बुधवार, 9 मई 2012

अमरीक सिंह कंडा की दो लघुकथाएं - बेईमानी-ईमानदारी तथा पेट्रोल

बेईमानी-ईमानदारी

ईमानदारी ने कहा, ‘‘यदि किसी ने अमीर होना हो तो मुझे अपना ले। मैं कुछ ही वर्षों में उसे अमीर कर दूंगी। उसे किसी किस्म की कोई तकलीफ नहीं रहेगी।’’ बेईमानी ने हंस कर कहा, ‘‘अब तुम्हारा जमाना नहीं रहा, अब लोगों के पास समय नहीं है और न ही वे तेरा इंतजार करते हैं। तुम वर्षों की बात करती हो, अब तो मिनटों, सैकेंडों वाला जमाना आ गया है। अब लोगों ने तरक्की कर ली है। लोग अब अनपढ़ गंवार नहीं रहे। अब इन्हें समझ आ गई है कि कैसे अमीर बनना है, कैसे किसी के साथ धोखा, ठगी करनी है, चोरी, डाका डालना है।’’ अब ईमानदारी बैठी सोच रही थी कि पहले की तरह जंगली मनुष्य ही ठीक था। वह भगवान से प्रार्थना कर रही थी कि दुनिया को खत्म कर दे और एक बार फिर पहले जैसा बसा दे।

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पेट्रोल

‘‘टंकी फुल कर दो’’ सरकारी जिप्सी को मोड़ कर पंप पर लाते हुए डी.सी. के ड्राइवर ने कहा।

टंकी फुल होने पर टंकी ने पैट्रोल से पूछा, ‘‘भाई, क्या हाल है?’’

‘‘बहन, हाल क्या पूछ रही हो? मुझे तो हर कोई सरकारी मुलाजिम वेश्या की तरह बेच देता है। मुझ से कमाए पैसों को कई हिस्सों में बांटा जाता है जैसे चार आदमी मिलकर एक औरत से बलात्कार करते हैं। मेरा तो बहुत बुरा हाल है। तुम सुनाओ, तुम कैसी हो?’’

‘‘मेरा हाल भी तुम जैसा ही है। सुबह उठते ही डी.सी. कह देता है कि टंकी फुल करवा लाओ। पेट्रोल खुद निकाल लेते हैं और नाम मेरा लगा देते हैं। कह देते हैं कि सर, टंकी लीक हो गई थी या फिर कह देते हैं कि इंजन में कोई फाल्ट है या एवरेज बहुत कम है। कई बार तो यह पेट्रोल पंप वाले को ही कह देते हैं कि कागजों में टंकी फुल कर दो।’’

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