मंगलवार, 8 मई 2012

रामवृक्ष सिंह की दो रचनाएँ

(1) ग़ज़ल

मेरी कुर्बानियों का कुछ सिला नहीं मिलता।

कभी मंजिल, तो कभी रास्ता नहीं मिलता।।

 

मैं बहुत दूर तक तनहा ही चला जाता हूँ

और ता उम्र कोई दूसरा नहीं मिलता।।

 

तुमने मुर्दों पे मकाबिर तो बनाए हैं मगर

तामीर-ए-जीस्त का नाम-ओ-निशां नहीं मिलता।।

 

उसको पाया न मसाजिद में न बुतखाने में

है तो हर सू मगर मुझको खुदा नहीं मिलता।।

 

बद से बदतर हुआ जाता है दहर बेशक पर

एक भी फर्द तो मुझसे ज़ुदा नहीं मिलता।।

 

--0--

(2)

अखबार

जिस सुबह अख़बार नहीं आता है।

मन आकुल होकर घर की मुँड़ेर पर चढ़ जाता है।

सोचा है कभी, क्यों?

रात को टी.वी. में जो सुना और दिखा होता है

वही सब तो अख़बार में लिखा होता है

दिखे और लिखे में ऐसा क्या अंतर है

विचार तो विचार है- खबर तो खबर है

अख़बार से मेरा ऐसा कौन-सा नाता है

जो उसके न मिलने पर कल नहीं पड़ती मन उदास हो जाता है

क्या पा जाता हूँ उसमें जो दिल की प्यास बुझा देता है

ऐसा क्या है उसमें जो बुझते दीए की रोशनी बढ़ा देता है

कल देखे मैच का स्कोर

या शहर के किसी महल्ले में पकड़ा गया चोर

कहीं फाँसी लगाकर मरी हुई मेहरारू

या सास कोई दहेज के लिए बहु को जला मारने पर उतारू

डकैती, हत्या, बलात्कार

इन्हीं सबकी खबरें तो छापते हैं अख़बार

या फिर टेंडर और निविदाएँ

सोने-चाँदी के गिरते-उठते भाव, लेख कहानी या कविताएं

मारण मंत्र और वशीकरण के विज्ञापन

किराए की संपत्तियों या नौकरियों के इश्तहार

अथवा विवाह योग्य कन्याओं और वरों के विवरण शानदार

और बहुत-बहुत कुछ ऐसा

जिसकी प्रेरणा और कुछ भी नहीं, बस यदि है तो कुछ पैसा

जो बच्चों और बुजुर्गों, दोनों के ही मैं पढ़ नहीं पाता

पर क्या करूँ उससे है मेरा बड़ा ही नैसर्गिक नाता

उसे मैं रात को अकेले में बाँचता हूँ

और फिर मन के अंधेरे कोने में धँसे बैठे चोर

की हर हरकत को बारीकी से जाँचता हूँ

ये अख़बार .. मुझे जानकारियाँ और विचार तो देता है

साथ ही, ये मेरे अपराधी आदिम मन की

पाशविक इच्छाओं को भी जगाता और भड़काता है

इसीलिए.. बस-बस सिर्फ इसीलिए

जब अख़बार नहीं आता है

मन मेरा रह-रहकर अकुलाता है।

--

डॉ. रामवृक्ष सिंह

आर.वी.सिंह/R.V. Singh
फोन/Phone-2288774
मोबाइल/Mob-9454712299
ईमेल/email-rvsingh@sidbi.in

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