बुधवार, 27 जून 2012

कामिनी कामायनी की कविताएँ

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1 बदलते समय का एहसास
यह सहज था
कि तुम्हारे आँसू देख
मेरी आँखें रो पड़ती
तुम्हारे बहते खून से
मेरा जिगर लहूलुहान हो जाता
तुम्हारी यातनाएं
मेरे गृह त्याग का कारण बन जाता
पर
ऐसा कुछ नहीं हुआ
होता भी कैसे
नए और पुराने संबंधों का
अंतराल
टकराकर
इतने शुष्क हो गए हैं कि
तुम तुम न रहे
मैं मैं  नहीं
एक नकारे अस्तित्व के लिए
छटपटाते
हम
तुच्छ मकोड़े रह गए हैं।

     2 धूलकण
हवा में तैरते
धूलकणों की तरह
भटक रहे हैं निरर्थक
यहाँ से वहाँ
वहाँ से यहाँ
फंस गए किसी रेशे में
जम गए किसी घर
आँगन
गलीचे पर
बुहार दिए गए
फिर तैरते हैं
कहीं न कहीं
स्थाई होने के लिए
कोई तो कहे
आखिर नियति क्या है हमारी
स्थायित्व पाना
या
यूं ही व्यर्थ उड़ना।

    3.गौरैया और आदमी
चोंच में दबाए
खर
पतवार
सींक झाडू के टुकड़े
खिड़की
दरवाजों पर मॅडराती चिड़िया
आलमारी
तस्वीरों के पीछे
बंद पड़े पंखे
या रोशनदान में ही
डाल देती है
अपनी नीड़ की नींव
एक मौसम में घर बनाने की लालसा
गौरैया के अदम्य उत्साह सी
फूट पड़ती है हर किसी के अंदर
पर
घास फूस तिनके डालने से ही
घर नहीं बन जाती
यह जानते हैं पाखी और आदमी भी
इसलिए
हर सुबह जब
बुहार कर फेंक दिए जाते हैं तिनके
गौरैया के साथ उदास तब
होता है आदमी भी ।।
 
          4 ऊँचा घर
आसमान में घर बनाने
हम चले थे
साथ में तूफान तक आया नहीं
जो साथ देता
वादे किए थे सैकड़ों तरूवर शिखा
एक तिनका भी कोई लाया नहीं
किसके सहारे हम बढ़ें
चांद भी तैयार था देने को कुछ
उस रात अपनी चांदनी लाया नहीं
जो मुस्कुराती
हम उड़ चले
हम मुड़ चले
धरती की ओर
पर धरा भी कुछ नहीं सौगात भेजी
क्या बुरा था
हमने कोई ख्वाब देखा
व्योम में .एक घर बनाने हम गए थे
मानते हैं यह हमारी भूल ही थी
क्यों धरा को छोड़
ऊपर पग बढ़ाया ।।

    5  कर्णधार
कितनी नावों में
कितनी बार
होकर सवार
उतरोगे पार
लेकर जनाधार
या जनता का आभार
हे... राष्ट्र के कर्णधार
बतलाने का कष्ट करेंगे
या यॅू ही
अपनी झेाली आप भरते रहेंगे
और
दीन हीन हम
रोटी
कपड़ा
और मकान के सपने   लिए
तरसते
तड़पते
यूं ही घुट घुट कर
जन्म जन्मांतर तक
भटकते रहेंगे ।

      6 मुक्ति
बट के बड़े पत्तों पर
रखे कुछ पुष्प
दीए और बाती संग
समेट रखे हैं उसने
अपने अंजुरि में
आगे आगे पैंट शर्ट धारी
आधुनिक युवा पुजारी
पीछे पीछे मुक्ति की आकांक्षा लिए
विश्व नारी पुष्कर का शांत
बाबन घाट वला
मत्स्यपूर्ण तालाब
हवा ने बताया था
कुछ अद्भुत सुनाया था
ये फिरंगी भी करते हैं
अपने ज्ञात अज्ञात
पूर्वजों का तर्पण
डरते हैं मगर
पंडितों के वेश से
ठग न ले कहीं
हुआ होगा किसी न किसी के साथ
कोई न कोई वाकया
हादसा
इसलिए तज कर
धोत़ी, चंदऩ, तिलक
सीख कर आंग्ल भाषा
दिखाकर अपना ज्ञान
बढ़ा कर अपनी आभा
भूल नहीं पाते हैं ये भी
पच्छिम के जजमानों को
करते हैं वही कर्म
चाहिए उन्हें भी तो जीने का आधार
यानी धन.
और जजमानों को मोक्ष 
चंद रूपये के एवज में
धोकर अपना कोटि कोटि पाप
इस चोली दामन के संबंध में
लोग कितना भी रूप बदले
पंडित उससे ज्यादा बदल
पकड़ ही लेते हैं एक दूसरे को ।

     7 खुशी की तलाश में
महल के ऊपर एक महल और
कर लिया था उसने
इस तरह कई भवन खड़ा
इसी जोड़ तोड़ में
जिन्दगी के मधुर
धूप छांव
होने लगे स्वाहा
तब उसका मन चाहा
ये गाड़ियाँ
ये दौलत
ये हस्ती
ये पार्टी
ये पब
आखिर देंगी
उसे आत्मिक खुशी कब
घर सूना है
दीवार सूनी
गली
लॉन
स्विमिंग पूल सूनी
कितना गहरा सन्नाटा
कोई आहट
कोई शोर दिल में भी तो हो
तभी दिया था किसी ने सलाह
और उसने किराए पर
एक कोख ले लिया था

     8 समय
लाचार बूढ़ा शेर
चलता है धीरे धीरे
पर निर्धारित
सीमित दायरे में
उठते हैं खून में अब भी उबाल
तोड़ सकता है अब भी यह सीमा
दहाड़ता है पूरा मुंह खोल कर
तो दहल जाता है अभी भी यह जंगल
मगर अब अँगड़ाई लेने वाला
वो  प्रबल समय कहां
जगह जगह पहरे
बेडियां
उपर से उम्र की मार
कितना बेबस
कितना लाचार
डरते नहीं लोग उससे
वह केवल बूढ़ा और बीमार ही नहीं
पिंजरे में कैद भी है ।

     9 आधुनिक शिष्य
बड़े युगों के बाद द्रोण
आए थे उस शहर में
देखा एकलव्य को चलाते
एक साथ अनेक शस्त्र
मुग्ध हुए बोले
अहो वत्स
कलिकाल में ऐसा निशाने बाज
चिड़िया की सिर्फ आँख नहीं
वृक्ष भी कर दिया साफ
बालक
कौन है तुम्हारा गुरु
किस गुरुकुल के तुम हो छात्र
व्यतीत को प्रत्यक्ष पा
हिल गया एकलव्य
इन्हीं के चरणों में लगाई कभी थी निष्ठा
मगर परिणाम कितना दुखद
बार बार उसकी ही  परीक्षा
लौट आया अतीत से
कौन सी नैतिकता
इसी ने उसका अंगूठा कटवा कर
अर्जुन को दिया महानता का दीक्षा
नफरत सी उसकी आँखों ने दिखाई
फिर नाज से उसने तीर चलाई
तटस्थ भाव से अपनी शेखी बघारी
खुद को ही खुद का गुरु मानता हूँ
मैं और कहां किसी को जानता हूँ
कहां गुरु कैसी उनकी दक्षिणा
इन ढकोसलों को मैं अब नहीं मानता हूँ
सहम कर गुरु द्रोण पीछे हट गए थे
कलियुग के हिम्मत पर दंग रह गए थे
सोचा गुरु ने बदलनी होगी नीति
तभी शिष्य उनसे बढायेंगे प्रीति ।

    10 मगर नहीं..
कुंज वही ह़ै छांव वही है
वही है गलियां गांव वही है
वही नदी ह़ै वही है पनघट
वही ठिकाना़ ठांव वही है
वही है मानस़ वही ह्रदय है
वही नेह की धार  प्रबल है
हरित पीत का प्रेम वही है
नर नारी का ध्येय वही है
अनेक मोहन अनेक राधा
अनेक बंधन अनेक बाधा
मगर नहीं फिर रची वो रातें
मगर नहीं फिर वो मस्ती छाई
न उस बंसुरी संग महारास लीला
किसी कृष्ण ने फिर कभी थी मचाई

      ।।  कामिनी कामायनी ।।
          27 ।6।2012

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