मंगलवार, 8 मई 2012

एस. के. पाण्डेय की लघुकथा - करमजली

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करमजली

लाजो कुछ सोच नहीं पा रही थी कि अब क्या करे ? घर कैसे पँहुचे ? उसे बस रोना आ रहा था। वैसे तो वह लगभग चौदह-पन्द्रह साल की थी। लेकिन ग्रामीण अंचल की होने से ज्यादा जागरूक नहीं थी। इधर-उधर जाने का मौका बहुत कम मिला था। शहर तो एक दो बार ही देखा था। वो भी कभी अकेले नहीं। साथ में कोई न कोई और होता था। लेकिन आज वह बिल्कुल अकेली थी। अपने घर से कई सौ किलोमीटर दूर।

दरअसल वह मेले में विछुड गई थी। उसे बिचलित और रुआंसी देखकर कुछ युवक उसे उसकी माँ से मिलाने का आश्वासन देकर मेले से निकालकर लिए जा रहे थे। शायद वे लोग टैक्सी लेने वाले थे। इतने में लाजो को अचानक पता नहीं क्या हो गया कि जैसे उसने मुझे देखा, भैया कहकर फफक उठी। उसने जानकर ऐसा कहा अथवा अनजाने में ही ऐसा मुँह से निकल गया। कहना मुश्किल है। खैर उन लोगों को लगा कि इसका कोई भाई मिल गया है तो वे सबके सब बिना कुछ कहे तुरंत भीड़ का हिस्सा हो गए।

न मैं उसे जानता था और न ही वह मुझे। यह मात्र सयोंग अथवा दैव योग ही था। मैंने उसे चुपकराया। पूछा कि क्या बात है। उसने सारी बात बताई। वह डरी-सहमी सी थी। बात-बात में रोती रहती थी। मैंने अनुभव किया कि भगवान द्वारा मुझे यह दायित्व सौंपा गया है। इसे सकुशल इसके घर पहुँचाना होगा। रात के लगभग आठ बजने वाले थे। ऐसे में उसे मेले में भूले-बिसरे शिविर में ले जाने अथवा पुलिस के हवाले करना मुझे उचित नहीं लगा। कई प्रश्न उठ रहे थे। इससे मैं ऐसा नहीं कर सका।

उसे समझा-बुझाकर मैं अपने घर ले आया। उसके पास कोई दूसरा रास्ता भी नहीं था। अतः वह चली आई। उसने खाना नहीं खाया। वैसे ही लेटी रही। सुबह होते ही हम दोनों उसके बताए पते पर चल दिए । ट्रेन से छ: घंटे का सफर था। उसके बाद बस से गाँव जाना था। एक घंटा और लगा। कुछ पैदल चलकर उसके घर पहुँच गए।

घर पँहुचते ही वह एक बार फिर फफक कर रो उठी। और बोली कि अगर आप न मिलते तो शायद मैं भटकती रहती और मेरी भटकन समाप्त न होती। इतने में उसकी सौतेली माँ निकली जो अभी कुछ घंटे पहले घर पँहुची थी। और गाँव वालों के सामने छाती पीट-पीटकर रो रही थी, जैसा कि गाँव में आते समय एक आदमी बोला था कि लाजो बिटिया कहाँ रह गई थी। तेरी माँ तो रो-रो मरी जा रही है। उसे देखकर खुश होने के बजाय उसकी सौतेली माँ उसी पर बिफर उठी। और बोली अरे करमजली ! तूँ मेरी नाक कटवाकर वापस आ गई। इससे अच्छा होता कहीं मर-खप गई होती।

मैंने वहाँ रुकना या कुछ कहना मुनासिब नहीं समझा और यह सोचते हुए तुरंत लौट पड़ा कि जिस लड़की के सगे माँ और बाप दोनों में से कोई नहीं हों तो वह करमजली नहीं तो और क्या कहलाएगी ?

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डॉ. एस के पाण्डेय,

समशापुर (उ. प्र. )।

http://www.sriramprabhukripa.blogspot.in/

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3 blogger-facebook:

  1. duniya me aisi bahut saari karamjaliyan hain jinme kuchh apne aas-paas bhi nazar aati hain.

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  2. सच ही तो है एक कड़वा सच जिसके इस दुनिया में माता-पिता नहीं उसे इसके अलावा और कोई नाम शायद नहीं दिया जा सकता।

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  3. सूचनाः

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