रचनाकार में खोजें...

रचनाकार.ऑर्ग की विशाल लाइब्रेरी में मनपसंद रचनाएँ खोजें -
 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें.

राकेश भ्रमर की कहानी - सूना आसमान

SHARE:

ज ब वह छोटी थी तो मेरे साथ खेलती थी. वह मेरे पड़ोस में रहती थी और अक्सर अपनी मां के साथ मेरे घर आती रहती थी. मेरी मां मोहल्ले की उन गिनी-चु...

image

ब वह छोटी थी तो मेरे साथ खेलती थी. वह मेरे पड़ोस में रहती थी और अक्सर अपनी मां के साथ मेरे घर आती रहती थी. मेरी मां मोहल्ले की उन गिनी-चुनी औरतों में से थी जो सहृदय थीं और सबसे हंसकर बोलती थीं, सबके सुख-दुख में काम आती थीं और यही कारण था कि मोहल्ले की औरतें अक्सर मेरे घर पर किसी न किसी प्रकार की मदद या मां से सलाह लेने के लिए आया करती थीं. मोहल्ले में मेरे परिवार को सम्मान की निगाह से देखा जाता था, क्योंकि हम लोग मध्यमवर्गीय बस्ती में बाकी घरों से ज्यादा संपन्न लोगों में से गिने जाते थे. मेरे पिता एक सरकारी दफ्तर में गजटेड अफसर थे और हम भाई-बहन अच्छे स्कूल में पढ़ रहे थे.

मुझे पता नहीं अमिता के पिता क्या काम करते थे, परन्तु उसकी मां एक घरेलू महिला थीं और मेरी मां के पास लगभग रोज ही आकर बैठती थीं और दोनों महिलाएं आंगन में बैठकर सुख-दुख की बातें किया करती थीं. मैं घर में सबसे छोटा था. मुझसे बड़ी दो बहनें थीं, जो अब इतनी बड़ी हो गयी थीं कि मेरे साथ खेलने में उन्हें संकोच होता था. वह अपनी किताबों की दुनिया में व्यस्त रहती थीं. मां मुझे बाहर खेलने जाने से मना करती थीं, क्योंकि हमारे घर के सामने मुख्य सड़क थी और उसमें गाडि़यों का आवागमन बहुत अधिक होता था. ऐसी स्थिति में जब अमिता अपनी मां के साथ मेरे घर पर आती थी तो मेरा मन खुशियों से भर जाता था और जब दोनों महिलाएं बातों में मशगूल होती थीं तो हम दोनों छोटे बच्चे आंगन में धमा-चैकड़ी मचाते रहते थे. जब मां की मीठी झिड़की मिलती थी कि हम दोनों बहुत ज्यादा शोर-शराबा कर रहे होते थे, तो उनकी झिड़की से सहमकर चुपचाप गुड्डे-गुडि़या के खेल में लग जाते थे.

धीरे-धीरे परिस्थितियां बदलने लगीं. मेरे पापा ने मुझे शहर के एक बहुत अच्छे पब्लिक स्कूल में डाल दिया और मैं स्कूल जाने लगा. उधर अमिता भी अपने परिवार की हैसियत के मुताबिक स्कूल में जाने लगी थी. हम लोग एक नियमित दिनचर्या में बंध गए. रोज स्कूल जाना, स्कूल से आना और फिर होमवर्क में जुट जाना. मम्मी भी मेरे साथ व्यस्त रहने लगीं. ऐसे में मैं न बाहर जा पाता, न अमिता मेरे घर आ पाती. हां इतवार को वह अपनी मां के साथ नियमित रूप से मेरे घर आती, तब हम दोनों सारा दिन खेलते और मस्ती करते.

बड़े होने पर मेरी अपनी व्यस्तताएं हो गयीं और अमिता की अपनी. अब मैं घर से बाहर ज्यादा समय रहने लगा था. इसमें मम्मी-पापा को भी कोई एतराज नहीं होता था. हाई स्कूल के बाद जीवन पूरी तरह से बदल गया. कालेज में मेरे नए दोस्त बन गए, उनमें लड़कियां भी थीं. हम कालेज की पढ़ाई, धमा-चैकड़ी और मौज-मस्ती में इस कदर व्यस्त हो गए कि अमिता मेरे जीवन से एक तरह से निकल ही गई. हालांकि वह मेरे घर में कभी-कभार दिख जाती थी, परन्तु मैं अपने कैशोर्य जीवन की रंगीनियों में इतना अधिक व्यस्त था कि घर में आने के बावजूद मैं उसकी तरफ ध्यान न देता, और हाय-हैलो करके अपने कमरे में घुस जाता. फिर किसी दोस्त के साथ मोबाइल पर चिपक जाता. जाहिर है, मोबाइल पर ज्यादातर लड़कियों से ही बातें होती थीं.

बाहर से आने पर जब मैं अमिता को अपनी मां के पास बैठा हुआ देखता तो बस एक बार मुसकराकर उसे देख लेता. वह हाथ जोड़कर नमस्ते करती, तो मुझे वह किसी पौराणिक कथा की देवी सी लगती. कालेज में जिस तरह की जिन्दगी से मेरे जैसे युवा रूबरू हो रहे थे, उसमें रंग-बिरंगी तितलियों का खूबसूरत संसार था. इसके चटकीले और भड़कीले रंग हमें लुभाते थे, और तितलियों के साथ उड़ना हमें अच्छा लगता था. इस युग में अमिता जैसी सलवार कमीज में ढंकी-छुपी लड़कियों की तरफ किसी का ध्यान ही नहीं जाता था. अमिता खूबसूरत थी, परन्तु उसकी खूबसूरती के प्रति श्रद्धा भाव जागृत होते थे, न कि उसके साथ चुहलबाजी और मौज-मस्ती करने का मन होता था.

मैं उसके प्रति उदासीन था, परन्तु वह जब भी मुझे देखती तो शरमाकर अपना मुंह घुमा लेती और कनखियों से चुपके-चुपके मुस्कराते हुए मुझे देखती. वह मां से बातों में लगी रहती और मैं अपने खयालों में गुम अपने काम में.

दिन इसी तरह बीत रहे थे.

इण्टर के बाद मैंने नोएडा के एक कालेज में बी.टेक में एडमीशन ले लिया. जिन्दगी और ज्यादा व्यस्त हो गयी. अब केवल लंबी छुट्टियों में ही घर जाना हो पाता था. सबसे लंबी छुट्टियां गर्मियों में होती थीं. इसमें भी कभी-कभार किसी रिश्तेदार के यहां चले जाते थे. जब हम घर पर होते थे, तब अमिता कभी-कभी हमारे यहां आती थी और दूर से ही शरमाकर नमस्ते कर लेती थी, परन्तु उसके साथ बातचीत करने का कोई मौका नहीं मिलता था. उससे कोई बात करने का मेरे पास कारण भी नहीं था. ज्यादा से ज्यादा, ‘कैसी हो, क्या कर रही हो आजकल?’ पूछ लेता. बस इसी तरह की औपचारिक बातें होती थीं, जिनके माध्यम से पता चला कि वह किसी कालेज से बी.ए. कर रही थी. बी.ए. करने के बावजूद भी वह अभी तक सलवार कमीज में लिपटी हुई एक खूबसूरत गुडि़या की तरह लगती थी. परन्तु मुझे तो जीन्स टाप में कसे बदन और दिलकश उभारों वाली लड़कियां पसन्द थीं. अमिता में मुझे आकर्षित करने वाली कोई चीज दिखाई नहीं देती थी... उसकी तमाम खूबसूरती के बावजूद, क्योंकि संस्कारों और शालीन चरित्र से वह मुझे एक प्राचीन काल की देवी जैसी लड़की लगती थी. ऐसी लड़कियों को आजकल कौन लड़का पूछता है?

गर्मी की एक उमसभरी दोपहर थी. बाहर सूरज आग उगल रहा था तो हवाएं बदन को सुलझाए दे रही थीं. सूरज की तपिश लोगों को पसीना बहाने पर मजबूर कर रही थीं. लू और सूरज की तपिश ने लोगों को घरों के अन्दर दुबकने पर मजबूर कर दिया था. मजबूरी में ही लोग बाहर निकलते थे.

मैं अपने कमरे में एसी की ठंडी हवा लेता हुआ एक उपन्यास पढ़ने में व्यस्त था, तभी दरवाजे पर एक हल्की थाप पड़ी. मैं चैंक गया और लेटे-लेटे ही पूछा- ‘‘कौन?’’

‘‘क्या मैं अन्दर आ सकती हूं?’’ एक मीठी आवाज कानों में पड़ी. मैं पहचान गया, संभवतः अमिता की आवाज थी. मैंने बिस्तर से उठते हुए कहा- ‘‘आ जाओ, दरवाजे की सिटकनी नहीं लगी है.’’

दरवाजा धीरे-धीरे खुला और मेरे सामने अमिता खड़ी थी. मेरे मुंह से अनायास निकला- ‘‘तुम!’’

‘‘हां!’’ उसका सिर झुका हुआ था, किन्तु आंखें उठाकर उसने एक बार मेरी तरफ देखा. उसकी आंखों में एक अनोखी कशिश थी, जैसे वह सामने वाले को अपनी तरफ खींच रही थीं. उसका चेहरा भी दमक रहा था. मैंने गौर से उसे देखा, तो वह बहुत ही खूबसूरत लगी. उसके चेहरे के नक्श बहुत ही सुन्दर थे. मैं एक पल के लिए अचंभित रह गया और मेरे हृदय में एक कसक सी आते आते रह गयी.

‘‘तुम... अचानक... इतनी दोपहर को...? कोई काम है?’’ मैं उसके सौन्दर्य से अभिभूत होता हुआ धम् से बिस्तर पर बैठ गया. पहली बार वह मुझे इतनी सुन्दर और आकर्षक लगी थी. मैंने जवान होने के बाद कभी उसे इतना नजदीक और गौर से नहीं देखा था.

वह शरमाती-सकुचाती सी थोड़ा आगे बढ़ी और अपने हाथों को आगे बढ़ाती हुई बोली- ‘‘प्रसाद लीजिए.’’

‘‘प्रसाद!’’

‘‘हां, वैष्णों माता का प्रसाद है. पिछली नवरात्र को हम लोग वैष्णों देवी गए थे.’’ उसने सिर झुकाए हुए ही कहा.

‘‘अच्छा, धन्यवाद!’’ मैंने उसके हाथों से प्रसाद की पुडि़या ले ली और अपने माथे से लगा लिया. फिर बोला- ‘‘मम्मी को दे दिया होता.’’

‘‘उनको दे दिया है. यह आपके लिए है, अलग से...’’ उसने आंखों में मुस्कराते हुए कहा.

मैं हैरान रह गया. फिर भी उससे कुछ नहीं पूछा. पूछने से बातों का सिलसिला आगे बढ़ता. मैं उस वक्त कमरे में अकेला था और एक जवान लड़की मेरे साथ थी. कोई देखता तो क्या समझता. मेरा ध्यान भी उपन्यास में लगा हुआ था. कहानी एक रोचक मोड़ पर पहुंच चुकी थी. ऐसे में अमिता ने आकर अनावश्यक व्यवधान पैदा कर दिया था. अतः मैं चाहता था कि वह जल्दी से जल्दी मेरे कमरे से चली जाए. परन्तु वह खड़ी ही रही. मैंने प्रश्नवाचक भाव से उसे देखा.

‘‘क्या मैं बैठ सकती हूं?’’ उसने एक कुर्सी की तरफ इशारा करते हुए कहा.

‘‘आं...’’ मेरी हैरानी बढ़ती जा रही थी. मेरे दिल में धुकधुकी पैदा हो गयी. क्या अमिता किसी खास मकसद से मेरे कमरे में आई थी? उसकी आंखें याचक की भांति मेरी आंखों से टकरा गयीं और मैं द्रवित हो उठा. पता नहीं, उसकी आंखों में क्या था कि सारे डर के बावजूद मैंने उससे कह दिया- ‘‘हां, हां, बैठो.’’ मेरी आवाज में अजीब सी बेचैनी थी.

कुर्सी पर बैठते हुए उसने पूछा- ‘‘क्या आपको डर लग रहा है?’’

‘‘नहीं तो...’’ मैंने हंसने का प्रयास किया. परन्तु मेरा दिल धड़कता ही रहा. मैं स्वयं को संभालने का प्रयास कर रहा था और समझ नहीं पा रहा था कि जिस लड़की के साथ मैं बचपन से खेलता आ रहा हूं, आज जवान होने पर उसके पास आने पर मेरा दिल अनायास अप्रत्याशित ढंग से क्यों धड़क रहा था. मेरे साथ ऐसा क्यों हो रहा था?

‘‘लगता तो है कि आप थोड़ा नर्वश हैं.’’ वह मुसकरायी. उसकी मुस्कराहट प्यारी होते हुए भी मुझे प्यारी नहीं लगी.

‘‘नहीं, क्या तुम डर रही हो?’’ मैंने अपने को काबू में करते हुए कहा.

‘‘मैं क्यों डरूंगी? आपसे क्या डरना...?’’ उसने आत्मवि’वास से कहा.

‘‘डरने की बात नहीं है? चारों तरफ सन्नाटा है. दूर-दूर तक किसी की आवाज सुनाई नहीं पड़ रही. भरी दोपहर में लोग अपने-अपने घरों में बंद हैं. ऐसे में एक सूने कमरे में एक जवान लड़की किसी लड़के के साथ अकेली हो तो क्या उसे डर नहीं लगेगा.’’

वह हंसते हुए बोली- ‘‘इसमें डरने की क्या बात है? मैं आपको अच्छी तरह जानती हूं. आप भी तो कालेज में लड़कियों के साथ उठते बैठते हो, उनके साथ घूमते-फिरते हो. रेस्तरां और पार्क में जाते हो, तो क्या वह लड़कियां आपसे डरती हैं?’’

मैं अमिता के इस रहस्योद्घाटन पर हैरान रह गया. कितनी साफगोई से वह यह बात कह रही थी. मैंने पूछा- ‘‘तुम्हें कैसे मालूम कि हम लोग लड़कियों के साथ घूमते-फिरते हैं और मौज-मस्ती करते हैं?’’

‘‘अब मैं इतनी भोली भी नहीं हूं. मैं भी कालेज में पढ़ती हूं. क्या मुझे नहीं पता कि किस प्रकार लड़के-लड़कियां एक दूसरे के साथ घूमते हैं और आपस में किस प्रकार का व्यवहार करते हैं?’’

‘‘परन्तु वह लड़कियां हमारी दोस्त होती हैं. और तुम...’’ मैं अचानक चुप हो गया. कहीं अमिता को बुरा न लग जाए.

मेरी बात सुनकर अमिता का मुंह पीला पड़ गया. उसने सूनी नजरों से मुझे देखा और सिर नीचा कर लिया. मुझे बहुत अफसोस हुआ कि मैंने इस तरह की बात कही. आखिर अमिता मेरे लिए अनजान नहीं थी. बचपन से हम एक दूसरे को जानते हैं. जवानी में भले ही आत्मीयता या निकटता न रही हो, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह मुझसे मिल नहीं सकती थी.

अमिता को शायद मेरी बात बुरी लगी थी या उसके दिल को खटक गयी थी. वह झटके से उठती हुई बोली- ‘‘अब मैं चलूंगी, वरना मां चिन्तित होंगी.’’ उसकी आवाज भीगी सी लगी. उसने दुपट्टा अपने मुंह में लगा लिया और तेजी से कमरे के बाहर भाग गई. वह अव’य ही रो रही थी. मैंने अपने गाल पर एक चपत लगाई और स्वयं से कहा- ‘मूर्ख, तुझे इतना भी नहीं पता कि लड़कियों से किस तरह पेश आना चाहिए. वह फूल की तरह कोमल होती हैं. कोई भी कठिन बात बरदा’त नहीं कर सकतीं.’

फिर मैंने झटककर अपने मन से यह बात निकाल दी, ‘हुंह, मुझे अमिता से क्या लेना-देना? बुरा मानती है तो मान जाए. मुझे कौन उसके साथ रि’ता जोड़ना है. न वह मेरी पे्रमिका है, न दोस्त.’

अमिता के जाने के बाद मैं फिर उपन्यास पढ़ने में व्यस्त हो गया. कुछ देर बाद नींद आ गयी. छः बजे सोकर उठा, तो नीचे जाकर मम्मी के पास थोड़ी देर बैठकर बातें करता रहा. पापा भी वहां मौजूद थे. उन दिनों घर में बड़ी बहन की शादी की बातें चल रही थीं. वह बी.ए. करने के बाद एक आफिस में स्टेनो हो गई थी. दूसरी बहन बीए करने के बाद प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रही थी और वह सिविल सर्विसेज में जाने की इच्छुक थी. एक कोचिंग क्लास भी ज्वाइन कर रखी थी. सबके साथ शाम की चाय पीने तक मैं अमिता के बारे में बिलकुल भूल चुका था. चाय पीने के बाद मैंने अपनी मोटर साइकिल उठाई और यार-दोस्तों से मिलने के लिए निकल पड़ा.

मैं दोस्तों के साथ एक रेस्तरां में बैठकर लस्सी का मजा ले रहा था कि तभी मेरे मोबाइल पर निधि का फोन आया. वह मेरे साथ इण्टरमीडिएट में पढ़ती थी और हम दोनों में अच्छी जान-पहचान ही नहीं आत्मीयता भी थी. मेरे दोस्तों का कहना था कि वह मुझ पर मरती थी, परन्तु मैं इस बात को हंसी में उड़ा देता था. वह हमारी गंभीर पे्रम करने की उमर नहीं थी, और मैं इस तरह का कोई खतरा मोल नहीं लेना चाहता था. मेरे मम्मी-पापा की मुझसे कुछ अपेक्षाएं थीं और जिन्दगी में वह मुझे एक अच्छे मकाम पर खड़ा देखना चाहते थे. पे्रम में पड़कर मैं उनकी भावनाओं और अपेक्षाओं का खून नहीं कर सकता था. अतः निधि के साथ मेरा परिचय दोस्ती तक ही कायम रहा. उसने कभी अपने पे्रम का इजहार नहीं किया और न मैंने ही इसे गंभीरता से लिया.

इण्टर के बाद मैं नोएडा चला गया, तो वह भी मेरे नक्’ोकदम पर चलती हुई गाजियाबाद के एक प्रतिस्ठान में बीसीए करने के लिए भर्ती हो गई. उसने एक दिन मिलने पर कहा था, ‘‘मैं तुम्हारा पीछा नहीं छोड़ने वाली.’’

‘‘अच्छा, कहां तक?’’ मैंने हंसते हुए कहा था.

‘‘जहां तक तुम मेरा साथ दोगे.’’

‘‘अगर मैं तुम्हारा साथ अभी छोड़ दूं?’’

‘‘नहीं छोड़ पाओगे. तीन साल तो हम आस-पास ही हैं. न चाहते हुए भी मैं तुमसे मिलने आऊंगी और तुम मना नहीं कर पाओगे. यहां से जाने के बाद क्या होगा, न तुम जानते हो, न मैं. मैं तो बस इतना जानती हूं, अगर तुम मेरा साथ दोगे, तो हम जीवन भर साथ रह सकते हैं.’’

मैं बात को और ज्यादा गंभीर नहीं करना चाहता था. बी.टेक का वह मेरा पहला ही साल था. वह भी बी.सी.ए. के पहले साल में थी. प्रेम करने के लिए हम स्वतंत्र थे. हम उस उमर से भी गुजर रहे थे, जब मन विपरीत सेक्स के प्रति दौड़ने लगता था और हम न चाहते हुए भी किसी न किसी के प्यार में गिरफ्तार हो जाते हैं. हम दोनों एक दूसरे को पसंद करते थे. वह मुझे अच्छी लगती थी, उसका साथ अच्छा लगता था. वह नए जमाने के अनुसार कपड़े भी पहनती थी. उसकी शारीरिक गठन आकर्षक थी, उसके शरीर का प्रत्येक अंग थिरकता सा लगता. वह ऐसी लड़की थी, जिसका प्यार पाने के लिए कोई भी लड़का कुछ भी उत्सर्ग कर सकता था, परन्तु मैं अभी प्रेम के मामले में गंभीर नहीं था, अतः बात आई गई हो गयी. परन्तु हम दोनों अक्सर ही महीने में एकाध बार मिलते थे और दिल्ली जाकर किसी रेस्तरां में बैठकर चाय-नाश्ता करते थे, सिनेमा देखते थे और पार्क में बैठकर अपने मन को हल्का करते थे.

तब से अब तक दो साल बीत चुके थे. अगले साल हम दोनों के ही डिग्री कोर्स समाप्त हो जाएंगे, फिर हमें जाब की तलाश करनी होगी. अगर मैं भाग्यशाली रहा तो कैम्पस से ही सेलेक्शान हो जाएगा, निधि के साथ भी यहीं बात थी. हमारा जाब हमें कहां ले जाएगा, हमें पता नहीं था.

मैंने फोन आन करके करके कहा, ‘‘हां, निधि, बोलो.’’

‘‘क्या बोलूं, तुमसे मिलने का मन कर रहा है. तुम तो कभी फोन करोगे नहीं कि मेरा हाल-चाल पूछ लो. मैं ही तुम्हारे पीछे पड़ी रहती हूं. क्या कर रहे हो?’’ उधर से निधि ने जैसे शिकायत करते हुए कहा. उसकी आवाज में बेबसी थी और मुझसे मिलने की उत्कण्ठा... लगता था, वह मेरे प्रति गंभीर होती जा रही थी.

मैंने सहजता से कहा, ‘‘बस दोस्तों के साथ गप्पें लड़ा रहा हूं.’’

‘‘क्या बेवजह समय बरबाद करते फिरते हो.’’

‘‘तो तुम्हीं बताओ, क्या करूं?’’

‘‘मैं तुमसे मिलने आ रही हूं, कहां मिलोगे?’’

मैं दोस्तों के साथ था. थोड़ा असहज होकर बोला, ‘‘मेरे दोस्त साथ हैं. क्या बाद में नहीं मिल सकते?’’

‘‘नहीं, मैं अभी मिलना चाहती हूं. उनसे कोई बहाना बनाकर खिसक आओ. मैं अभी निकलती हूं. रामलीला मैदान के पास आकर मिलो.’’ वह जिद् पर अड़ी हुई थी.

दोस्त मुझे फोन पर बातें करते देखकर मुस्करा रहे थे. वह सब समझ रहे थे. मैंने उनसे माफी मांगी, तो उन्होंने उलाहना दिया कि पे्रमिका के लिए दोस्तों को छोड़ रहा हूं. मैं खिसियानी हंसी हंसा, ‘‘नहीं यार, ऐसी कोई बात नहीं हैं.’’

‘‘हां, हां, सही कह रहा है. प्रेमिका नहीं, यह तो अपनी मां से मिलने जा रहा है.’’ एक दोस्त ने व्यंग्य किया.

मैं उन्हें कोई जवाब दिए बिना चला आया. रामलीला मैदान पहुंचने के दस मिनट बाद निधि वहां पहुंची. वह रिक्शे से आई थी. मैंने उपेक्षित भाव से कहा, ‘‘ऐसी क्या बात थी कि आज ही मिलना जरूरी था. दोस्त मेरा मजाक उड़ा रहे थे.’’

उसने मेरा हाथ पकड़ते हुए कहा, ‘‘सारी, अनुज, परन्तु मैं अपने मन को काबू में नहीं रख सकी. आज पता नहीं दिल क्यों कुछ बेचैन सा था. तुम्हारी सुबह से ही बहुत याद आ रही थी. दोपहर बाद तो लगा, मैं पागल हो जाऊंगी, अगर तुमसे नहीं मिली.’’

‘‘अच्छा, लगता है, तुम मेरे बारे में कुछ अधिक ही सोचने लगी हो.’’

हम दोनों मोटर साइकिल के पास ही खड़े थे. उसने सिर नीचा करते हुए कहा, ‘‘शायद! यही सच है. परन्तु अपने मन की बात मैं ही समझ सकती हूं. अब तो पढ़ने में भी मेरा मन नहीं लगता, बस हर समय तुम्हारे ही खयाल मन में घुमड़ते रहते हैं.’’

मैं सोच में पड़ गया. यह लक्षण अच्छे नहीं थे. मेरी उसके साथ दोस्ती थी, परन्तु उसको प्यार करने और उसके साथ शादी करके घर बसाने के बारे में कभी सोचा नहीं था.

‘‘निधि, यह गलत है. अभी हमें पढ़ाई समाप्त करके अपने भविष्य के बारे में सोचना है. तुम अपने मन को काबू में रखो.’’ मैंने उसे समझाने की कोशिश की, परन्तु मैं भी जानता था, प्यार के मामले में मन और दिल किसी के काबू में नहीं रहते.

‘‘मैं अपने मन को काबू में नहीं रख सकती. यह बेतहाशा तुम्हारी तरफ भागता है. अब सब कुछ तुम्हारे हाथ में है. मैं सच कहती हूं, मैं तुम्हें प्यार करने लगी हूं.’’

मैं चुप रहा. उसने उदास पपीहे की तरह मेरी तरफ देखा. मैंने नजरें चुरा लीं. वह तड़प उठी, ‘‘तुम मुझे छोड़ तो नहीं दोगे?’’

मैं हड़बड़ा गया. मोटर साइकिल स्टार्ट करते हुए कहा, ‘‘चलो, पीछे बैठो.’’ वह चुपचाप पीछे बैठ गई. मैंने सर्राटे से गाड़ी आगे बढ़ाई. मेरे मन में सनसनी सी चल रही थी. मैं समझ नहीं पा रहा था कि ऐसे मौके पर कैसे रिएक्ट करूं? निधि ने बड़े ही आराम से बीच सड़क पर अपने प्यार का इजहार कर दिया था. न उसने वसंत का इंतजार किया, न फूलों के खिलने का और न चांदनी रात का... न उसने मेरे हाथों में अपना हाथ डाला, न चांद की तरफ इशारा किया और न शरमाकर अपने सिर को मेरे कंधे पर रखा. बड़ी आसानी से उसने अपने प्यार का इजहार कर दिया था. मुझे बड़ा अजीब सा लगा कि यह कैसा प्यार था, जिसमें प्रेमी के दिल में प्रेमिका के लिए कोई प्यार का संगीत नहीं बजा था.

पार्क के एक कोने में बैठकर मैंने बिना उसकी ओर देखे कहा, ‘‘प्यार तो हम कर सकते हैं, पर इसका अंत क्या होगा?’’ मेरी आवाज से ऐसा लग रहा था, जैसे मैं उसके साथ कोई समझौता करने जा रहा था.

‘‘प्यार के परिणाम के बारे में सोचकर प्यार नहीं किया जाता. तुम मुझे अच्छे लगते हो, तुम्हारे बारे में सोचते हुए मेरा दिल धड़कने लगता है, तुम्हारी आवाज मेरे कानों में मधुर संगीत सी घोलती है, तुमसे मिलने के लिए मेरा मन बेचैन रहता है. बस... मैं समझती हूं, यहीं प्यार है.’’ उसने अपना दायां हाथ मेरे कंधे पर रख दिया और बाएं हाथ से मेरा सीना सहलाने लगी.

मैं सिकुड़ता हुआ बोला, ‘‘हां, प्यार तो यही है, परन्तु मैं अभी इस मामले में गंभीर नहीं हूं.’’

‘‘कोई बात नहीं, जब रोज-रोज मुझसे मिलोगे, तो एक दिन तुमको भी मुझसे प्यार हो जाएगा. मैं जानती हूं, तुम मुझे नापसंद नहीं करते.’’ वह मेरे साथ जबरदस्ती कर रही थी.

क्या पता, शायद एक दिन मुझे भी निधि से प्यार हो जाए. निधि को अपने ऊपर विश्वास था, परन्तु मुझे अपने ऊपर नहीं... फिर भी समय बलवान होता है. एक-दो साल में क्या होगा, कौन कह सकता है?

इसी तरह एक साल बीत गया. निधि से हर सप्ताह मुलाकात होती. उसके प्यार की शिद्दत से मैं भी पिघलने लगा था और दोनों चुंबक की तरह एक दूसरे को अपनी तरफ खींच रहे थे. इसमें कोई शक नहीं कि निधि के प्यार में ज्यादा तड़प और कसमसाहट थी. मेरे मन में चोर था और मैं दुविधा में था कि मैं इस संबंध को लंबे अरसे तक खींच पाऊंगा या नहीं, क्योंकि भविष्य के प्रति मैं आ’वस्त नहीं था.

एक साल बाद हमारे डिग्री कोर्स समाप्त हो गए. परीक्षा के बाद फिर से गर्मी की छुट्टियां... हम अपने शहर आ गए. छुट्टियों में निधि से रोज मिलना होता, परन्तु इस बार अपने घर आकर मैं कुछ बेचैन सा रहने लगा था. पता नहीं, वह क्या चीज थी, मैं समझ नहीं पा रहा था. ऐसा लगता था, जैसे मेरे जीवन में किसी चीज का अभाव था. वह क्या चीज थी, लाख सोचने के बावजूद मैं समझ नहीं पा रहा था. निधि से मिलता तो कुछ पल के लिए मेरी बेचैनी दूर हो जाती, परन्तु घर आते ही लगता मैं किसी भयानक वीराने में आ फंसा हूं और वहां से निकलने का कोई रास्ता मुझे दिखाई नहीं पड़ रहा था.

अचानक एक दिन मुझे अपनी बेचैनी का कारण समझ में आ गया. उस दिन मैं जल्दी घर लौटा था और मां आंगन में अमिता की मां के साथ बैठी बातें कर रही थीं. अमिता की मां को देखते ही मेरा दिल अनायास धड़क उठा, जैसे मैंने बरसों साल पूर्व बिछड़े अपने किसी आत्मीय को देख लिया हो. मुझे तुरन्त अमिता की याद आई, उसका भोला देवी स्वरूप मुखड़ा याद आया. उसके चेहरे की स्निग्धता, मधुर सौन्दर्य और उसकी बड़ी-बड़ी मुस्कराती आंखें और होंठों को दबाकर मुसकराना... सभी कुछ याद आया. मेरा दिल और तेजी से धड़क उठा. मेरे पैर जैसे वही जकड़ कर रह गए. मैंने कातर भाव से अमिता को मां को देखा और उन्हें नमस्कार करते हुए कहा, ‘‘चाची, आजकल आप दिखाई नहीं पड़ती हैं?’’ वास्तव में मैं पूछना चाहता था, ‘आजकल अमिता दिखाई नहीं पड़ती.’’

मुझे अपनी बेचैनी का कारण पता चल गया था, परन्तु मैं उसका निवारण नहीं कर सकता था. अमिता की मां ने कहा, ‘‘अरे बेटा, मैं तो लगभग रोज ही आती हूं. तुम ही घर पर नहीं रहते.’’

मैं शर्मिन्दा हो गया और झेंपकर दूसरी तरफ देखने लगा. मेरी मां मुस्कराते हुए बोलीं, ‘‘लगता है, यह तुम्हारे बहाने अमिता के बारे में पूछ रहा है. उससे इस बार मिला कहां है?’’ मां मेरे दिल की बात समझ गई थीं.

अमिता की मां भी हंस पड़ीं, ‘‘तो सीधा बोलो न बेटा, मैं तो उससे रोज कहती हूं, परन्तु पता नहीं उसे क्या हो गया है कि कहीं जाने का नाम ही नहीं लेती. पिछले एक साल से बस पढ़ाई, सोना और कालेज... कहती है, अन्तिम वर्ष है, ठीक से पढ़ाई करेगी तभी तो अच्छे नंबरों से पास होगी.’’

‘‘परन्तु अब तो परीक्षा समाप्त हो गयी है.’’ मेरी मां कह रही थी. मैं धीरे-धीरे अपने कमरे की तरफ बढ़ रहा था, परन्तु उनकी बातें मुझे पीछे की तरफ खींच रही थीं. दिल चाहता था कि रुककर उनकी बातें सुनूं और अमिता के बारे में जानूं, पर संकोच और लाजवश मैं आगे बढ़ता जा रहा था. कोई क्या कहेगा कि मैं अमिता के प्रति दीवाना था...

‘‘हां, परन्तु अब भी वह किताबों में ही खोई रहती है.’’ अमिता की मां बता रही थीं.

आगे की बातें मैं नहीं सुन सका. मेरे मन में तड़ाक से कुछ टूट गया. मैं जानता था कि अमिता मेरे घर क्यों नहीं आ रही थी. उस दिन की मेरी बात, जब वह मेरे कमरे में प्रसाद देने के बहाने आई थी, उसके दिल में उतर गई थी और आज तक उसको उसने गांठ में बांधकर रख छोड़ा था. मुझे नहीं पता था कि वह इतनी जिद्दी और स्वाभिमानी लड़की थी... बचपन में तो वह ऐसी नहीं थी.

अब मैं फोन पर निधि से बात करता तो खयालों में अमिता रहती, उसका मासूम और सुन्दर चेहरा मेरे आगे नाचता रहता और मुझे लगता मैं निधि से नहीं अमिता से बातें कर रहा हूं. मुझे उसका इंतजार रहने लगा, परन्तु मैं जानता था कि अब अमिता मेरे घर कभी नहीं आएगी. एक साल हो गया था, आज तक नहीं आई तो अब क्या आएगी? उसे क्या पता कि मैं अब उसका इंतजार करने लगा था. मेरी बेबसी और बेचैनी का उसे कभी पता नहीं चल सकता था. मुझे ही कुछ करना पड़ेगा, वरना एक अनवरत जलनेवाली आग में मैं जलकर मिट जाऊंगा और किसी को पता भी नहीं चलेगा.

मैं अमिता के घर कभी नहीं गया था, परन्तु उसका घर मुझे मालूम था. बहुत सोच-विचारकर और अपने मन को समझाकर मैं एक दिन उसके घर पहुंच ही गया, परन्तु दरवाजे की कुण्डी खटखटाते ही मेरे मन को एक अनजाने भय ने घेर लिया. इसके बावजूद मैं वहां से नहीं हटा. थोड़ी देर बाद दरवाजा खुला तो अमिता की मां सामने खड़ी थीं. वह मुझे देखकर हैरान रह गयीं. अचानक उनके मुंह से कोई शब्द नहीं निकला. मैंने अपने दिल की धड़कन को संभालते हुए उन्हें नमस्ते किया और कहा, ‘‘क्या मैं अन्दर आ जाऊं?’’

‘‘आं, हां हां,’’ जैसे उन्हें होश आया हो, ‘‘आ जाओ, अन्दर आ जाओ.’’ अन्दर घुसकर मैंने चारों तरफ नजर डाली. साधारण घर था, जैसा कि आम मध्यमवर्गीय परिवार होते हैं. आंगन के बीच खड़े होकर मैंने अमिता के घर को देखा, बड़ा खाली-खाली और वीरान सा लग रहा था. फिर मैंने आसमान की तरफ देखा. वह भी सूना लग रहा था, मेरे दिल की तरह खाली और वीरान सा... मैंने एक गहरी सांस ली. मुझे ऐसा क्यों लग रहा था कि चारों तरफ वीरानी छाई थी और डरावना सन्नाटा पसरा हुआ था.

मैंने प्रश्नवाचक भाव से अमिता की मां को देखा, ‘‘सब लोग कहीं गए हुए हैं?’’ मैंने पूछा.

अमिता की मां की समझ में अभी तक नहीं आ रहा था कि वह क्या कहें. मेरा प्रश्न सुनकर बोली, ‘‘हां, बस अमिता है, अपने कमरे में... अच्छा तुम बैठो. मैं उसे बुलाती हूं.’’ उन्होंने हड़बड़ी में बरामदे में रखे तखत की तरफ इशारा किया. तखत पर एक पुराना गद्दा बिछा हुआ था, शायद रात में उस पर कोई सोता होगा. मैंने मना करते हुए कहा, ‘‘नहीं, रहने दो. मैं उसके कमरे में ही जाकर मिल लेता हूं. कौन सा है?’’

अब तक शायद हमारे बातचीत करने की आवाज अमिता के कानों तक पहुंच चुकी थी. वह उलझी हुई सी अपने कमरे से बाहर निकली और फटी-फटी आंखों से मुझे देखने लगी. वह इतना हैरान थी कि नमस्कार करना तक भूल गई. मां-बेटी की हैरानगी से मेरे दिल को थोड़ा सुकून पहुंचा और अब तक मैंने अपने धड़कते दिल को संभाल लिया था. मैं मुसकराने लगा, तो अमिता शरमा गई और अपना सिर झुका लिया. बोली कुछ नहीं. मैंने देखा, उसके बाल उलझे हुए थे, सलवार- कुर्ते में सलवटें पड़ी हुई थीं. आंखें उनींदी सी थीं, जैसे उसे कई रातों से नींद न आई हो. वह अपने प्रति बेपरवाह सी दिख रही थी.

‘‘बैठो, बेटा. मेरी तो समझ में नहीं आ रहा कि क्या कहूं? तुम पहली बार मेरे घर आओ हो.’’ अमिता की मां ऐसे कह रही थीं, जैसे भगवान उनके घर पर पधारे हों.

मैं कुछ नहीं बोला और मुसकराता रहा. अमिता ने एक बार फिर अपनी आंखों को उठाकर गहरी निगाह से मुझे देखा. उसकी आंखों में एक प्रश्न डोल रहा था. मैं तुरन्त उसका जवाब नहीं दे सकता था. उसकी मां के सामने खुलकर बात भी नहीं कर सकता था. मैं चुप रहा तो शायद वह मेरे मन की बात समझ गई. धीरे से बोली, ‘‘आओ, मेरे कमरे में चलते हैं. मां आप तब तक चाय बना लो.’’ अन्तिम वाक्य उसने अपनी मां से कुछ जोर से कहा था.

हम दोनों उसके कमरे में आ गए. इसरार करके उसने मुझे अपने बिस्तर पर बिठा दिया, पर खुद खड़ी रही. मैंने उससे बैठने के लिए कहा तो उसने कहा, ‘‘नहीं, मैं ऐसे ही ठीक हूं.’’ मैंने उसके कमरे में एक नजर डाली. पढ़ने की मेज-कुर्सी के अलावा एक साधारण सा बिस्तर था, एक पुरानी स्टील की अलमारी और एक तरफ हैंगर में उसके पहने हुए कपड़े टंगे थे. कमरा साफ-सुथरा था और मेज पर किताबों का ढेर लगा हुआ था, जैसे अभी भी वह किसी परीक्षा की तैयारी कर रही थी. छत पर एक पंखा हूम्-हूम् करता हुआ हमारे विचारों की तरह घूम रहा था.

मैंने एक गहरी सांस ली और अमिता को लगभग घूरकर देखता हुआ बोला, ‘‘क्या तुम मुझसे नाराज हो?’’ मैं बहुत तेजी से बोल रहा था. मेरे पास समय कम था, क्योंकि किसी भी क्षण उसकी मां कमरे में आ सकती थी और मुझे बहुत सारे सवालों के जवाब अमिता से चाहिए थे.

वह कुछ नहीं बोली, बस सिर नीचा किए खड़ी रही. मैंने महसूस किया, उसके होंठ हिल रहे थे, जैसे कुछ कहने के लिए बेताब हों, परन्तु भावातिरेक में शब्द मुंह से बाहर नहीं निकल पा रहे थे. मैंने उसका उत्साह बढ़ाते हुए कहा, ‘‘देखो, अमि, मेरे पास समय कम है और तुम्हारे पास भी... मां घर में हैं और हम खुलकर बात नहीं कर सकते. जो मैं पूछ रहा हूं, जल्दी से उसका जवाब दो, वरना बाद में हम दोनों ही पछताते रह जाएंगे. बताओ, क्या तुम मुझसे नाराज हो?’’

‘‘नहीं,’’ उसने कहा, परन्तु उसकी आवाज रोती हुई सी लगी.

‘‘तो, तुम मुझे प्यार करती हो?’’ मैंने स्पष्ट करना चाहा. कहते हुए मेरी आवाज लरज गयी और दिल जोरों से धड़कने लग गया.

परन्तु अमिता ने मेरे प्रश्न का कोई उत्तर नहीं दिया, शायद उसके पास शब्द नहीं थे. बस उसका बदन कांपकर रह गया. मैं समझ गया.

‘‘तो फिर तुमने हठ क्यों किया? अपना मान तोड़कर एक बार मेरे पास आ जाती, मैं कोई अमानुष तो नहीं हूं. तुम थोड़ा झुकती, तो क्या मैं पिघल नहीं जाता?’’

वह फिर एक बार कांपकर रह गयी. मैंने जल्दी से कहा, ‘‘मेरी तरफ नहीं देखोगी?’’ उसने तड़पकर अपना चेहरा उठाया. उसकी आंखें भीगी हुई थीं और उनमें एक विवशता झलक रही थी. यह कैसी विवशता थी, जो वह बयान नहीं कर सकती थी? मुझे उसके ऊपर दया आई और सोचा कि उठकर उसे अपने अंक में समेट लूं, परन्तु संकोचवश बैठा रहा.

उसकी मां एक गिलास में पानी लेकर आ गई थीं. मुझे पानी पीना नहीं था, क्योंकि मैं अमिता की छलकती आंखों के रास्ते बहुत कुछ पी चुका था. फिर भी औपचारिकतावश मैंने गिलास हाथ में ले लिया और एक घूंट भरकर गिलास फिर से ट्रे में रख दिया. मां भी वही सामने बैठ गयीं और इधर-उधर की बातें करने लगीं. मुझे उनकी बातों में कोई रुचि नहीं थी, परन्तु उनके सामने मैं अमिता से कुछ पूछ भी नहीं सकता था.

उसकी मां वहां से नहीं टलीं और मैं अमिता से आगे कुछ नहीं पूछ सका. मैं कितनी देर तक वहां बैठ सकता था, मजबूरन उठना पड़ा, ‘‘अच्छा चाची, अब मैं चलता हूं.’’

‘‘अच्छा, बेटा...’’ वह अभी तक नहीं समझ पाई थीं कि मैं उनके घर क्यों आया था. उन्होंने भी नहीं पूछा.

चलते-चलते मैंने धीरे से अमिता के कान में कहा, ‘‘तुम मेरी बहुत अच्छी दोस्त हो. चाहो तो मिलने आ सकती हो. मैं इंतजार करूंगा.’’ कहकर मैंने एक गहरी मुसकान उसके चेहरे पर डाली. उसकी आंखों में विश्वास और अविश्वास की मिली-जुली तसवीर उभरकर मिट गयी. क्या उसे मेरी बात पर यकीन होगा? अगर हां, तो वह मुझसे मिलने अवश्य आएगी.

परन्तु वह मेरे घर फिर भी नहीं आई. मेरे दिल को गहरी ठेस पहुंची और अन्दर बहुत कुछ टूट गया. मैंने क्या अमिता के दिल को इतनी गहरी चोट दी थी कि वह उसे अभी तक भुला नहीं पाई थी. वह मुझसे मिलती तो मैं माफी मांग लेता, उसे अपने अंक में समेट लेता और अपने सच्चे प्यार का उसे एहसास कराता. परन्तु वह नहीं आई, तो मेरा दिल भी टूट गया. वह अगर स्वाभिमानी है, तो क्या मैं अपने आत्मसम्मान का त्याग कर देता?

हम दोनों ही अपने-अपने हठ पर अड़े रहे.

समय बिना किसी अवरोध के अपनी गति से आगे बढ़ता रहा. इस बीच मेरी नौकरी एक प्राइवेट कंपनी में लग गई और मैं अमिता से मिले बिना चण्डीगढ़ चला गया. निधि को भी जाब मिल गई और वह नोएडा में नौकरी कर रही थी.

इस दौरान मेरी दोनों बहनों का ब्याह हो गया और वह अपनी-अपनी ससुराल चली गयीं. जाब मिल जाने के बाद मेरे लिए भी रिश्ते आने लगे थे, परन्तु मम्मी और पापा ने सब कुछ मेरे ऊपर छोड़ दिया था.

निधि की मेरे प्रति दीवानगी दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही थी, परन्तु मैं उसके प्रति समर्पित नहीं था और न उससे मिलने-जुलने के लिए इच्छुक, परन्तु निधि मकड़ी की तरह मुझे अपने जाल में फंसाती जा रही थी. वह छुट्टियों में अपने घर न जाकर मेरे पास चण्डीगढ़ आ जाती और हम दोनों साथ-साथ कई दिन गुजारते. कई बार अनावश्यक रूप से छुट्टियां लेकर मेरे पास चण्डीगढ़ में पड़ी रहती.

मैं निधि के चेहरे में अमिता की छवि को देखते हुए उसे प्यार करता रहा. परन्तु मैं इतना हठी निकला कि एक बार भी अमिता की खबर नहीं ली, फोन पर मम्मी से कभी उसके बारे में नहीं पूछा. अगर पूछता तो उसके बारे में अवश्य कुछ पता चल जाता. परन्तु यहां भी पुरुष का अहम् मेरे आड़े आ गया... जब अमिता को ही मेरे बारे में पता करने की फुरसत नहीं है, तो मैं उसके पीछे क्यों भागता फिरूं?

अंततः निधि की दीवानगी ने मुझे जीत लिया. उधर मम्मी-पापा भी शादी के लिए दबाव डाल रहे थे. अतएव जाब मिलने के एक साल बाद हम दोनों ने शादी कर ली.

निधि के साथ मैं दक्षिण भारत के शहरों में हनीमून मनाने चला गया. लगभग पन्द्रह दिन बिताकर हम दोनों अपने घर लौटे. हमारी छुट्टी अभी पन्द्रह दिन बाकी थी, अतः हम दोनों रोज बाहर घूमने-फिरने जाते, शाम को किसी होटल में खाना खाते, और देर रात गए घर लौटते. कभी-कभी निधि के मायके चले जाते. इसी तरह मस्ती में दिन बीत रहे थे कि एक दिन मुझे तगड़ा झटका लगा.

अमिता की मां मेरे घर आई थीं और रोते-रोते बता रही थीं कि अमिता के पापा ने उसके लिए एक रिश्ता ढूंढ़ा था. बहुत अच्छा लड़का था, सरकारी नौकरी में था और घर-परिवार भी अच्छा था. सभी को यह रिश्ता बहुत पसंद था, परन्तु अमिता ने शादी करने से इंकार कर दिया था. घरवाले बहुत परेशान और दुखी थे. अमिता किसी भी प्रकार शादी के लिए मान नहीं रही थी.

‘‘शादी से इंकार करने का कोई कारण बताया उसने?’’ मेरी मां अमिता की मम्मी से पूछ रही थीं.

‘‘नहीं, बस इतना ही कहती है कि शादी नहीं करेगी और पहाड़ों पर जाकर किसी स्कूल में पढ़ाने का काम करेगी.’’

‘‘इतनी छोटी उमर में उसे ऐसा क्या बैराग हो गया?’’ मेरी मां की समझ में भी कुछ नहीं आ रहा था.

वस्तुतः किसी की समझ में कुछ नहीं आ रहा था, परन्तु मैं जानता था कि अमिता ने यह कदम क्यों उठाया था? उसे मेरा इंतजार था, परन्तु मैंने हठ में आकर निधि से शादी कर ली थी. मैं दुबारा अमिता के पास जाकर उससे माफी मांग लेता, तो संभवतः वह मान जाती और मेरा प्यार स्वीकार कर लेती. हम दोनों ही अपनी जिद् और अहंकार के कारण एक दूसरे से दूर हो गए थे. मुझे लगा, अमिता ने किसी और के साथ नहीं, बल्कि मेरे साथ अपना रिश्ता तोड़ा है.

मेरी शादी हो गयी थी और मुझे अब अमिता से कोई सरोकार नहीं रखना चाहिए था, परन्तु मेरा दिल उसके लिए बेचैन था. मैं उससे मिलना चाहता था, अतः मैंने अपना हठ तोड़ा और एक बार फिर अमिता से मिलने उसके घर पहुंच गया. मैंने उसकी मां से निःसंकोच कहा कि मैं उससे एकान्त में बात करना चाहता था और इस बीच वह कमरे में न आएं.

मैं बैठा था और वह मेरे सामने खड़ी थी. उसका सुन्दर मुखड़ा मुरझाकर सूखी सफेद जमीन सा हो गया था. उसकी आंखें सिकुड़ गयी थीं और चेहरे की कांति को ग्रहण लग गया था. उसकी सुन्दर केशा-राशि उलझी हुई ऊन की तरह हो गयी थी.

मैंने सीधे उससे कहा, ‘‘क्यों अपने को दुख दे रही हो?’’

‘‘मैं खुश हूं.’’ उसने सपाट स्वर में कहा.

‘‘शादी के लिए क्यों मना कर दिया?’’

‘‘यहीं मेरा प्रारब्ध है.’’ उसने बिना कुछ सोचे तुरन्त जवाब दिया.

‘‘यह तुम्हारा प्रारब्ध नहीं था. मेरी बात को इतना गहरे अपने दिल में क्यों उतार लिया था? मैं तो तुम्हारे पास आया था, फिर तुम मेरे पास क्यों नहीं आई? आ जाती तो आज तुम मेरी पत्नी होती.’’

‘‘शायद आ जाती,’’ उसने निःसंकोच भाव से कहा, ‘‘परन्तु रात में मैंने इस बात पर विचार किया कि आप मेरे पास क्यों आए थे. कारण मेरी समझ में आ गया था. आप मुझसे प्यार नहीं करते थे, बस तरस खाकर मेरे पास आए थे और मेरे घावों पर मरहम रखना चाहते थे. मैं आपका सच्चा प्यार चाहती थी, तरस भरा प्यार नहीं. मैं इतनी कमजोर नहीं हूं कि किसी के सामने प्यार के लिए आंचल फैलाकर भीख मांगती. उस प्यार की क्या कीमत, जिसकी आग किसी के सीने में न जले.’’

‘‘क्या यह तुम्हारा अहंकार नहीं है?’’ उसकी बात सुनकर मुझे थोड़ा गुस्सा आ गया था.

‘‘हो सकता है, परन्तु मुझे इसी अहंकार के साथ जीने दीजिए. मैं अब भी आपको प्यार करती हूं और जीवन भर करती रहूंगी. मैं अपने प्यार को स्वीकार करने के लिए ही उस दिन आपके पास प्रसाद देने के बहाने गई थी, परन्तु आपने बिना कुछ सोचे-समझे मुझे ठुकरा दिया. मैं जानती थी कि आप दूसरी लड़कियों के साथ घूमते-फिरते हैं, शायद उनमें से किसी को प्यार भी करते रहे हों. इसके बावजूद मैं आपको मन ही मन प्यार करने लगी थी. सोचती थी, एक दिन मैं आपको अपना बना लूंगी. वैष्णों माता से भी मैंने आपका प्यार मांगा था, परन्तु मेरी इच्छा पूरी नहीं हुई. देवी को यह मंजूर नहीं था, फिर भी अगर आपका प्यार मेरा नहीं है तो क्या हुआ, मैंने जिसको चाहा, उसे प्यार किया और करती रहूंगी. मेरे प्यार में कोई खोट नहीं है.’’ कहते-कहते वह सिसकने लगी थी.

‘‘अगर अपने हठ में आकर मैंने तुम्हारा प्यार नहीं कबूल किया, तो क्या दुनिया इतनी छोटी है कि तुम्हें कोई दूसरा प्यार करनेवाला युवक न मिलता. मुझसे बदला लेने के लिए तुम किसी अन्य युवक से शादी कर सकती थी.’’ मैंने उसे समझाने का प्रयास किया.

वह हंसी. बड़ी विचित्र हंसी थी उसकी, जैसे किसी बावले की... जो दुनिया की नासमझी पर व्यंग्य से हंस रहा हो. बोली, ‘‘मैं इतना गिरी हुई भी नहीं हूं कि अपने प्यार का बदला लेने के लिए किसी और का जीवन बरबाद करती. दुनिया में प्यार के अलावा और भी बहुत अच्छे कार्य हैं. मदर टेरेसा ने शादी नहीं की थी, फिर भी वह अनाथ बच्चों से प्यार करके महान हो गयीं. मैं भी कुंवारी रहकर किसी कान्वेंट में बच्चों को पढ़ाऊंगी, और उनके हंसते-खिलखिलाते चेहरों के बीच अपना जीवन गुजार दूंगी. मुझे कोई पछतावा नहीं है. आप अपनी पत्नी के साथ खुश रहें, यही मैं ईश्वर से कामना करती हूं. मैं जहां रहूंगी, खुश रहूंगी... अकेले ही. इतना मैं जानती हूं कि वसन्त में हर पेड़ पर बहार नहीं आती. अब आपके अलावा मेरे जीवन में किसी दूसरे व्यक्ति के लिए कोई जगह नहीं है.’’ उसकी आंखों में अनोखी चमक थी और उसके शब्द तीर बनकर मेरे दिल में चुभ गए.

मुझे लगा मैं अमिता को बिलकुल भी नहीं समझ पाया था. वह मेरे बचपन की साथी अवश्य थी, परन्तु उसके मन और स्वभाव को मैं आज तक नहीं समझ पाया था. मैंने उसे केवल बचपन में ही जाना था. अब जवानी में जब उसे जानने का मौका मिला, तब तक सब कुछ लुट चुका था.

वह हठी ही नहीं, स्वाभिमानी भी थी. उसको उसके निर्णय से डिगा पाना इतना आसान नहीं था. मैंने अमिता को समझने में बहुत बड़ी भूल की थी. काश, मैं उसके दिल को समझ पाता, तो उसकी भावनाओं को इतनी चोट न पहुंचती.

अपनी नासमझी में मैंने उसके दिल को ठेस पहुंचाई थी, परन्तु उसने अपने स्वाभिमान से मेरे दिल पर इतना गहरा घाव कर दिया था, जो ता-उम्र भरने वाला नहीं था.

सब कुछ मेरे हाथों से छिन गया था और मैं एक हारे हुए जुआरी की तरह अमिता के घर से चला आया.

(राकेश भ्रमर)

7, श्री होम्स, बचपन स्कूल के पास,

कंचन विहार, विजय नगर, जबलपुर-482002

दूरभाष 0761 2647001

मोबाइल- 09968020930

COMMENTS

BLOGGER: 3
Loading...
रचनाकार अब वेबसाइट के साथ साथ एंड्रायड ऐप पर भी.
अपने फ़ोन पर पढ़ने का बेहतर आनंद रचनाकार ऐप्प से लें. गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें.

 image

|ताज़ातरीन_$type=complex$count=8$com=0$page=1$va=0$au=0

|कथा-कहानी_$type=blogging$com=0$au=0$count=7$page=1$src=random-posts$s=200

|हास्य-व्यंग्य_$type=complex$com=0$au=0$count=7$page=1$src=random-posts

|लोककथाएँ_$type=blogging$com=0$au=0$count=7$page=1$src=random-posts

|लघुकथाएँ_$type=blogging$com=0$au=0$count=7$page=1$src=random-posts

|आलेख_$type=blogging$com=0$au=0$count=7$page=1$src=random-posts

|काव्य जगत_$type=complex$com=0$au=0$count=7$page=1$src=random-posts

|संस्मरण_$type=blogging$com=0$au=0$count=7$page=1$src=random-posts

|बच्चों के लिए रचनाएँ_$type=blogging$com=0$au=0$count=7$page=1$src=random-posts

|विविधा_$type=blogging$au=0$com=0$label=1$count=10$va=1$page=1$src=random-posts

 आलेख कविता कहानी व्यंग्य 14 सितम्बर 14 september 15 अगस्त 2 अक्टूबर अक्तूबर अंजनी श्रीवास्तव अंजली काजल अंजली देशपांडे अंबिकादत्त व्यास अखिलेश कुमार भारती अखिलेश सोनी अग्रसेन अजय अरूण अजय वर्मा अजित वडनेरकर अजीत प्रियदर्शी अजीत भारती अनंत वडघणे अनन्त आलोक अनमोल विचार अनामिका अनामी शरण बबल अनिमेष कुमार गुप्ता अनिल कुमार पारा अनिल जनविजय अनुज कुमार आचार्य अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ अनुज खरे अनुपम मिश्र अनूप शुक्ल अपर्णा शर्मा अभिमन्यु अभिषेक ओझा अभिषेक कुमार अम्बर अभिषेक मिश्र अमरपाल सिंह आयुष्कर अमरलाल हिंगोराणी अमित शर्मा अमित शुक्ल अमिय बिन्दु अमृता प्रीतम अरविन्द कुमार खेड़े अरूण देव अरूण माहेश्वरी अर्चना चतुर्वेदी अर्चना वर्मा अर्जुन सिंह नेगी अविनाश त्रिपाठी अशोक गौतम अशोक जैन पोरवाल अशोक शुक्ल अश्विनी कुमार आलोक आई बी अरोड़ा आकांक्षा यादव आचार्य बलवन्त आचार्य शिवपूजन सहाय आजादी आदित्य प्रचंडिया आनंद टहलरामाणी आनन्द किरण आर. के. नारायण आरकॉम आरती आरिफा एविस आलेख आलोक कुमार आलोक कुमार सातपुते आशीष कुमार त्रिवेदी आशीष श्रीवास्तव आशुतोष आशुतोष शुक्ल इंदु संचेतना इन्दिरा वासवाणी इन्द्रमणि उपाध्याय इन्द्रेश कुमार इलाहाबाद ई-बुक ईबुक ईश्वरचन्द्र उपन्यास उपासना उपासना बेहार उमाशंकर सिंह परमार उमेश चन्द्र सिरसवारी उमेशचन्द्र सिरसवारी उषा छाबड़ा उषा रानी ऋतुराज सिंह कौल ऋषभचरण जैन एम. एम. चन्द्रा एस. एम. चन्द्रा कथासरित्सागर कर्ण कला जगत कलावंती सिंह कल्पना कुलश्रेष्ठ कवि कविता कहानी कहानी संग्रह काजल कुमार कान्हा कामिनी कामायनी कार्टून काशीनाथ सिंह किताबी कोना किरन सिंह किशोरी लाल गोस्वामी कुंवर प्रेमिल कुबेर कुमार करन मस्ताना कुसुमलता सिंह कृश्न चन्दर कृष्ण कृष्ण कुमार यादव कृष्ण खटवाणी कृष्ण जन्माष्टमी के. पी. सक्सेना केदारनाथ सिंह कैलाश मंडलोई कैलाश वानखेड़े कैशलेस कैस जौनपुरी क़ैस जौनपुरी कौशल किशोर श्रीवास्तव खिमन मूलाणी गंगा प्रसाद श्रीवास्तव गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर ग़ज़लें गजानंद प्रसाद देवांगन गजेन्द्र नामदेव गणि राजेन्द्र विजय गणेश चतुर्थी गणेश सिंह गांधी जयंती गिरधारी राम गीत गीता दुबे गीता सिंह गुंजन शर्मा गुडविन मसीह गुनो सामताणी गुरदयाल सिंह गोरख प्रभाकर काकडे गोवर्धन यादव गोविन्द वल्लभ पंत गोविन्द सेन चंद्रकला त्रिपाठी चंद्रलेखा चतुष्पदी चन्द्रकिशोर जायसवाल चन्द्रकुमार जैन चाँद पत्रिका चिकित्सा शिविर चुटकुला ज़कीया ज़ुबैरी जगदीप सिंह दाँगी जयचन्द प्रजापति कक्कूजी जयश्री जाजू जयश्री राय जया जादवानी जवाहरलाल कौल जसबीर चावला जावेद अनीस जीवंत प्रसारण जीवनी जीशान हैदर जैदी जुगलबंदी जुनैद अंसारी जैक लंडन ज्ञान चतुर्वेदी ज्योति अग्रवाल टेकचंद ठाकुर प्रसाद सिंह तकनीक तक्षक तनूजा चौधरी तरुण भटनागर तरूण कु सोनी तन्वीर ताराशंकर बंद्योपाध्याय तीर्थ चांदवाणी तुलसीराम तेजेन्द्र शर्मा तेवर तेवरी त्रिलोचन दामोदर दत्त दीक्षित दिनेश बैस दिलबाग सिंह विर्क दिलीप भाटिया दिविक रमेश दीपक आचार्य दुर्गाष्टमी देवी नागरानी देवेन्द्र कुमार मिश्रा देवेन्द्र पाठक महरूम दोहे धर्मेन्द्र निर्मल धर्मेन्द्र राजमंगल नइमत गुलची नजीर नज़ीर अकबराबादी नन्दलाल भारती नरेंद्र शुक्ल नरेन्द्र कुमार आर्य नरेन्द्र कोहली नरेन्‍द्रकुमार मेहता नलिनी मिश्र नवदुर्गा नवरात्रि नागार्जुन नाटक नामवर सिंह निबंध नियम निर्मल गुप्ता नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’ नीरज खरे नीलम महेंद्र नीला प्रसाद पंकज प्रखर पंकज मित्र पंकज शुक्ला पंकज सुबीर परसाई परसाईं परिहास पल्लव पल्लवी त्रिवेदी पवन तिवारी पाक कला पाठकीय पालगुम्मि पद्मराजू पुनर्वसु जोशी पूजा उपाध्याय पोपटी हीरानंदाणी पौराणिक प्रज्ञा प्रताप सहगल प्रतिभा प्रतिभा सक्सेना प्रदीप कुमार प्रदीप कुमार दाश दीपक प्रदीप कुमार साह प्रदोष मिश्र प्रभात दुबे प्रभु चौधरी प्रमिला भारती प्रमोद कुमार तिवारी प्रमोद भार्गव प्रमोद यादव प्रवीण कुमार झा प्रांजल धर प्राची प्रियंवद प्रियदर्शन प्रेम कहानी प्रेम दिवस प्रेम मंगल फिक्र तौंसवी फ्लेनरी ऑक्नर बंग महिला बंसी खूबचंदाणी बकर पुराण बजरंग बिहारी तिवारी बरसाने लाल चतुर्वेदी बलबीर दत्त बलराज सिंह सिद्धू बलूची बसंत त्रिपाठी बातचीत बाल कथा बाल कलम बाल दिवस बालकथा बालकृष्ण भट्ट बालगीत बृज मोहन बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष बेढब बनारसी बैचलर्स किचन बॉब डिलेन भरत त्रिवेदी भागवत रावत भारत कालरा भारत भूषण अग्रवाल भारत यायावर भावना राय भावना शुक्ल भीष्म साहनी भूतनाथ भूपेन्द्र कुमार दवे मंजरी शुक्ला मंजीत ठाकुर मंजूर एहतेशाम मंतव्य मथुरा प्रसाद नवीन मदन सोनी मधु त्रिवेदी मधु संधु मधुर नज्मी मधुरा प्रसाद नवीन मधुरिमा प्रसाद मधुरेश मनीष कुमार सिंह मनोज कुमार मनोज कुमार झा मनोज कुमार पांडेय मनोज कुमार श्रीवास्तव मनोज दास ममता सिंह मयंक चतुर्वेदी महापर्व छठ महाभारत महावीर प्रसाद द्विवेदी महाशिवरात्रि महेंद्र भटनागर महेन्द्र देवांगन माटी महेश कटारे महेश कुमार गोंड हीवेट महेश सिंह महेश हीवेट मानसून मार्कण्डेय मिलन चौरसिया मिलन मिलान कुन्देरा मिशेल फूको मिश्रीमल जैन तरंगित मीनू पामर मुकेश वर्मा मुक्तिबोध मुर्दहिया मृदुला गर्ग मेराज फैज़ाबादी मैक्सिम गोर्की मैथिली शरण गुप्त मोतीलाल जोतवाणी मोहन कल्पना मोहन वर्मा यशवंत कोठारी यशोधरा विरोदय यात्रा संस्मरण योग योग दिवस योगासन योगेन्द्र प्रताप मौर्य योगेश अग्रवाल रक्षा बंधन रच रचना समय रजनीश कांत रत्ना राय रमेश उपाध्याय रमेश राज रमेशराज रवि रतलामी रवींद्र नाथ ठाकुर रवीन्द्र अग्निहोत्री रवीन्द्र नाथ त्यागी रवीन्द्र संगीत रवीन्द्र सहाय वर्मा रसोई रांगेय राघव राकेश अचल राकेश दुबे राकेश बिहारी राकेश भ्रमर राकेश मिश्र राजकुमार कुम्भज राजन कुमार राजशेखर चौबे राजीव रंजन उपाध्याय राजेन्द्र कुमार राजेन्द्र विजय राजेश कुमार राजेश गोसाईं राजेश जोशी राधा कृष्ण राधाकृष्ण राधेश्याम द्विवेदी राम कृष्ण खुराना राम शिव मूर्ति यादव रामचंद्र शुक्ल रामचन्द्र शुक्ल रामचरन गुप्त रामवृक्ष सिंह रावण राहुल कुमार राहुल सिंह रिंकी मिश्रा रिचर्ड फाइनमेन रिलायंस इन्फोकाम रीटा शहाणी रेंसमवेयर रेणु कुमारी रेवती रमण शर्मा रोहित रुसिया लक्ष्मी यादव लक्ष्मीकांत मुकुल लक्ष्मीकांत वैष्णव लखमी खिलाणी लघु कथा लघुकथा लतीफ घोंघी ललित ग ललित गर्ग ललित निबंध ललित साहू जख्मी ललिता भाटिया लाल पुष्प लावण्या दीपक शाह लीलाधर मंडलोई लू सुन लूट लोक लोककथा लोकतंत्र का दर्द लोकमित्र लोकेन्द्र सिंह विकास कुमार विजय केसरी विजय शिंदे विज्ञान कथा विद्यानंद कुमार विनय भारत विनीत कुमार विनीता शुक्ला विनोद कुमार दवे विनोद तिवारी विनोद मल्ल विभा खरे विमल चन्द्राकर विमल सिंह विरल पटेल विविध विविधा विवेक प्रियदर्शी विवेक रंजन श्रीवास्तव विवेक सक्सेना विवेकानंद विवेकानन्द विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक विश्वनाथ प्रसाद तिवारी विष्णु नागर विष्णु प्रभाकर वीणा भाटिया वीरेन्द्र सरल वेणीशंकर पटेल ब्रज वेलेंटाइन वेलेंटाइन डे वैभव सिंह व्यंग्य व्यंग्य के बहाने व्यंग्य जुगलबंदी व्यथित हृदय शंकर पाटील शगुन अग्रवाल शबनम शर्मा शब्द संधान शम्भूनाथ शरद कोकास शशांक मिश्र भारती शशिकांत सिंह शहीद भगतसिंह शामिख़ फ़राज़ शारदा नरेन्द्र मेहता शालिनी तिवारी शालिनी मुखरैया शिक्षक दिवस शिवकुमार कश्यप शिवप्रसाद कमल शिवरात्रि शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी शीला नरेन्द्र त्रिवेदी शुभम श्री शुभ्रता मिश्रा शेखर मलिक शेषनाथ प्रसाद शैलेन्द्र सरस्वती शैलेश त्रिपाठी शौचालय श्याम गुप्त श्याम सखा श्याम श्याम सुशील श्रीनाथ सिंह श्रीमती तारा सिंह श्रीमद्भगवद्गीता श्रृंगी श्वेता अरोड़ा संजय दुबे संजय सक्सेना संजीव संजीव ठाकुर संद मदर टेरेसा संदीप तोमर संपादकीय संस्मरण संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018 सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन सतीश कुमार त्रिपाठी सपना महेश सपना मांगलिक समीक्षा सरिता पन्थी सविता मिश्रा साइबर अपराध साइबर क्राइम साक्षात्कार सागर यादव जख्मी सार्थक देवांगन सालिम मियाँ साहित्य समाचार साहित्यिक गतिविधियाँ साहित्यिक बगिया सिंहासन बत्तीसी सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध सीताराम गुप्ता सीताराम साहू सीमा असीम सक्सेना सीमा शाहजी सुगन आहूजा सुचिंता कुमारी सुधा गुप्ता अमृता सुधा गोयल नवीन सुधेंदु पटेल सुनीता काम्बोज सुनील जाधव सुभाष चंदर सुभाष चन्द्र कुशवाहा सुभाष नीरव सुभाष लखोटिया सुमन सुमन गौड़ सुरभि बेहेरा सुरेन्द्र चौधरी सुरेन्द्र वर्मा सुरेश चन्द्र सुरेश चन्द्र दास सुविचार सुशांत सुप्रिय सुशील कुमार शर्मा सुशील यादव सुशील शर्मा सुषमा गुप्ता सुषमा श्रीवास्तव सूरज प्रकाश सूर्य बाला सूर्यकांत मिश्रा सूर्यकुमार पांडेय सेल्फी सौमित्र सौरभ मालवीय स्नेहमयी चौधरी स्वच्छ भारत स्वतंत्रता दिवस स्वराज सेनानी हबीब तनवीर हरि भटनागर हरि हिमथाणी हरिकांत जेठवाणी हरिवंश राय बच्चन हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन हरिशंकर परसाई हरीश कुमार हरीश गोयल हरीश नवल हरीश भादानी हरीश सम्यक हरे प्रकाश उपाध्याय हाइकु हाइगा हास-परिहास हास्य हास्य-व्यंग्य हिंदी दिवस विशेष हुस्न तबस्सुम 'निहाँ' biography dohe hindi divas hindi sahitya indian art kavita review satire shatak tevari undefined
नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,3753,आलोक कुमार,2,आलोक कुमार सातपुते,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,325,ईबुक,181,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,243,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,105,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,2731,कहानी,2039,कहानी संग्रह,223,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,482,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,129,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,30,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,82,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,22,पाठकीय,61,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,309,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,1,बाल कथा,326,बाल कलम,23,बाल दिवस,3,बालकथा,48,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,8,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,16,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,213,लघुकथा,793,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,16,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,302,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,57,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,1865,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,618,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,668,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,14,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,49,साहित्यिक गतिविधियाँ,179,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,51,हास्य-व्यंग्य,51,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: राकेश भ्रमर की कहानी - सूना आसमान
राकेश भ्रमर की कहानी - सूना आसमान
http://lh5.ggpht.com/-ajxlEF3m8XA/T7XU-lk5WmI/AAAAAAAALz8/pkjOd6An_fM/image%25255B2%25255D.png?imgmax=800
http://lh5.ggpht.com/-ajxlEF3m8XA/T7XU-lk5WmI/AAAAAAAALz8/pkjOd6An_fM/s72-c/image%25255B2%25255D.png?imgmax=800
रचनाकार
http://www.rachanakar.org/2012/05/blog-post_8742.html
http://www.rachanakar.org/
http://www.rachanakar.org/
http://www.rachanakar.org/2012/05/blog-post_8742.html
true
15182217
UTF-8
सभी पोस्ट लोड किया गया कोई पोस्ट नहीं मिला सभी देखें आगे पढ़ें जवाब दें जवाब रद्द करें मिटाएँ द्वारा मुखपृष्ठ पृष्ठ पोस्ट सभी देखें आपके लिए और रचनाएँ विषय ग्रंथालय खोजें सभी पोस्ट आपके निवेदन से संबंधित कोई पोस्ट नहीं मिला मुख पृष्ठ पर वापस रविवार सोमवार मंगलवार बुधवार गुरूवार शुक्रवार शनिवार रवि सो मं बु गु शु शनि जनवरी फरवरी मार्च अप्रैल मई जून जुलाई अगस्त सितंबर अक्तूबर नवंबर दिसंबर जन फर मार्च अप्रैल मई जून जुला अग सितं अक्तू नवं दिसं अभी अभी 1 मिनट पहले $$1$$ minutes ago 1 घंटा पहले $$1$$ hours ago कल $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago 5 सप्ताह से भी पहले फॉलोअर फॉलो करें यह प्रीमियम सामग्री तालाबंद है चरण 1: साझा करें. चरण 2: ताला खोलने के लिए साझा किए लिंक पर क्लिक करें सभी कोड कॉपी करें सभी कोड चुनें सभी कोड आपके क्लिपबोर्ड में कॉपी हैं कोड / टैक्स्ट कॉपी नहीं किया जा सका. कॉपी करने के लिए [CTRL]+[C] (या Mac पर CMD+C ) कुंजियाँ दबाएँ