शुक्रवार, 11 मई 2012

शशांक मिश्र भारती की तीन कविताएं

 

असमंजस

शशांक मिश्र भारती

समुद्र से उठा

मनोंभावों का ज्‍वार

जलने लगा हृदय

आस-पास के वातावरण को देखकर

शक्‍ति क्षीण हो गई

अकस्‍मात हृदय में-

भावों की क्रान्‍ति हो गई,

विचार किया कि -

सामना किया जाए

प्रतिकूल परिवेश से

और-

उसे अनुकूल बनाया जाए

अनुकूल बनाने के लिए

संघर्ष की वीणा उठा ली

निरन्‍तर प्रयत्‍न किया

जटिलताओं से जूझा

मानसिक व्‍यथाओं को सहा

तब-

आ सका हूं इस मंजिल पर

लेकिन-

देखकर आगे का पथ

उलझ जाता हूं मैं-

असमंजस में।

 

अभाव

मैं-

चाहता हूं छोड़ दूं

सतत्‌ कठिनाईयों से पूर्ण पथ,

किन्‍तु

समक्ष आ जाता है वह प्रेम

जिसके कारण

मैं विरोधी रहा हूं,

उन भाषाओं और भाषाविदों का

विकास में बाधक रहे हैं-

जो देवनागरी के,

किन्‍तु-

मैं कुछ कर नहीं कर पाया हूं

देवनागरी के विकास में,

जिसका कारण

मेरे मन में व्‍याप्‍त व्‍यथाएं

और-

उचित मार्गदर्शन का अभाव।

 

प्रतिबिम्‍ब

आज-

जब से उठा हूं देख रहा हूं

उस प्रतिबिम्‍ब को

जो मेरे सामने फैला है,

समक्ष आ जाता है

लुप्‍त हो जाता है

दूर आते ही-

फिर चमक जाता है

सोचता हूं-

जिसने-

अर्द्धविक्षिप्‍त सा

बना दिया है मुझे

जिसका रहस्‍य

रहस्‍य ही रह गया

आखिर क्‍या है वह प्रतिबिम्‍ब।

 

सम्‍पर्कः-हिन्‍दी सदन बड़ागांव

शाहजहांपुर-2424010प्र0

09410985048

ईमेल:-shashank.misra73@rediffmail.com

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