शनिवार, 2 जून 2012

शशांक मिश्र भारती की पर्यावरण दिवस विशेष कविताएँ

5 जून विश्‍व पर्यावरण दिवस पर विशेष         
 

बदलाव
        
हर पल बदलता है
एक
नया रंग आता है
देश-विदेश में
मौसम के बदलाव से।
गरमी आती है जब
सूख जाते हैं। नदी, तालाब
बहता पसीना
चलती हैं जब
गर्म हवाएं!
तप-तपकर जाती है गर्मी
मौसम के बदलाव से।
आती है बरसात
भरते हैं जलाशय
नदी-नाले,
बोलते हैं मेंढक
नाचते हैं मोर
फैलती है हरियाली
मौसम के बदलाव से।
सरदी में बहती है
शीतल मन्‍द-मन्‍द
कंप-कंपा देने वाली
हवा
कट-कट बजते हैं दांत
जम जाता है हिम,
चलती है जब शीतल हवा
मौसम के
बदलाव से।
आती है बसंत
बोलती है कोयल
खिलते हैं फूल,
लाती है-
फूलों की खुशबू
बहती है मन्‍द-मन्‍द
पवन!
गूंजते हैं भौंरे
उड़ती हैं तितलियां
फूलों पर
मौसम के बदलाव पर।


नदी
चलती है धीरे-धीरे
घूमती हुई
कभी इधर कभी उधर
देती हुई किनारा
नदी।
बोलती है कम
तोलती है मन
जलाशयों का
कहती है सबकुद
मिलती है जब
सागरों से
नदी।
खाती हुई मोंड़े
बहती है
लहराती हुई
जाती है बहकर
पर्वत से निकलकर
सिन्‍धु तक
नदी।
करती हुई
कल-कल
बहती है निरन्‍तर,
सन्‍देश देती है
चलता रहे अथक
अपने प्रगति पथ पर
होगा सफल एक दिन
जैसे-
नदी।
निकलती है
पर्वत से
उतरती है धीरे-धीरे
उत्‍सुकतावश सोचता हूं मैं,
शान्‍त स्‍थिर हैं तरू
रास्‍ता बतलाता है कौन
इसको-
नदी।


कोयल
वह
स्‍वच्‍छन्‍द विहंगिनि
छोटी सी कोयल
जिधर चाहती उड़ती
मधुर ध्‍वनि करती
जहां चाहती
वहीं बसेरा लेती,
वह
लघु विहंगिनि सी
पहुंची अपने देश में।
उसका पथ
शुचि सम,स्‍वच्‍छ, सत्‍कर्म युक्‍त
जो ले जाता था
गंगा-यमुना के देश में,
वेदना होने पर
गीत सुनाती
बसन्‍त ऋतु आने पर
रंगेलियां मनाती।
मत हो निराश! मत हो निराश!!
यह वाक्‍य देश वासियों को सुनाती,
न माता-पिता ने
इसको बांधा है
अपने प्रेम-परिणय में
बल्‍कि इसने ही बांधा है
अपनी स्‍वच्‍छन्‍द विचार धारा को
बसन्‍त ऋतु के
मोहक सौन्‍दर्य में।


सम्‍पर्कः-हिन्‍दी सदन बड़ागांव शाहजहांपुर-242401 उ0प्र0 09410985048
ईमेल shashank.misra73@rediffmail.com

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