रविवार, 13 मई 2012

शेर सिंह की कविता - मां

कड़ी धूप में घनी छांव है मां

गंगा की बहती जलधारा है

हर दुख - तकलीफ की ढाल

एक पवित्र आत्‍मा का नाम है मां ।

ईश्‍वर- भगवान को तो नहीं देखा है

लेकिन ईश्‍वर- भगवान भी क्‍या भिन्‍न होंगे मां से

सोचता हूं ईश्‍वर- भगवान भी मां जैसे ही होंगे

हर बला से बचाती है मां ।

कोई विपति दुष्‍प्रभाव डाले इस से पूर्व ही

झेल लेती है, सह लेती है मां

स्‍वयं कांटों से हो कर गुजरती है

लेकिन अपने बच्‍चों की राह निष्‍कंटक बनाती मां ।

सिर पर सुखद छत है मां

हर आशा और विश्‍वास की डोर है मां

दुनिया की हर बुरी नजर से बचाती

एक रक्षा कवच का नाम है मां ।

स्‍वयं सहे लेकिन अपने बच्‍चों को न पहुंचे ठेस

सहनशीलता की जीवंत प्रतिमा है मां

अपने विश्‍वास को टूटते देख कर भी

अपने आंचल में फिरभी छिपाने को तत्‍पर मां ।

अपने मन के घावों, चोटों को

सब से छिपाती, झुठलाती है मां

तिरस्‍कारों, उपेक्षाओं को अनदेखा कर

दया और ममता का अथाह सागर मां ।

--

0 शेर सिंह

के.के. - 100

कविनगर, गाजियाबाद -201 001

E Mail- shersingh52@gmail.com

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