गुरुवार, 7 जून 2012

कविताएँ, दोहे व ग़ज़लें

देवेन्द्र पाठक 'महरूम' की ग़ज़ल

क्या ख़ूब है लिबास

सारा तन दिखाई दे ।

 

अब ऐसा कुछ पहन

जिससे मन दिखाई दे ॥

 

हरियाते जून मेँ भी हैँ

दिल्ली के गार्डन;

मेरे विन्ध्य मेँ सावन मेँ

न सावन दिखाई दे॥

 

ग़मगीन ग्वाल-गोपियाँ,

बेहाल हैँ गउएँ ;

हर रोज़ उजड़ता हुआ

मधुवन दिखाई दे ॥

 

मेरे गाँव के सपनोँ मेँ

रोज़ आता है शहर ;

मुझको शहर मेँ गाँव,

घर-आँगन दिखाई दे ॥

 

यह होड़ अँखमुँदी कहाँ

ले जाएगी 'महरूम';

इस राहे-बियाबान मेँ;

भटकन दिखाई दे॥

--.

एस के पाण्डेय के दोहे

(७)

सारी दुनिया राम की जग उपजाए राम ।

दुनिया को दुनिया कहै अपना देकर नाम ।।

 

यसकेपी अपनी नहीं जदपि आपनी देंह ।

जग चाहे कर आपना जग जड़ता बस नेह ।।

 

जग में हैं अचरज कई तामें एक प्रधान ।

अपना कुछ भी है नहीं लोग सके नहि मान ।।

 

सबको है मरना अटल जोड़ रहे धन धान ।

छल बल कर अनरथ सकल भूलि चले भगवान ।।

 

मनुज हुए पर भूलि गे मानव की सौगात ।

यसकेपी करने लगे उचित नहीं जो बात ।।

 

जल थल नभ में जीव जो प्राणिजगत में आय ।

इनमें माने मनुज जो सो मानव बनि जाय ।।

 

मनुज सके बनि पशु दनुज भेद कहौं समुझाय ।

नियम नीति माने मनुज सो मानव कहलाय ।।

 

यसकेपी जग ब्याप गे भाँति-भाँति अवरेब ।

सब को कारण एक है मिट सकते सब बेग ।।

 

बनना होगा मनुज को फिर मानव यक बार ।

यसकेपी माने बिना मिटै न अत्याचार ।।

 

दानवता-पशुता कियो मनुजन से संयोग ।

मानवता कहते चली नहीं मनुज के योग ।।

 

रोगन ने अब कर लियो लोगन पे अधिकार ।

पहले जैसो बल नहीं पौरुष भरे बिकार ।।

 

जिवन अवधि अब घट गई जीते बरस पचास ।

यसकेपी दुर्मति बसी सुमति करे गिरि बास ।।

 

बिना सुमति सहमति नहीं केवल बहुत बिरोध ।

यसकेपी चहु दिसि बढ़े संकट कलह कुरोध ।।

 

मानव बनकर देखिए एसकेपी सच बात ।

निसा जाय अवरेब की होए शुभ परभात ।।

---------

डॉ. एस. के. पाण्डेय,

समशापुर (उ.प्र.) ।

URL1: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/

ब्लॉग: श्रीराम प्रभु कृपा: मानो या न मानो

*********

शीला रानी सक्सेना निराशा’ की कविता

image

जलधारा

तू मौन बह रही क्यों जलधारा

मेरी कुटिया के समीप

चंचल लहरें इस घोर निशा में

मंद गति से बहती हैं

अंधकार के धूमिल में वे

अपना रूप बदलती हैं

विदित नहीं क्यों तूने बनाया

अंधकार को मीत

मेरी कुटिया के समीप ...

काले-काले बादल का

प्रतिबिंब जो उससे पड़ता है

दर्पण रूपी निर्मल जल

आदर उसका ठुकराता है

पवन का झोंका संग ले बादल

गाता जाता गीत

मेरी कुटिया के समीप ...

पवन बन गया तेरा साथी

देख चाँदनी आती है

अब जल में कालेपन की

कुछ झलक नहीं दिखलाती है

शशि-किरण भी मंद हो चुकी

रवि की हो रही जीत

मेरी कुटिया के समीप ...

दुग्ध समान बह रही धारा

तीखी किरणें पड़ने से

बादल के टुकड़े फिर हटते

पवन झकोरे आने से

त्याग निराशा अंधकार को

पवन से कर ले प्रीत

मेरी कुटिया के समीप ...

 

परिचय: लेखिका एक जानी-मानी वरिष्ठ कवयित्री हैं व पिछले पचास वर्षों से विभिन्न विषयों पर लिखती रही हैं। उनकी कवितायें भावनाओं से ओत-प्रोत, यथार्थ से जुड़ी हुई और आम आदमी की मनोस्थिति को परिलक्षित करती हैं। मानव जीवन का शायद ही ऐसा कोई सोपान हो, जिस पर उनके मनोभाव शब्द बन कर न उकरे हों। जीवन के विभिन्न पड़ावों से जुड़ी होने के कारण उनकी रचनाओं में पाठक अनायास ही अपना प्रतिबिंब पा उनसे भावनात्मक जुड़ाव स्थापित कर लेता है। उनके दो काव्य संग्रह प्रकाशित हुए हैं, जो हर उम्र के पाठकों द्वारा सराहे गए हैं। जहाँ ‘उपहार’ में राष्ट्र-हित, दहेज, भूकंप-त्रासदी, विदाई व भक्ति-गीतों से संबन्धित रचनाओं का समावेश है, वहीं ‘समर्पण’ में उनकी ईश्वर में अटूट आस्था परिलक्षित होती है।

---.

2 blogger-facebook:

  1. भाई देवेन्द्र पाठक' महरूम' जी सच बयान करती आपकी यह ग़ज़ल, जो गीत का भी मज़ा दे रही है,बहुत अच्छी है.भाई पाण्डेय जी के दोहे भी अच्छे हैं. साधुवाद.

    उत्तर देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------