटी चारपाई के पास बेबस सी जमीं पर पड़ी हुई थी।

चेहरे पर एक अजीब सी मुर्दनी छाई हुई थी। आँखों के नीचे काले स्याह घेरे ऐसे लग रहे थे मानो कोई काजल पोतकर गया हो। होंठ जैसे पपड़ी हो रहे थे। इस भीड़ में तमाम लोग ऐसे भी थे जिन्होंने कभी उन सुर्ख गुलाब से रसीले होठों की कल्पना में ना जाने कितने कागज काले कर दिए थे। पर आज उन्हें यह एहसास हो रहा था कि व्यर्थ ही इतना अमूल्य समय उन्होंने यूँ ही गंवा दिया। अगर रत्ती भर भी पता होता तो कभी ऐसा बेवकूफी भरा काम न करते। मन ही मन उन्होंने भगवान से माफ़ी मांगी और अपनी आँखें दूसरी और खड़ी एक सुन्दर युवती पर गड़ा दी। कुछ औरतों को दया आई पर अपने पतियों की नजरों में पतिव्रता बनने का वो सुनहरा मौका किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहती थी इसलिए पल्लू ठीक करके वे ज्योति को बस्ती से बाहर खदेड़ने के लिए आगे बड़ी एक दबंग किस्म की महिला जो लड़कियों की दलाली का काम करती थी ,आगे बढ़ी और उसके बाल पकड़कर उसे जोर से घसीटा क्योंकि वह चिढ़ी बैठी थी कि ज्योति को फुसला नहीं पाई।

पतली दुबली लड़की तिनके की तरह घिसट गई। दर्द और वेदना आखों के कोरो से बहने लगे जैसे सारी सृष्टि को प्रलय में अपने साथ बहा ले जानेंगे। भीड़ तो यह मौका कब से तलाश रही थी। नौकरी की परेशानियां ,बॉस की गालियां,पैसो की तंगी और न जाने कितनी कुंठाओं को बाहर निकालने का एक आसान जरिया आज एक अकेली लड़की को लातों से मारकर निकालने का मौका मिला था। उसका गोरा शरीर लाते और घूसे खाकर नीला पड़ गया था। अचानक उसने रोना बंद कर दिया और ठहाका मारकर हँसने लगी और चीख मारकर बेहोश हो गई ।

भीड़ को जैसे सांप सूंघ गया। तभी कोई चिल्लाया अरे कही मर तो नहीं गई। जेल का नाम सुनते ही सबका शरीर पसीने से भीग गया। तभी भीड़ को चीरती हुईं एक औरत आगे आई और बोली अरे ,मै अपने साथ दाई को लेकर आई हूँ जरा देखे तो कितने महीने का पाप हैं। बूढी दाई की अनुभवी आँखें उसे देखकर चौंकी ,फिर उसने पास जाकर उसका हाथ अपने हाथ में लिया और पेट पर हाथ फेरने लगी। अचानक वह जोर से चिल्लाई और भागते हुए बोली -"यह माँ नहीं बनने वाली है इसके पेट मे कोई गोला हैं। " यह सुनते ही भीड़ हाड़ - मांस के लोथड़ों में तब्दील हो गई और धीरे धीरे वहां से खिसकने लगी।

रह गई ज्योति और पुरानी लालटेन जिसकी रौशनी मे बूढ़ा कमरा अपनी गरीबी के साथ जार-जार रो रहा था।

manjarishukla28@gmail.com

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