सोमवार, 21 मई 2012

शैलेश मरजी कदम का आलेख : अस्‍पृश्‍यता और गुलामीः विविध संदर्भ

 

प्रस्‍तावना ः-

डॉ. बाबासाहब अम्‍बेडकर ने कहा था।

‘अछूत समाज के उत्‍थान के लिए मैंने अपने आप को समर्पित किया है।

'‘कांग्रेस अछूत वर्ग का प्रतिनिधित्‍व बिल्‍कुल नहीं कर सकती'

‘अछूतों के स्‍वतन्‍त्र गाँव जरुरी हैं।'

‘अछूतों के हकों पर दस साल की मर्यादा क्‍यों ?'

विश्‍व का वर्तमान समय प्रगतिशील विचारों का, शिक्षित, कानून और लोकतंत्र का सम्‍मान करनेवाला होने के बावजूद भारत में अप्रत्‍यक्ष रुप से अस्‍पृश्‍यता और अमेरिका में दासत्‍व या गुलामी प्रथा अलग-अलग रुपों में आज भी मौजूद हैं यही चित्र दिखाई देता है।

अस्‍पृश्‍यता तथा गुलामी या दासत्‍व में सबसे ज्‍यादा यातनामय, दुष्‍टतम या बुरा क्‍या है ? इसकी चर्चा इस प्रपत्र के माध्‍यम से करने का प्रयास यहाँ किया गया है। दोनों व्‍यवस्‍थाएँ मानव जाति के लिए कंलक थींऔर हैं। इन दोनों व्‍यवस्‍थाओं के कारण एक विशिष्‍ट समुदाय यानि भारत में अस्‍पृश्‍य, जो दलित या शूद्र थे वे अपने हक्‍क और अधिकारों से वंचित रहे तथा अमेरिका में बसे अश्वेत लोग गोरे लोगों के गुलामी के शिकार हुए। दोनों व्‍यवस्‍थाओं ने अन्‍याय, अत्‍याचार और शोषण की उच्‍चत्‍तम सीमाओं को पार किया था। सत्‍ता और वर्चस्‍व की मानसिकता में अस्‍पृश्‍य तथा गुलाम सदियों तक पिसते रहे हैं। एक लम्‍बे आंदोलन के बाद उन्‍हें आज़ादी मिली।

अमेरिका में जब 1618 से उपनिवेशिक मानसिकता जन्‍म ले रही थी तब अमेरिका ने 1619 में पहला आफ्रीकी गुलाम वर्जीनिया में लाया था। इसके बाद अफ्रीका से बड़े पैमाने पर गुलामों को लाना जारी रहा और मैसाच्‍युसेट्‌स पहला उपनिवेश बना। आगे गुलामों की संख्‍या में बढ़ोत्‍तरी होने के कारण 1641 में गुलामी प्रथा को कानूनी जामा पहनाया गया। जो गलत था। मानव अधिकारों के विरुद्ध था।

वर्तमान समय के अमेरिका के अश्वेत 1619 से 1865 तक अमेरिका में बंदी बनाए गए गुलामों की संतानेंहैं। बंदी बनाए गए अफ्रीकियों में कई जातीय समूहों के लोग थे।

अमेरिका का दक्षिण प्रांत गुलामों के व्‍यापार हेतु प्रसिद्ध था। वहाँ गुलामों की बोली लगाई जाती थी। गुलामों को जब खाने-पीने को ठीक-ठाक नहीं दिया जाता था। उन से बहुत जादा काम लिया जाता था। तब वे भाग जाते थे। तब गुलामी प्रथा का विरोध करनेवाले कुछ लोग इन्‍हें आश्रय देते थे। किन्‍तु 1850 में आश्रय देने को अपराध समझने वाला कानून लागू हुआ। इसके पहले यानि 1808 में अमेरिका के संसद ने अंतरराष्‍ट्रीय गुलाम व्‍यापार करना प्रतिबंधित किया था; गुलामी प्रथा को नहीं। अमेरिका के उत्‍तरी प्रांत में गुलामी प्रथा के विरोध में जनमत तैयार हो रहा था। 1808 के बाद गुलामी प्रथा विश्‍व के समस्‍त मानव समुदाय का एक महत्‍वपूर्ण प्रश्‍न बन गया था। और इस प्रश्‍न को हल करने या गुलामी प्रथा को नष्‍ट करने के लिए अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर चर्चा हो रही थी। साहित्‍य लिखा जा रहा था। पत्रिकाएँ निकल रही थीं। आंदोलन चलाए जा रहे थे। गुलामी प्रथा का विरोध जोर पकड़ रहा था।

गुलामी प्रथा के विरोध में लोग खडे हो इसलिए अमेरिका के दक्षिण प्रांत में लोक चेतना हेतु एक महत्त्वपूर्ण साप्‍ताहिक पत्रिका ‘नेशनल इरा' चलाई जा रही थी। इस पत्रिका के माध्‍यम से एक अमेरिकन लेखिका ‘हॅरिएट बीचर स्‍टोव' गुलामों पर होनेवाले अन्‍याय, अत्‍याचार और शोषण को लगातार उजागर कर रही थी। 1852 में लेखिका द्वारा लिखे गए उपन्‍यास ‘अंकल टॉम्‍स कॅबिन' ने अमेरिका सरकार को हिला दिया था। इसी समय गुलामी प्रथा को बनाए रखना चाहिए ऐसा मानने वाला एक समूह अमेरिका में मौजूद था। उस समूह ने हॅरिएट बीचर के लेखन को नकार कर उसकी आलोचना की। हरिएट का लेखन झूठा है यह दर्शाने का प्रयास किया। गुलामों के जीवन पर न लिखे इसलिए उन्‍हें धमकियाँ दीं, किन्‍तु लेखिका गुलामों के साथ उनके आंदोलन में सक्रिय रुप से खड़ी रहीं। अपने लेखनी के माध्‍यम से गुलामों के वास्‍तविक जीवन का चित्रण किया। इसी कारण लेखिका द्वारा लिखित ‘अंकल टॉम्‍स कॅबिन' उपन्‍यास के प्रकाशन के बाद ही उसकी तीन लाख पच्‍चीस हजार प्रतियां हाथों हाथ बिक गई थीं।

इसी समय गुलामी प्रथा के विरोध में मुक्‍त गुलाम ‘फ्रेडरिक डग्‍लस' अपना आंदोलन चला रहे थे। इन्‍होने लेखिका का उपरोक्‍त उपन्‍यास पढ़ा और वे प्रभावित हुए उस उपन्‍यास को वे गुलामों के समूहों में सार्वजनिक रुप से पढ़ने लगे जिससे गुलामी प्रथा के विरोध में लोगों में चेतना फैल गई। 1861 में गुलामी प्रथा का विरोध करनेवाला आंदोलन काफी तेज हुआ और अमेरिका सरकार को 1 जनवरी 1863 को गुलामीप्रथा को समाप्‍त करने के घोषणा करनी पड़ी। इसके बाद भी विश्‍व में छुट-पुट रूप में गुलामी प्रथा और दासत्‍व तथा भारत के संदर्भ में अस्‍पृश्‍यता दिखाई दे रही थी। इस लिए करीब 100 सालों के बाद समस्‍त विश्‍व के व्‍यक्‍ति और समुदायों के मानव अधिकारों के लिए 10 दिसंबर 1948 को संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ की महासभा नेमानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा स्‍वीकृत करते हुए यह घोषित किया कि, ‘‘किसी भी व्‍यक्‍ति को दास या गुलाम नहीं रखा जाएगा सभी प्रकार की दासता और दास-व्‍यापर प्रतिषिद्ध होगा''

1भारत के संदर्भ में अमेरिका के गुलामी प्रथा तथा दासता से भयावह मानसिक यातना देनेवाली प्रथा थीअस्‍पृश्‍यता की प्रथा। हिन्‍दू धर्म के मानसिकता से उत्‍पन्‍न यह छुआछूत किसी भी रुप में तर्कसंगत नहीं थी। अस्‍पृश्‍यता के संदर्भ में ऐसी-ऐसी मान्‍यता भी जो माननेवाले के विद्वता पर प्रश्‍न चिन्‍ह उपस्‍थित करती है। मनुराजा के समय से पेशवाकालीन ब्राह्मणों के शासन काल तक अस्‍पृश्‍यता के नाम पर अस्‍पृश्‍यों का बहुत शोषण और उत्‍पीड़न किया गया।

प्राचीन काल से हिन्‍दू धर्म में छुआछूत पालने के अनेक संदर्भ मिलते हैं। इस छुआछूत के विरोध में संतों ने अपने लेखन के माध्‍यम से विरोध किया। किन्‍तु उन्‍हें विशेष सफलता प्राप्‍त नहीं हो सकी। आधुनिक काल मे ‘अस्‍पृश्‍यता' की समस्‍या को अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर ले जाने का कार्य डॉ. अम्‍बेडकर ने किया। जब उन्‍हें 1942 में ‘इन्‍स्‍टीटयूट ऑफ पैसिफिक रिलेशन्‍स‘ के अध्‍यक्ष की और से भारत के अछूतों की समस्‍या पर कनाडा में होनेवाले कान्‍फ्रेंस में एक पेपर पढ़ने के लिए आंमत्रित किया गया। अपने पेपर के माध्‍यम से बाबासाहब नेविश्‍व समुदाय को यह बताया कि, ‘‘भारत में अछूतों की मुसीबतें विश्‍व के नीग्रो और यहूदियों की मुसीबतों से कम कठिन नहीं हैं। इसलिए विश्‍व के चिन्‍तक साम्राज्‍यावाद और नस्‍लवाद से लड़ते समय भारत की अस्‍पृश्‍यता जैसे गम्‍भीर समस्‍या से लड़ना न भूलें ''

अस्‍पृश्‍यता की मार व्‍यक्‍ति भोगता है, खासकर दलित व्‍यक्‍ति। दलित व्‍यक्‍ति की अपनी व्‍यक्‍तिगत बुराइयां हो सकती हैं। किन्‍तु उसके साथ अस्‍पृश्‍यता का व्‍यवहार व्‍यक्‍तिगत बुराइयों के कारण नहीं बल्‍कि वह दलित जाति में जन्‍मा है इसलिए किया जाता है। यह सार्वजनिक सच है व्‍यक्‍ति जन्‍म लेने से पहले अपनी जाति निर्धारित नहीं कर सकता वह उसके हाथ में नहीं है। दलित जाति में जन्‍म होना एक संयोग मात्र हैं। अस्‍पृश्‍यता के मामले में वर्तमान समय में काफी बदलाव आया है। खासकर शहरों में, किन्‍तु ग्रामीण इलाकों में आज भी अस्‍पृश्‍यता मानी जाती है। ग्रामीण इलाके के उच्‍चवर्णियों के मंदिरों में आज भी दलितों को प्रवेश नहीं दिया जाता। तथा उनके पनघट पर पानी भरने की अनुमति नहीं है। जबकि किसी भी प्रकार की अस्‍पृश्‍यता का पालन करना संविधान के अनुसार अपराध है। जैसे - संविधान के अनुच्‍छेद 17 में यह स्‍पष्‍ट उल्‍लेख है कि, ‘‘अस्‍पृश्‍यता का अन्‍त किया जाता है और उसका किसी भी रुप में आचरण निषिद्ध किया जाता है। ‘अस्‍पृश्‍यता' से उपजी किसी निर्योग्‍यता को लागू करना अपराध होगा, जो विधि के अनुसार दंडनीय होगा।''

3अस्‍पृश्‍यता वास्‍तविक और व्‍यावहारिक है किन्‍तु अप्रत्‍यक्ष है, सतत है और अचेत है। डॉ. अम्‍बेडकर साउथबोरो समिति के सामने 1919 में अपनी लिखित साक्ष्‍य प्रस्‍तुत करते समय यह लिखते है कि, ‘‘निर्वाचन के उद्देश्‍य के लिए ‘अछूत' की यह परिभाषा की यह वह व्‍यक्‍ति है, जिसके छूने से धर्म भ्रष्‍ट हो जाता है।''4वर्तमान समय में उच्‍च जातियों के दिलो दिमाग में घर कर बैठी ‘छुआछूत' का गहरा सबंध मनु के धर्म ग्रंथ ‘मनुस्‍मृति' से है। मनु ने अस्‍पृश्‍यों को हिन्‍दू सामाजिक व्‍यवस्‍था से बाहर रखा है। क्‍योंकि मनु के अनुसार केवल चार वर्ण हैं। जैसे - ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्‍य और शूद्र। उन्‍होंने अस्‍पृश्‍यों को ‘वर्ण-वाह्य' कहा है। अस्‍पृश्‍यता प्रत्‍यक्ष व्‍यावहार में न दिखे तो भी मानसिकता में दिखती है। इसलिए इस मानसिकता के संदर्भ में अम्‍बेडकर ने यह लिखा है कि, ‘‘अस्‍पृश्‍यता आन्‍तरिक तिरस्‍कार की बाहरी अभिव्‍यक्‍ति है जो एक हिन्‍दू किसी निश्‍चित व्‍यक्‍ति के बारे में महसूस करता है।''

परिभाषा से यह स्‍पष्‍ट है कि, अस्‍पृश्‍यता यानि एक उच्‍च वर्ग के व्‍यक्‍ति द्वारा किया गया निम्‍न वर्ग के व्‍यक्‍ति का अंतरिक तिरस्‍कार। किन्‍तु तिरस्‍कार के कोई ठोस कारण नहीं है। पीढ़ियो से चली आ रही परंपरा और अछूत जाति में जन्‍म लेना ही एक ठोस कारण है। निश्‍चित रुप से यह अस्‍पृश्‍यता, गुलामी से ज्‍यादा बुरी चीज है। यह गुलामी से तुलना करने के पश्‍चात स्‍पष्‍ट हो जाता है। जैसे- अम्‍बेडकर द्वारा दी गई तुलना के अनुसार गुलामी और अस्‍पृष्‍यता की तुलना ः-

(1) गुलामी बाध्‍यकारी नहीं है अस्‍पृश्‍यता बाध्‍यकारी है।

(2) गुलाम बनने के लिए गुलाम की अनुमति होती है। अस्‍पृश्‍यता जाति से आती है। दलित जाति में व्‍यक्‍ति जन्‍म लेता है और व अपने आप अस्‍पृश्‍य होता है।

(3) गुलामी के कानून ने गुलाम को इससे मुक्‍त होने की स्‍वीकृति दी है। यह नहीं की कोई एक बार गुलाम हो गया हो तो वह जीवनभर गुलाम रहेगा। किन्‍तु अस्‍पृश्‍यता से मुक्‍ति नहीं क्‍योंकि व्‍यक्‍ति एक बार अछूत पैदा हो गया हो तो सदा के लिए अछूत हो जाता है।

(4) अस्‍पृश्‍यता अप्रत्‍यक्ष है, गुलामी प्रत्‍यक्ष। अप्रत्‍यक्ष घटना के खिलाफ लड़ना मुश्‍किल होता है, प्रत्‍यक्ष घटना के खिलाफ लड़ना आसान।

(5) गुलामी में स्‍वतंत्रता का हनन प्रत्‍यक्ष होता है इसलिए गुलाम हमेशा जागरुक रहता है, अस्‍पृश्‍यता में स्‍वतंत्रता का हनन अप्रत्‍यक्ष होता है इसलिए वह जानकार और सचेत नहीं रह सकता और उसे सबूत हासिल करने में कठिनाई होती है।

(2) निष्कर्ष ः-

वर्तमान समय वैश्‍वीकरण, उदारीकरण और निजीकरण का समय है। एक तरफ इस काल में गुलामी और अस्‍पृश्‍यता खत्‍म होते नजर आ रही है, लेकिन आर्थिक मजबूरी, बेराजगारी, विस्‍थापन, अतिवादि भौतिक जीवन पद्धति आदि से व्‍यक्‍ति न चाहते हुए भी पूजीपतियों के गुलामी के जाल में फंस रहा है।दूसरी और द्विजों में कट्टरपंथी वर्ग आज भी यह मानता है कि, अस्‍पृश्‍यता बुरी चीज नहीं है। इसे हमारे धर्मग्रंथ मान्‍यता देते हैं। तो द्विजों में उदारवादी वर्ग अस्‍पृश्‍यता और गुलामी को बुरी चीज मानता है और दलितों और गुलामों के साथ खड़ा रहकर अस्‍पृश्‍यता और गुलामी आंदोलन में अपना सक्रिय सहयोग करना चाहता है किन्‍तु अपने कट्टरपथी भाईयों को नहीं समझाता यह एक सच्‍चाई है।

संतों, वैचारिकों जैसे- महात्‍मा फुले, शाहु महाराज, सयाजीराव गायकवाड, अम्‍बेडकर, गांधी, विवेकानंद, पेरियार आदि द्वारा अस्‍पृश्‍यता समाप्‍ति हेतु कई सारे संवैधानिक प्रयास किए जाने के बावजूद अस्‍पृश्‍यता और गुलामी समाप्‍त नहीं हुयी यह इस देश के लिए दुर्भाग्‍यपूर्ण है। देश के विकास में यह अवरोध है। सकारात्‍मक कार्य के बजाए अस्‍पृश्‍यता के समस्‍या से निपटाने के लिए सरकार तथा दोनों समुदायों की ऊर्जा नष्‍ट हो रहीं है। यह सब इसलिए है कि जब तक व्‍यक्‍ति स्‍वयं को सर्वोपरि घोषित करता रहेगा तब-तक यह समस्‍या बनी रहेगी। इसी मानसिकता के कारण व्‍यक्‍ति-व्‍यक्‍तियों में असमानता बनी हुयी है। जब की खून, चमडी खाना, पीना रहन-सहन आदि एक समान है। उच्‍च वर्ग जब-तक पुराने धार्मिक जातिवादी ग्रंथ जैसे - मनुस्‍मृति और रामचरित मानस का अपने घर में पठन-पाठन करेगें, अपने बच्‍चों पर परंपरावादी ग्रंथों के संस्‍कार करेगें तब-तक अस्‍पृष्‍यता की मासिकता की समाप्‍ति नहीं हो सकती। इसलिए अस्‍पृष्‍यता की समाप्‍ति हेतु उच्‍च वर्ग की भूमिका महत्त्वपूर्ण हैं।

संदर्भ ः- (1) मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा, भारत सरकार, विधि और न्‍याय मंत्रालय, राजभाषा खंड, विधायी विभाग, प्रकाशक - नियंत्रक, सिविल लाईन्‍स, दिल्‍ली, 1988, पृ.3

¼2½ Dr. Babasaheb Ambedkar : Writings and speeches, Volume -9, Compiled by Vasant Moon,

Education Department, Government of Maharastra, Bombay, 1st Edition, 1991, Page- 397-398.

(3) भारत का संविधान, 1 सितम्‍बर 1991 को यथाविद्‌य मान, भारत सरकार, विधि, न्‍याय और कम्‍पनी कार्य मंत्रालय, विधायी विभाग, राजभाषा खण्‍ड, तीसरा संस्‍करण, 1991, पृ. 8

¼4½ Dr. Babasaheb Ambedkar : Writings and speeches, Volume -9, Compiled by Vasant Moon,

Education Department, Government of Maharastra, Bombay, 1st Edition, 1991, Page- 275.

¼5½ Dr. Babasaheb Ambedkar : Writings and speeches, Volume -5, Compiled by Vasant Moon,

Education Department, Government of Maharastra, Bombay, 1st Edition, 1991, page- 169.

6) और बाबासाहब ने कहा.... संपादकः एल. जी. मेश्राम, ‘विमलकिर्ति', राधाकृष्‍ण प्रकाशन, नई दिल्‍ली, 2008-

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शैलेश मरजी कदम

सहायक प्रोफेसर,

म. गा. दूरस्‍थ शिक्षा केन्‍द्र,

म.गां.अ.हि.वि., वर्धा

मो. 9423643576

kadamshailesh05@gmail.com

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